बंदियों को अक्षरज्ञान से संस्कार तक देने वाले माणिकचंद्र वाजपेयी 'मामाजी'
इंदौर। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 1975 से 1977 तक का आपातकाल एक ऐसा स्याह अध्याय है, जिसकी स्मृतियां आज भी पुलिस और प्रशासनिक ज्यादतियों, जेलों की बंदिशों और हजारों मीसाबंदियों के संघर्ष की तस्वीरें आंखों के सामने ला देती हैं। लेकिन इन्हीं अंधेरे दिनों में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी थे, जिन्होंने कारागार की दीवारों को अपनी कर्मभूमि बना लिया। 'स्वदेश' के प्रधान संपादक, लेखक, संगठनकर्ता और जीवनपर्यंत समर्पित स्वयंसेवक माणिकचंद्र वाजपेयी 'मामाजी' उन्हीं में से एक थे। जेल में रहते हुए उन्होंने ग्रामीण बंदियों को पढ़ना-लिखना सिखाया, युवाओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाया और जेल कर्मचारियों तक के प्रति आत्मीयता का व्यवहार रखा। आपातकाल ने उनकी स्वतंत्रता छीनी, लेकिन उनकी कर्मशीलता और समाज-निर्माण की चेतना को कैद नहीं कर सका।
27 जून 1975 को इंदौर स्थित संघ कार्यालय से सुदर्शनजी और चितलेजी की गिरफ्तारी के कुछ ही घंटे बाद 'स्वदेश' के प्रधान संपादक माणिकचंद्र वाजपेयी 'मामाजी' तथा समाचार पत्र के संपादक और संचालक मंडल के सदस्यों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। 'स्वदेश' पर प्रतिबंध लगा दिया गया और बंदियों को अलग-अलग जेलों में भेजा गया। मामाजी को प्रारंभ में दो-तीन माह केंद्रीय जेल में रखा गया, बाद में जिला जेल स्थानांतरित किया गया। करीब 19 माह के इस कारावास ने उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने रखा, जिसमें पत्रकार और संगठनकर्ता के भीतर छिपा शिक्षक सबसे अधिक मुखर हुआ।
सलाखों के पीछे खुली 'पाठशाला'-मामाजी जेल की बैरक में केवल प्रार्थना, भोजन और विश्राम के समय तक सीमित नहीं रहते थे। शेष समय विशेषकर ग्रामीण और निरक्षर बंदियों के बीच बिताते। उन्हें अक्षर ज्ञान कराते, नाम लिखना सिखाते और पढ़ने की आदत डालते। वे केवल अक्षरों से परिचित नहीं कराते थे, बल्कि उन्हें उन परिस्थितियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करते थे, जिनके कारण वे जेल तक पहुंचे। भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो, इसका संकल्प भी दिलाते। बंदियों के परिजन जब मुलाकात के लिए आते और अपने प्रियजनों में सकारात्मक परिवर्तन देखते तो उसका श्रेय मामाजी को देना नहीं भूलते। इस तरह जेल की सलाखों के पीछे उन्होंने एक अनौपचारिक पाठशाला खड़ी कर दी थी।
युवा मीसाबंदियों को अनुशासन का पाठ
12 अगस्त 1975 को इंदौर के 26 से अधिक युवा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर केंद्रीय जेल में निरुद्ध किया गया। युवा कार्यकर्ताओं का जोश कई बार जेल की व्यवस्था से टकरा जाता। वे बैरकों में घूमते, जेल अधिकारियों से बहस करते और कभी पुलिसकर्मियों से भी सख्ती से उन्हें रोकते। उनका स्पष्ट उलझ जाते। ऐसे अवसरों पर मामाजी कहना था- हमारी लड़ाई सता से है, जेल कर्मचारियों से नहीं। वे नियुक्त्त कैदी बंधुओं के साथ भी सभ्य व्यवहार करने की सीख देते। उनके लिए अनुशासन कोई बाहरी बंधन नहीं, बल्कि स्वयंसेवक के चरित्र का स्वाभाविक हिस्सा था।
जेल अधिकारी भी करते थे सम्मान
मामाजी का व्यवहार किसी प्रभावशाली संपादक के धौस-प्रभाव वाला नहीं, बल्कि एक सुलझे हुए अभिभावक जैसा था। वे आम कैदियों से जितनी आत्मीयता रखते, जेल कर्मचारियों का भी उतना ही ध्यान रखते। संध्याकाल में बैरकों के मंदिरों में को भी इसके लिए प्रेरित करते। जेल के नियमों का स्वयं कड़ाई से पालन करते और दूसरों को भी उसका अक्षरश: होने वाली पूजा-आरती में वे नियमित सम्मिलित होते और युवा बंदियों पालन करने की सीख देते। इसी कारण जेल अधिकारी भी उनका सम्मान करते थे। लेकिन उन्होंने कभी इन संबंधों का निजी लाभ नहीं उठाया।
चार घंटे की पैरोल और एक अनकहा दुःख
जिला जेल में स्थानांतरण के कुछ समय बाद उनकी धर्मपरायण पत्नी श्रीमती सरला वाजपेयी ' मामीजी' का निधन हो गया। पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के प्रयास से मामाजी को अंतिम संस्कार के लिए केवल चार घंटे की पैरोल मिली। पुलिस अभिरक्षा में उन्हें मुक्तिधाम ले जाया गया और अंतिम संस्कार के बाद पुनः जेल पहुंचा दिया गया। यह पीड़ा किसी सामान्य व्यक्ति को भीतर से तोड़ सकती थी, लेकिन मामाजी ने अपने जीवन के इस सबसे निजी और हृदयविदारक प्रसंग को भी आत्मप्रशंसा का विषय नहीं बनाया। उनकी लगभग साढ़े छह सौ पृष्ठों की 'आपातकालीन संघर्ष गाथा' में भी इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता। यही उनकी आत्मसंयमित जीवन-दृष्टि थी।
सादगी ऐसी कि पहचानना भी कठिन
'सादा जीवन, उच्च विचार' उनके लिए केवल वाक्य नहीं, जीवन-पद्धति थी। इंदौर में कार्यक्रमों में जाने के लिए उनकी सवारी प्रायः साइकिल होती थी। एक बार जाल सभागार में प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित मामाजी कार्यक्रम शुरू होने से पहले अपनी पुरानी साइकिल से पहुंचे और भीतर जाकर बैठ गए। आयोजक बाहर उनका इंतजार करते रहे। जब किसी ने उन्हें भीतर बैठे देखा तो सब चकित रह गए। धोती, कुरता, सहज वेशभूषा और बिना किसी आडंबर के जीवन जीने वाला यह व्यक्तित्व ही आगे चलकर पत्रकारिता का चलता-फिरता विश्वविद्यालय बना।
'स्वदेश' और समाज के लिए आजीवन श्रम
आपातकाल के बाद भी ' स्वदेश' की चिंता उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही। छोटेलालजी नागर और मधुकररावजी चितले के साथ वे मालवा-निमाड़ और मध्यप्रदेश में आर्थिक प्रबंध, समाचार संकलन, ग्रामीण संवाददाताओं से संपर्क तथा नए पाठकों और अभिकर्ताओं को जोडने के लिए निरंतर प्रवास करते रहे। ग्रामीण समाज में वे इतनी सहजता से घुल-मिल जाते कि लोग उन्हें अपने घर का 'मामाजी' मानने लगे। किसानों के घर जाकर जलपान करना और उनके परिवारों से आत्मीय