इंदौर: मातृशक्ति की जागृति और प्रयास का ही प्रतिफल है कि 'जहां चाह-वहां राह का जीवंत उदाहरण बन गया है इंदौर के मानपुर का ग्रामीण क्षेत्र नाहरखोदरा। यहां की महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मिलेट्स भोजन (मोटा अनाज) को बढ़ावा देने के आह्वान को भी साकार कर दिखाया है। क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने, 'वन संचार' या फिर छुट्टियों में आने वाले परिवारों, समूहों को मिलेट्स का भोजन मिलता है। इससे समूह की आर्थिक समृद्धि, परंपरागत भोजन को बढ़ावा देने की पहल और पूर्णत: प्रकृति से ओतप्रोत वातावरण की अनुभूति आगंतुकों को होती है।
जनजातीय मातृशक्ति इंदौर विभाग की कार्यकर्ता सोनम निनामा ने ग्राम विकास का कार्य करते हुए तीन वर्ष पूर्व एक सकारात्मक पहल की। इससे ग्राम नाहरखोदरा की उन बहनों को बड़ा संबल मिला, जो स्वयं सहायता समूह चलाकर ग्राम विकास के साथ ही कौशल विकास एवं अन्य कार्यों में भागीदार बनती हैं। यहां पर पर्यावरण एवं प्राकृतिक दृष्टि से रमणीय क्षेत्रों की कमी नहीं है। ऐसे में 'वन संचार' के लिए विभिन्न समूह, सामाजिक संगठनों, संस्थाओं यहां तक कि मित्रों और परिवारों के समूह भी आते-जाते रहते हैं। सोनम के समूह ने प्रयास किया कि अगर उन्हें कोई समूह 'वन संचार' पर आने से पहले सूचित करता है तो वे उन्हें प्राकृतिक वातावरण में स्थानीय देशी भोजन के स्वाद का लुत्फ उठाने का भी अवसर देंगी। बस यहीं से यह पहल नये आयाम की तरफ बढ़ गई। जो प्रधानमंत्री से मिलेेट्स को बढ़ावा देने के लक्ष्य का भी पोषण कर रही है।

अभी तक 30 से अधिक बड़े आयोजन हो चुके
सोनम बताती हैं कि यहां पर 50 से 100 लोगों के समूह भी आते हैं। विभिन्न संगठनों, सेज विवि के कानून के विद्यार्थियों के समूह समेत 30 से अधिक बड़े आयोजन हो चुके हंै। पारिवारिक समूह एवं महिलाएं भी आती हैं। यहां पर आने वाले मेहमान प्रत्यक्ष रूप से महिलाओं को चूल्हे पर भोजन बनाते-पकाते देखकर उनसे चर्चा करती हैं। ग्राम परिवेश से जुड़ा भोजन तरीका सीखती हैं और अपना शहरी नया कुछ सिखाती भी हैं।
मोटा अनाज और परंपरागत स्वाद
स्वयं सहायता समूह की महिलाएं मिलेट्स अर्थात परंपरागत मोटा अनाज जिसमें मक्का, ज्वार, बाजरा की रोटी, स्थानीय स्तर पर उगने वाली भाजियां और देशी सब्जियों के साथ देशी पद्धति से भोजन बनाती हैं। अनेक बार मांग पर दाल-पानिये के साथ ही मोटे अनाज की रोटी तथा मांग अनुसार उड़द, चवले, चना की परंपरागत दाल भी परोसी जाती है। संपूर्ण भोजन चूल्हे पर बनता है और स्वयं सहायता समूह की महिलाएं ही यह भोजन बनाती हंै। 120 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।

ग्राम में दो समूह, 30 से अधिक महिलाएं
सोनम बताती हैं कि ग्राम विकास एवं जनजातीय मातृशक्ति विभाग के अंतर्गत संगठन के प्रयास से ही यहां पर दो स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं, जो स्वदेशी, आत्मनिर्भर एवं पर्यावरण अनुकूल कार्यों में भागीदार बनकर विगत तीन साल से वन भ्रमण करने आने वाले लोगों का परिवार की भांति ध्यान रखकर उनको न केवल भोजन करवाते हैं, बल्कि उनसे पौधारोपण करवाकर प्रकृति से भी प्रत्यक्ष रूप से जोड़ने का प्रयास करते हैं। नाहर खेड़ी, मानपुर, खुरदी, गोकुलायकुंड की सोरम, सोना, पुनी, मिश्री, सरोपी, रीना, पिंकी, शिकन्या, सीमा समेत अनेक मातृशक्ति कार्य से जुड़ी हैं।
पौधारोपण करवाकर लेती हैं जिम्मेदारी
यहां की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं 'वन भ्रमण' पर आने वाले मेहमानों से फॉरेस्ट परिसर में पौधारोपण करवाती हैं। वहां पर नाम पट्टिका भी लगवाई जाती है और उस पौधे का संरक्षण, देखभाल का विश्वास यह महिला समूह यह कहकर दिलाता है कि भविष्य में छह माह, साल-दो साल बाद आप जब आएंगे तो यहां पौधा आपको बड़ा होता या वृक्ष रूप लेता जरूर मिलेगा। इससे लोगों का प्रकृति से जुड़ाव अटूट होता है।
शहरी सोनम ने गांव में पढ़ाया स्वावलंबन का पाठ
सोनम निनामा भील जनजाति, गरीब-मजदूर परिवार पृष्ठभूमि से आती हैं, लेकिन इंदौर शहर में उनका जन्म हुआ और विवाह के बाद नियति उन्हें गांव ले गई। शहरी बिटिया ने गांव में भी अपनी संस्कृति के संरक्षण का दायित्व निर्वाह करते हुए ग्रामीण महिलाओं को स्वदेशी से स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया। सोनम भील जनजाति की संस्कृति एवं साहित्य अध्ययन पर पीएचडी कर रही हैं, जिसमें भीली लोक संस्कृति पर केंद्रित 'भीली वीया गीत' पुस्तक भी लिखी। आत्मनिर्भरता के मान से सिलाई कार्य सीखा और उसका प्रशिक्षण दिया। दीपावली पर इलेक्ट्रिक झालरें बनाईं, जो कि 24 रुपए में बेचीं।
कौशल विकास की दृष्टि से महिलाओं में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए अचार-पापड़, बड़ी बनाने के लिए 2022 में तीन महिला समूह गठित करके उनकी आजीविका का संवर्धन किया। अपनी आदिवासी संस्कृति को शहर से गांव में जाकर ना केवल सोनम निनामा ने संरक्षित किया, बल्कि महिलाओं को भी उत्साह से आगे बढ़कर अपने सपने साकार करते हुए आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया।