देवास: ग्वालियर और इंदौर की समृद्ध विरासत का भार वहन करने वाली शास्त्रीय संगीत कला में निष्णात कल्पना झोकरकर का वैसे तो पेशेवर कार्य शास्त्रीय और हल्के शास्त्रीय संगीत शैलियों में समान रूप से अभिव्यक्त है, लेकिन वे ख्याल, ठुमरी, तप्पा और भजन को भी समान कुशलता से प्रस्तुत कर अपनी वैशिष्ठ्यता स्थापित कर चुकी है। वैसे तो शास्त्रीय कला में ही उनका संपूर्ण जीवन रचा-बसा है, लेकिन वे संगीत के साथ संयुक्त परिवार के विचार को भी निरंतर पोषित करती रही हैं। बड़ी बहू, तीन भाई, छह बच्चे, सास-ससुर समेत 15 सदस्यों के परिवार की जिम्मेदारियों का भी बखूूबी निर्वहन किया है। इससेे भी बढ़कर उन्होंने विद्या दान को दान न समझकर उस कला को नि:शुल्क रूप से हस्तांतरित करने, अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कर्तव्य धर्म निर्वाह किया है। वे अभी तक 1 हजार से अधिक ऐसे शिष्यों (युवाओं-नवांकुरों) को अपनी कला के द्वारा शिक्षित-दीक्षित कर चुकी हैं, जो इस शास्त्रीय संगीत कला को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व निर्वाह कर रहे हैं।

देश-विदेश में शास्त्रीय कला के शिष्य
मध्यप्रदेश, मुंबई, पुणे, दिल्ली के साथ ही अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया से भी इस शास्त्रीय संगीत कला को सीखने वाले शिष्य जुड़े है। अनेकों को उन्होंने प्रत्यक्ष तो ऑनलाइन तरीके से भी इस कला की शिक्षा दी है। इस कला के साथ परिवार के संस्कार भी निरंतर इन नवांकुरों के द्वारा आगे बढ़े, ऐसा वे प्रयास करती हैं। समाज-राष्ट्र को प्रथम रखने वाले विचार का वे इन शिष्यों में निरंतर पोषण करती हैं। नेशनल स्तर पर संगीत नाट्य कला अकादमी द्वारा उनके दो शिष्य गौरव काले और अनुजा झोकरकर को सम्मान ंिमलना उनकी सीख का सम्मान भी है। भिलाई में 11-12 वर्ष की आयु में नैतिका नंदी बिटिया ने उनकी शिष्या के रूप में हाथ थामा था। 15 वर्षों तक सतत रियाज का ही प्रतिफल है कि प्रयत्न फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान से तीन बार नैतिका को नवाजा गया। यह कल्पनाजी के परिश्रम की सार्थकता है।

'तारे जमीं पर' ने दिखाई नौनिहालों के लिए राह
ऐसे बच्चे जो उम्र के साथ अनेक बार बोलना, लिखना, पढ़ना नहीं सीख पाते हैं। ऐसे बच्चे धीरे-धीरे अनेक तरह की समस्याओं से घिरने के साथ ही परिवार-समाज से कटते चले जाते हैं। ऐसे बच्चे दिव्यांग श्रेणी में नहीं आते, लेकिन डिस्लेक्सिया से पीड़ित इन बच्चों को विशेष देखभाल, सुरक्षा और सीख की जरूरत होती है। इंदौर में ऐसे पीड़ित बच्चों की संख्या बहुत थी, लेकिन इनका उपचार इंदौर में संभव नहीं था। दिल्ली, मुंबई का रुख करना पड़ता था, लेकिन 'तारे जमीं पर' फिल्म ने इस समस्या को रेखांकित किया तो इंदौर में ही समाधान की पहल हुई।

दो बच्चे पैरा ओलंपिक में पहुंचे
उर्जस्विनी बाल विकास केंद्र की निदेशक एवं ऑटिज्म, लर्निंग डिसएबिलिटी व चाइल्ड काउंसलिंग विशेषज्ञ डॉ. विनि झारिया डिस्लेक्सिया को पूर्णत: ठीक होने वाला उम्र से जुड़ी परेशानी बताती हैं और कहती हैं कि न्यूरोडायवर्सिटी की वास्तविकता यही है कि डिस्लेक्सिया कोई 'बीमारी' नहीं है, ये मस्तिष्क का एक अलग सीखने का पैटर्न है। फर्क सिर्फ एक चीज से पड़ता है कि कभी-कभी डिस्लेक्सिया से बच्चे की लिखावट प्रभावित होती है, कई बार जिसे हम डिस्ग्राफिया कहते हैं। जब हम डिस्लेक्सिया के हस्तक्षेप पर काम करते हैं तो लिखावट में भी सुधार दिखता है। डॉ. विनि के प्रयास से दो बच्चे पैरा ओलंपिक में अपना प्रदर्शन कर चुके हैं, जबकि ऐसे अनेक बच्चे हैं जो इस समस्या से मुक्त होकर स्कूल जाने लगे हैं। मध्यप्रदेेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश के साथ ही कुवैत, यूएई और अन्य देशों से भी ऑनलाइन तरीके से ऐसे बच्चों के स्कूली उपचार के लिए संपर्क किया जाता है।

10 वर्षों से महिलाओं, बच्चें के स्वावलंबन का अलख
लघु उद्योग भारती की पूर्व अध्यक्ष एवं कलांजलि ऑर्ट एंड म्युजिक अकादमी की संचालिका हेमलता कुमार ने 10 वर्षों में सामाजिक सरोकार, स्वदेशी एवं लोकल फॉर वोकल के अभियान के तहत ऐसी महिलाओं और बच्चों को प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया, जो अपने स्तर पर आर्थिक रूप से कमजोर हैं या संसाधनों के मान से अभावग्रस्त हैं। एक तरफ वे कलांजलि के द्वारा नए बच्चों को बहुत सामान्य शुल्क में शिक्षित करती हैं, जरूरतमंदों को नि:शुल्क प्रशिक्षण देने से भी पीछे नहीं हटतीं तो दूसरी तरफ वे त्योहार के मान से घर की साज-सज्जा एवं दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं के निर्माण के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करती है। रक्षाबंधन के पूर्व स्वदेशी राखी, गणेश उत्सव से पूर्व मिट्टी के गणेश और सजावटी वस्तुओं, दीपावली के लिए कैंडल, झालर, मिट्टी के दीये को आकर्षक बनाने एवं अन्य सामग्रियों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग जगहों पर कार्यशाला का आयोजन करती हैं। उनकी प्रत्येक कार्यशाला में 300 से 500 महिलाएं और बच्चों को जागरूक करने के लिए की जाने वाले आयोजन में भी संख्या 300 से ऊपर रहती हैं। बीएसएफ के आवासीय परिसर में भी वहां की महिलाओं को इस कार्य का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। आगामी 23, 24, 25 को उनकी प्रीतमलाल दुआ सभागार में प्रदर्शनी लगने वाली है, जिसमें इंदौर के कलाकार, पेंटिंग, दीपावली से जुड़ी आकर्षक सामग्री का प्रदर्शन होगा। इसमें वे महिलाएं भी शामिल होंगी जिन्होंने हेमलताजी से प्रशिक्षण लेकर स्वयं को स्वावलंबी बनाया है।़