संतोष कुमार यादव, सुल्तानपुर: काकोरी ट्रेन एक्शन के सौ साल पूरे हो चुके हैं। इतिहास जब आजादी की लड़ाई के पन्ने पलटता है तो ’काकोरी ट्रेन एक्शन’ का नाम आते ही कई चेहरे सामने आते हैं। लेकिन उन्हीं चेहरों की कतार में एक ऐसा नाम भी है, जिसके साहस की कहानियां रोमांचित करती हैं और जिसकी जिंदगी का अंतिम अध्याय सुल्तानपुर की धरती पर लिखा गया वह शख्सियत थे क्रांतिकारी ’शचीन्द्रनाथ बख्शी’ जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से दादा बख्शी कहते थे। ऐसी शख्सियत का सुल्तानपुर प्रवास एक बड़ी विडंबना भी अपने भीतर समेटे हुए है।
अगर वो चिट्ठी न आती...
देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ने वाला क्रांतिकारी अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उसी शहर में रहा, लेकिन बहुत कम लोगों को उसकी असली पहचान पता थी। अगर बलिया से वह चिट्ठी न आती, समाजसेवी करतार केशव यादव की दादा बख्शी के नौकर से मुलाकात न होती और अगर उन्होंने उनकी तलाश न की होती, तो शायद सुल्तानपुर के बीच रहने वाला यह इतिहास पुरुष यहां गुमनामी में ही चला जाता।
बनारस में जन्मे बख्शी
25 दिसंबर को जन्मे, मूल रूप से बंगाली शचीन्द्रनाथ बख्शी का जन्म बनारस में हुआ था। युवावस्था में ही देश की गुलामी ने उन्हें बेचैन कर दिया। क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में कूद पड़े। काकोरी एक्शन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अंग्रेजी सत्ता ने उन्हें पकड़ने के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन वे कुछ समय तक पुलिस की आंखों में धूल झोंकते रहे। जनवरी 1927 में बिहार के भागलपुर से उनकी गिरफ्तारी हुई। काकोरी कांड के मुकदमे में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जेल की यातनाएं झेलीं, लेकिन आजादी के प्रति उनका विश्वास नहीं डिगा।
विधायक भी रहे बख्शी
आजादी के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन जारी रहा। जेल से रिहाई के बाद कांग्रेस से जुड़े और बाद में जनसंघ में शामिल हुए। चुनाव लड़ा और विधायक भी बने। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर होते चले गए। अस्सी के दशक में उनके बेटे राजेंद्रनाथ बख्शी की तैनाती यहां जलकल विभाग में इंजीनियर के रूप में थी। बेटे के साथ रहने के लिए दादा बख्शी सुल्तानपुर आ गए। शहर में वे बेहद शांत और लगभग एकांत जीवन जीते थे। बहुत कम लोगों को पता था कि उनके घर में रहने वाला यह बुजुर्ग कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति का बड़ा नाम रह चुका है।
नौकर ने सुनाए ऐसे किस्से...
एक दिन एक चिट्ठी ने सुल्तानपुर के इस गुमनाम क्रांतिकारी की पहचान दुनिया के सामने ला दी। शहीद स्मारक सेवा समिति के अध्यक्ष समाजसेवी करतार केशव यादव ने तत्कालीन जिलाधिकारी पुलक चटर्जी के हाथों शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा का अनावरण कराया था। इसी दौरान बलिया से उन्हें एक पत्र मिला। सवाल था, जब आजाद के साथी शचीन्द्रनाथ बख्शी सुल्तानपुर में रह रहे हैं तो प्रतिमा का अनावरण उनसे क्यों नहीं कराया गया? बस, यहीं से करतार केशव यादव ने दादा बख्शी की तलाश शुरू कर दी। तलाश के दौरान संयोग से उनकी मुलाकात दादा बख्शी के नौकर से हो गई। बातचीत में नौकर ने दादा बख्शी के जीवन और समुद्र में तैरने से जुड़े कुछ ऐसे किस्से सुनाए, जिनसे करतार केशव को शक हुआ।
1984 में दादा ने ली अंतिम सांस
जानकारी जुटाई तो शक यकीन में बदल गया। तत्कालीन जिलाधिकारी पुलक चटर्जी की मदद से करतार केशव यादव की मुलाकात शचीन्द्रनाथ बख्शी से हुई। करतार केशव यादव ने ’स्वदेश’ से बातचीत दौरान इस मुलाकात को अपनी जिंदगी का सबसे ऐतिहासिक क्षण बताया। इसके बाद 1981 में जिला परिषद के प्रांगण में शहीद भगत सिंह की प्रतिमा का अनावरण शचीन्द्रनाथ बख्शी से कराया गया। यह दृश्य सुल्तानपुर के इतिहास की दुर्लभ तस्वीरों में शामिल है। बाद के दिनों में बुढ़ापा और बीमारी धीरे-धीरे उन पर हावी होने लगी। स्वास्थ्य खराब हुआ तो उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस दौरान करतार केशव यादव और उनकी टीम ने उनकी सेवा की। 23 नवंबर 1984 को दादा बख्शी ने अंतिम सांस ली। गोमती नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी स्मृति में जनसहयोग से शवयात्री कक्ष का निर्माण कराया गया, जो आज भी उनके अस्तित्व और सुल्तानपुर से उनके रिश्ते की याद दिलाता है।
तीन मील समुद्र तैरकर हथियार लाए थे दादा बख्शी
दादा बख्शी की बहादुरी का सबसे रोमांचक प्रसंग उनके समुद्री अभियान से जुड़ा है। बताया जाता है कि क्रांतिकारी साथियों के लिए हथियार हासिल करने वे कलकत्ता पहुंचे थे। उस समय भारत की समुद्री सीमा तीन मील तक मानी जाती थी। योजना के मुताबिक हथियार लेकर आए जहाज तक पहुंचना था। दादा बख्शी बंगाल की खाड़ी में करीब तीन मील तैरकर जहाज तक पहुंचे। वहां भुगतान कर माउजर पिस्तौलों का बंडल हासिल किया और फिर अंधेरे में समुद्र तैरकर वापस लौट आए। यह केवल तैराकी का कारनामा नहीं था। यह उस दौर के क्रांतिकारियों के अदम्य साहस और देश के लिए जोखिम उठाने की क्षमता का प्रमाण था।