धर्म। राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली राधा अष्टमी इस साल 19 सितंबर को पड़ रही है। पंचांग के मुताबिक भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 सितंबर की दोपहर 1 बजकर 2 मिनट से शुरू होगी और 19 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। चूंकि 19 सितंबर को सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए उदया तिथि के हिसाब से यही दिन पर्व के तौर पर मान्य होगा।
अष्टमी तिथि का समय क्या रहेगा
पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर को दोपहर बाद हो जाएगी, लेकिन उदय काल में अष्टमी 19 सितंबर को ही मिलेगी। यही वजह है कि ज्योतिष परंपरा में उदया तिथि को आधार मानकर 19 सितंबर को ही राधा अष्टमी मनाने का निर्णय लिया गया है। ब्रज क्षेत्र में यह पर्व खास उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां राधा रानी और श्रीकृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है।
पूजा का शुभ मुहूर्त कब से कब तक
नई दिल्ली के पंचांग के हिसाब से 19 सितंबर को सुबह 11 बजकर 1 मिनट से दोपहर 1 बजकर 28 मिनट तक राधा रानी की पूजा के लिए मध्याह्न मुहूर्त सबसे उत्तम माना गया है। हालांकि अलग अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में फर्क होने के कारण पूजा के समय में कुछ मिनटों का हेरफेर संभव है, इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग से भी मुहूर्त जरूर जांच लेना चाहिए।
पूजा विधि में किन बातों का रखें ध्यान
राधा अष्टमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद पूजा स्थल की सफाई कर राधा रानी और श्रीकृष्ण की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। इसके बाद दीपक जलाकर पूजा आरंभ करें। राधा रानी को फूल, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने के बाद राधा कृष्ण के मंत्रों का जाप कर आरती करनी चाहिए। श्रद्धा अनुसार भक्तों में प्रसाद बांटना भी परंपरा का हिस्सा है।
व्रत रखने वालों को कब करना है पारण
राधा अष्टमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं। पंचांग के अनुसार व्रत का पारण 20 सितंबर को सुबह 6 बजकर 8 मिनट के बाद किया जा सकता है। हालांकि अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में पारण को लेकर परंपराएं अलग अलग होती हैं, इसलिए व्रती अपने क्षेत्रीय पंचांग और पारिवारिक रीति के अनुसार ही पारण का निर्णय लें। राधा अष्टमी को राधा रानी के जन्मोत्सव के तौर पर मनाया जाता है और वैष्णव परंपरा में उन्हें श्रीकृष्ण की परम भक्त और आराध्य शक्ति के रूप में पूजा जाता है। इस मौके पर बरसाना, वृंदावन समेत ब्रज के तमाम मंदिरों को सजाया जाता है और विशेष पूजा, अभिषेक, आरती तथा भजन कीर्तन का आयोजन होता है।