Droupadi Murmu Bastar Visit: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर पहुंचीं। जगदलपुर में उन्होंने मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन किए और इसके बाद पारंपरिक मुरिया दरबार में शामिल हुईं। अब उनके कार्यक्रम में लालबाग मैदान की आमसभा प्रमुख है, जहां वे लोगों को संबोधित करेंगी। इस दौरान जनजातीय समाज की पारंपरिक कला और संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी.राष्ट्रपति के इस दौरे पर राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी उनके साथ मौजूद रहे। बस्तर दशहरे की परंपराओं के बीच राष्ट्रपति की मुरिया दरबार में मौजूदगी को खास माना जा रहा है।
मां दंतेश्वरी मंदिर में पूजा, फिर मुरिया दरबार पहुंचीं राष्ट्रपति
जगदलपुर पहुंचने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सबसे पहले मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे सिरहासार भवन में आयोजित मुरिया दरबार पहुंचीं। यहां बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही.मुरिया दरबार बस्तर दशहरे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस आयोजन में स्थानीय जनजातीय समाज की परंपराएं और सामुदायिक व्यवस्था दिखाई देती है। राष्ट्रपति के दौरे के दौरान मांझी-मुखिया और अन्य जनजातीय प्रतिनिधियों से मुलाकात भी कार्यक्रम का हिस्सा है।
साढ़े पांच घंटे जगदलपुर में रहेंगी मुर्मू
निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करीब साढ़े पांच घंटे जगदलपुर में रहेंगी। मुरिया दरबार के बाद वे लालबाग मैदान पहुंचेंगी, जहां बस्तर दशहरा प्रदर्शनी का अवलोकन करने और आमसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम है.इसके बाद राष्ट्रपति मांझी-मुखिया के साथ भोजन करेंगी। कार्यक्रम पूरा होने पर वे जगदलपुर से रवाना होकर रायपुर के रास्ते नई दिल्ली लौटेंगी।
लालबाग मैदान में दिखेगी बस्तर की जनजातीय कला
राष्ट्रपति के स्वागत और कार्यक्रम के लिए स्थानीय जनजातीय कलाकार भी तैयार हैं। पारंपरिक वेशभूषा में गौर सींग लेकर लालबाग मैदान की ओर जाते कलाकारों में उत्साह देखा गया। कलाकारों को राष्ट्रपति के सामने अपनी पारंपरिक कला प्रस्तुत करनी है।बस्तर की सांस्कृतिक पहचान में जनजातीय नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र और विशिष्ट वेशभूषा की अहम भूमिका है। ऐसे आयोजनों के जरिए स्थानीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक विरासत प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है।
मुरिया दरबार का क्या है महत्व?
बस्तर दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय परंपराओं को प्रमुखता दी जाती है। यह पर्व करीब 75 दिनों तक चलता है और इसमें कई विशिष्ट रस्में निभाई जाती हैं.मुरिया दरबार इसी परंपरा का हिस्सा है। इसमें जनजातीय समाज के प्रतिनिधि जुटते हैं और बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की झलक मिलती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का इस आयोजन में शामिल होना क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय समुदायों के साथ संवाद के लिहाज से महत्वपूर्ण है.अब सभी की नजरें लालबाग मैदान में होने वाली आमसभा और राष्ट्रपति के संबोधन पर रहेंगी।
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