- हरदोई के 'माननीयों' में तीन ही वोटर, जिपं अध्यक्ष, दोनों सांसद, पांच विधायक, एमएलसी के नाम सूची से 'तिरोहित'
- भाजपा के चुनावी प्रबंधन पर सवाल, मीडिया प्रभारी और एक उपाध्यक्ष एक पूरी रात, एक आधा दिन बीतने के बाद भी नहीं दे पाए 'संकल्प-पत्र'
बृजेश 'कबीर', हरदोई: विधान परिषद के लखनऊ खण्ड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में प्रत्याशियों के पते से शुरू हुई पड़ताल जनपद के माननीयों तक पहुंची तो तस्वीर चौंकाने वाली मिली। आठ विधायकों और दो सांसदों में केवल तीन विधायकों के ही नाम मतदाता सूची में मिले। सवायजपुर विधायक माधवेन्द्र प्रताप सिंह ‘रानू’ (इनके सहोदर अनुज धीरेन्द्र प्रताप सेनानी भी), शाहाबाद विधायक रजनी तिवारी और सदर विधायक नितिन अग्रवाल ही इस सूची में मतदाता हैं। बाकी जनप्रतिनिधियों से बातचीत में भी उनके नाम सूची में नहीं होने की पुष्टि हुई।
प्रथम नागरिक प्रेमावती ही सूचीबद्ध नहीं
जिला पंचायत अध्यक्ष प्रेमावती, उनके पति भाजपा अवध क्षेत्र उपाध्यक्ष पीके वर्मा और उनके पुत्रों इंजीनियर धीरज और डॉक्टर धीरज के नाम भी मतदाता सूची में नहीं दिख रहे। इस बाबत धीरज से बात हुई तो उन्होंने बताया, उन्होंने अपेक्षित संख्या में फॉर्म भरवा कर जमा करा दिए थे। बोले, अहिरोरी से देखते हैं और होने पर सूचना देते हैं।
बब्बन हैं वोटर, पापा 'आउट', बेटा 'इन'
अलबत्ता, भाजपा जिलाध्यक्ष अजीत सिंह बब्बन पुत्र महिपाल सिंह, निवासी महुईपुरी, सूची में भाग संख्या-67 के क्रम सांख्य-25 पर दर्ज हैं। सदर सांसद जय प्रकाश, मिश्रिख सांसद अशोक रावत, सांडी विधायक प्रभाष कुमार, बालामऊ विधायक रामपाल वर्मा ने स्नातक मतदाता सूची में नाम नहीं होने की ’स्वदेश’ से पुष्टि की। गोपामऊ विधायक श्याम प्रकाश ने कहा, नाम है, पर पता नहीं कैसे इधर का उधर हो गया। अहिरोरी का टड़ियावां और टड़ियावां का अहिरोरी हो गया। इधर उधर में कहां होने की पुष्टि मिली, इस सवाल पर विधायक बोले, दिखवा रहे हैं। हालांकि उनके पुत्र रवि प्रकाश (टड़ियावां ब्लॉक प्रमुख) का नाम मतदाता सूची में है।


अलका बोलीं-लखनऊ से वोटर, आशू का 'नो वोटर रिकॉर्ड्स फाउंड'
मतदाता सूची में हेरफेर की बात प्रभाष ने भी कही। बोले- अहिरोरी के सांडी-बावन, सांडी के बिलग्राम में दर्ज, पता नहीं किस स्तर का झोल हुआ है। संडीला विधायक अलका सिंह 'अर्कवंशी' ने अपना मत लखनऊ में होना बताया। हालांकि, सिस्टम में 'नो वोटर रिकॉर्ड्स फाउंड' शो करता रहा। बिलग्राम-मल्लावां विधायक आशीष कुमार सिंह 'आशू' भी 'नो वोटर रिकॉर्ड्स फाउंड' वाले दिखे। बात का प्रयास किया, पर कॉल पिक नहीं हुई। यहां सवाल किसी की शैक्षिक योग्यता का नहीं, स्नातक मतदाता बतौर पंजीकरण और चुनावी भागीदारी का है। लेकिन जब सत्ता दल के जनप्रतिनिधियों के बीच ही इस चुनाव के मतदाताओं की संख्या इतनी सीमित दिखती है, तो स्नातक वर्ग के बीच राजनीतिक दलों की पहुंच और सक्रियता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अपने माननीय ही मतदाता नहीं, संगठन किसके भरोसे?
भाजपा के लिए यह सवाल इसलिए अहम है कि यह चुनाव आसन्न विधानसभा चुनाव का 'लिटमस टेस्ट' माना जा रहा। पार्टी ने इंजीनियर अवनीश कुमार सिंह को दोहराया है। प्रत्याशी की तैयारी, संगठन की सक्रियता और समर्थकों की लामबंदी चुनाव के अहम हिस्से हैं। ऐसे में जिले के अधिकांश प्रमुख जनप्रतिनिधियों के मतदाता न होने की स्थिति पार्टी और लोकल के तकरीबन 48 हजार वोटर्स के लिए एक असहज सवाल जरूर खड़ा करती है, क्या स्नातक मतदाताओं के बीच संपर्क और पंजीकरण को लेकर संगठन ने अपेक्षित गंभीरता दिखाई?
चाकचौबंद इंतजाम में बदइंतजामी कैसे? बब्बन बोले-हम वोट ही जमा कर सकते
ध्यान रहे, चुनाव में प्रतीक और संदेश भी मायने रखते हैं। जब जनप्रतिनिधि अपने ही निर्वाचन क्षेत्र के स्नातक मतदाता नहीं हैं, तो आम स्नातकों को मतदान के लिए प्रेरित करने की मुहिम का संदेश कितना प्रभावी होगा, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जिलाध्यक्ष ने एक घण्टे का समय मांगा था, रपट उसके बाद फ़ाइल की है। उससे पहले उनका कहना था, नाम सबके हैं, थोड़ा इधर उधर हो गए हैं, वोट इधर उधर हुए हैं। प्रभाष से हुई बातचीत के जिक्र पर कहा, ये तो है, यही तो संकट है। पार्टी की चाकचौबंद तैयारी के दावों के बीच कैसे हो गया? इस सवाल पर बब्बन बोले- क्या बताएं, हम लोग तो वोट जमा ही कर सकते हैं।

