आष्ढा गणेश चतुर्थी उत्सव में, बच्चों का निस्वार्थ प्रेम गणेश जी को सजाने और उनका स्वागत करने में नजर आया, जो पवित्र परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों का जश्न मनाते हुए मंचों पर लहराया
आष्टा गणेश चतुर्थी के पावन पर्व का शंखनाद होते ही पूरा शहर गजानन की भक्ति में पूरी तरह लीन हो गया है, लेकिन इस वर्ष प्रतिमा स्थापना के दौरान जो सबसे अद्भुत और मनमोहक नजारा देखने को मिला, वह था बच्चों का असीम उत्साह। गली-मोहल्लों से लेकर मुख्य चौराहों तक, हर तरफ गूंजते ’’गणपति बाप्पा मोरया’’ के जयकारों में सबसे ऊंचे और मीठे स्वर नन्हे-मुन्ने बच्चों के ही थे। सुबह से ही सड़कों पर एक अलग ही जादुई रौनक छाई हुई थी। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे बच्चे, माथे पर लाल तिलक और मुट्ठी में गुलाल लिए, अपने सबसे प्रिय बप्पा को घर और पंडालों तक लाने के लिए सबसे आगे चल रहे थे। ढोल-ताशों की थाप पर बड़ों से ज्यादा बच्चों के कदम थिरक रहे थे। किसी टोली में छोटे बच्चे पूरे जोश के साथ झांझ-मंजीरे बजाते नजर आए, तो कहीं छोटी बच्चियां अपनी सहेलियों के साथ गरबा और पारंपरिक नृत्य कर गजानन का स्वागत कर रही थीं। उनका यह निश्छल और पवित्र उत्साह हर दर्शक के चेहरे पर मुस्कान ला रहा था। इन नन्हे भक्तों की श्रद्धा केवल नाच-गाने तक सीमित नहीं थी। मूर्तियों की स्थापना और पंडालों की साज-सज्जा में भी बच्चों ने मुख्य भूमिका निभाई। अपनी पॉकेट मनी जोड़कर अपने लिए अलग से छोटी-छोटी इको-फ्रेंडली मूर्तियां लाने से लेकर, तोरण बांधने, रंगोली में रंग भरने और गेंदे के फूलों की लड़ियां सजाने तक की जिम्मेदारी बच्चों ने अपने नन्हे हाथों में ले रखी थी। जिस सावधानी, आदर और प्रेम के साथ वे गजानन की मूर्ति को अपने हाथों में थामकर चल रहे थे, वह दृश्य हृदय को भावविभोर कर देने वाला था। हवा में उड़ता। आष्टा के इस उत्सव में बच्चों की यह असीमित ऊर्जा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उनके बचपन की मासूमियत और गहरी सांस्कृतिक जड़ों का एक खूबसूरत संगम बन गई है। बप्पा के प्रति उनका यह निस्वार्थ प्रेम देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात बाल गणेश अपने सखाओं के साथ खेलने की गलियों में उतर आए हों।