इंदौर: समाज के रीति-रिवाज, कला, परंपरा, संस्कार, संस्कृति, व्यवहार, खानपान, वेशभूषा, बोली और लोकगीत संयुक्त रूप से उसका प्रतिनिधित्व ही नहीं करते, बल्कि इन्हीं सबसे 'पंचज' अर्थात जन, जल, जंगल, जमीन और जानवर की संतुलन जीवनशैली विकसित होती है। यह कार्य वैसे तो प्रत्येक नागरिक का है, लेकिन समाज के नाते जब कोई पेशेवर कार्य शिक्षा-उच्च शिक्षा के साथ जनजातीय परंपरा को सशक्त करने का बीड़ा उठा ले, 150 से अधिक जनजातीय पालवी लोकगीतों का दस्तावेजीकरण कर दे तो इसे 'अपनी परंपरा' और 'अपना अभिमान' के रूप मेें देखना चाहिए।
जनजातीय अंचल की बालिका और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर प्रियंका तोमर इसी राह पर आगे बढ़ रही हंै। जनजातीय समुदाय की भाषा, संस्कृति, परंपरा, शिक्षा एवं सामाजिक मुद्दों को व्यापक फलक पर लाने के लिए उनके प्रयास सराहनीय हंै, क्योंकि वे वर्तमान युवा पीढ़ी को जनजातीय समुदाय की संपूर्ण संस्कृति से जोड़े रखने का अनथक प्रयास कर रही हैं।
यह प्लेटफॉर्म मनोरंजन का माध्यम नहीं
मध्यप्रदेश के वनवासी अंचल आलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा तहसील के ग्राम नानीबड़ोई की निवासी प्रियंका ने 9वीं तक की शिक्षा कस्तूरबाग्राम से प्राप्त की। इसके बाद बीएससी कम्प्यूटर साइंस, पीजीडीसीए, जनजातीय अध्ययन में एमए करने के बाद वर्तमान में जनजातीय शोध के लिए पीएचडी कर रही हैं। यह तो उनका पेशेवर रूप में व्यक्तिगत कार्य है, लेकिन प्रियंका ने सामाजिक सरोकार और उससे जुड़े दायित्व का भी बखूबी निर्वहन किया है। जब युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया का उपयोग सिर्फ मनोरंजन तक सीमित करके बैठा है, वहीं पर प्रियंका ने इसे जनजातीय समाज से परिचय करवाने का माध्यम बना लिया।

मुख्यमंत्री द्वारा दो बार सम्मानित
प्रियंका को जनजातीय समाज की परंपराओं पर 'रील क्रिएशन' के लिए जनजातीय प्रज्ञा प्रवाह सम्मान से एवं बलराम कृषि सम्मान से भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दो बार सम्मानित किया है। राज्यपाल के सिकल सेल जागरूकता अभियान का 1 जुलाई से 15 नवंबर तक आदिवासी बोली में प्रचार-प्रसार का प्रियंका को अवसर मिला।
जनजातीय पर 3 शोध-पत्र प्रकाशित
प्रियंका ने उच्च शिक्षा के साथ जनजातीय केंद्रित 3 लघु शोध किए हैं, जिनमें पहला - आदिवासी लोक गीत : एक सांस्कृतिक परंपरा व सामाजिक दर्शन। दूसरा - अखात्री (अक्षय तृतीया) का आध्यात्मिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक दर्शन (भीलाला-राठवा के संदर्भ में) और तीसरा - भीलाला आदिवासी पिथौरा बाबा प्रकृति संरक्षण का संदेश, जो अलग-अलग शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
मतदान और सिकल सेल के लिए किया जागरूक-जनजातीय परंपरा, रीति-रिवाज और बोली को व्यापकता देने के लिए सोशल मीडिया पर प्रियंका ने 'रील क्रिएशन' का कार्य प्रामाणिकता के साथ किया। मतदान के लिए सरकारी स्तर पर प्रियंका को अधिकृत किया गया। उन्होंने गत चुनाव में मताधिकार के प्रयोग के लिए जागरूक किया। यही नहीं सिकल सेल एनीमिया से मुक्ति के लिए जागरूकता अभियान को भी प्रभावशाली तरीके से रखा।

भीली-बारेली-पालवी-राठिया का ऐसे उपयोग
भीली, भीलाली, बरेला, पावरा एवं राठवा बोलियों का ज्ञान रखने वाली प्रियंका का कहना है कि आलीराजपुर में मुख्यत: भीलाला समाज राठिया-पालवी बोलते हैं। गुजरात से सटे भील-भीली-भीलाला का उपयोग करते हैं। जैसे 'क्या कर रहे हो' को राठिया-बारेली में 'काई कोरे', पालवी में 'को करे', भीली में 'हूं करी रो', धापलिया में 'काई करी रा' उच्चारण रहता है, जबकि धापलिया में निमाड़ी टच है, अत: 'इधर आ' को धापलिया में 'अलेंग आव', पालवी में 'ओरही आव', राठिया में 'इन खुर आव' रहता है। स्थान के मान से भी बोली का उच्चारण बदलता है।
'जंगल रखवाले रे आदिवासी' को 132 मिलियन व्यू
प्रियंका का आदिवासी गीत 'जंगल रखवाले रे आदिवासी' को यूट्यूब पर 5 वर्ष पूर्व 9 अगस्त 2021 को जनजातीय दिवस पर जारी किया गया था, जिसको 849द्म लाइक और 132 मिलियन व्यू मिल चुके हैं। यही नहीं प्रियंका के अभी जनजातीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयास में इंस्टाग्राम पर 1 लाख 18 हजार और फेसबुक पर 57 हजार से अधिक फॉलोअर्स हैं।

पालवी पहेलियों पर भी ध्यान
प्रियंका ने जनजातीय बोली भीली में गुनगुनाए जाने वाले लोक गीतों जो कि मूलत: पालवी लोक गीत के रूप में पहचान रखते हैं, इन 150 पालवी लोक गीतों का हिन्दी अनुवाद शब्दार्थ के साथ संग्रहण व दस्तावेजीकरण किया। इनकी संख्या 170 भी संभव है। प्रियंका ने पालवी बोली के शब्दों, मौखिक साहित्य, लोक कथाओं, पहेलियों, कहावतों को भी संरक्षित करने का बीड़ा उठाया है।