सपा का संकल्प पत्र सामने, भाजपा के वायदों का इंतजार
चुनावी मुकाबले का दूसरा पहलू प्रत्याशियों के वायदों से जुड़ा है। समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी कांति सिंह का रोडमैप सामने है। इसमें जनकल्याण के कामों को बढ़ाने, बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा, स्नातकों की समस्याओं के निदान की सशक्त पहल और शिक्षित बेरोजगारों की करियर काउंसिलिंग जैसे वायदे हैं। शिक्षकों और कर्मचारियों को पुरानी पेंशन दिलाने, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों, वित्तविहीन शिक्षकों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को उचित वेतन दिलाने की बात भी कही है। वित्तविहीन शिक्षकों को उचित मानदेय और अन्वेषण, नवाचार तथा तकनीकी उपक्रमों को दूर-दराज गांवों तक पहुंचाने का वायदा भी है। पुरानी पेंशन का मुद्दा खास महत्व रखता है, क्योंकि यह शिक्षकों और कर्मचारियों की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है।
दूसरी ओर, भाजपा प्रत्याशी के संकल्प पत्र की जानकारी हासिल करने की कोशिश का परिणाम अब तक सामने नहीं आया। मंगलवार शाम को भाजपा के मीडिया प्रभारी और चुनाव अभियान से जुड़े एक उपाध्यक्ष से इस संबंध में जानकारी मांगी गई थी। एक ने बाहर होने की बात कही, जबकि दूसरे ने संकल्प पत्र अपने पास न होने और उपलब्ध होने पर देने की बात कही। स्टोरी लिखे जाने तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। यह महज एक दस्तावेज का मामला नहीं है। स्नातक मतदाता शिक्षा, रोजगार, पेंशन, मानदेय और पेशेवर समस्याओं पर प्रत्याशियों से स्पष्ट जवाब चाहते हैं। ऐसे में चुनाव अभियान से जुड़े पदाधिकारियों के पास प्रत्याशी के संकल्प पत्र की जानकारी उपलब्ध न होना चुनावी संवाद और तैयारी पर सवाल जरूर खड़ा करता है।

चुनावी गाड़ी को ईंधन कहां से मिलेगा?
स्नातक एमएलसी चुनाव की यह पड़ताल प्रत्याशियों के पते और स्थानीय जुड़ाव की चर्चा से शुरू हुई थी। आगे बढ़ी तो मतदाता सूची तक पहुंची और फिर जनप्रतिनिधियों की स्थिति सामने आई। अब सवाल केवल यह नहीं कि कौन कहां का निवासी है, यह भी है कि स्नातक मतदाताओं के बीच कौन-सा दल अपने मुद्दे, वायदे और चुनावी तैयारी कितनी प्रभावी ढंग से रख पा रहा है।भाजपा के सामने अपने प्रत्याशी के पक्ष में संगठन और समर्थकों को सक्रिय करने की चुनौती है। सपा ने अपने रोडमैप में शिक्षकों, कर्मचारियों, बेरोजगारों और स्नातकों से जुड़े मुद्दे रखे हैं। मतदाता इन वायदों की व्यवहारिकता और उन्हें पूरा कराने की क्षमता को विवेक से परखेंगे।
वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था...
यह चुनाव केवल नाम, पते या राजनीतिक पहचान का नहीं है। यह उस वर्ग के प्रतिनिधित्व का चुनाव है, जो शिक्षा, रोजगार और पेशेवर समस्याओं पर आवाज विधान परिषद तक पहुंचाना चाहता है। हरदोई के माननीयों में केवल तीन का मतदाता होना और बाकी का इस सूची से बाहर रहना राजनीतिक दलों के लिए एक संकेत है। सवाल यही है, जब जनप्रतिनिधियों के बीच ही स्नातक मतदाताओं की भागीदारी सीमित है, तो आम स्नातक तक पहुंचने की चुनावी तैयारी कितनी जमीन पर है? इस पूरी रपट को लाला माधव राम जौहर की एक ग़ज़ल की इन लाइनों में बांधा जा सकता है...
क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था,
कुछ भी न था हवा थी कहानी थी ख़्वाब था...
अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहाँ,
वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था...