ग्वालियर। इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं में दर्ज नहीं होता, वह उन घरों की स्मृतियों में भी सांस लेता है, जहां किसी अपने की प्रतीक्षा दरवाजे पर ठिठकी रहती है। डबरा के ग्राम इटायल निवासी स्वर्गीय गौरीशंकर रावत के परिवार के लिए आपातकाल ऐसी ही एक जीवंत स्मृति है। विरोध में सत्याग्रह करने पर जुलाई 1975 के प्रथम सप्ताह में गिरफ्तार हुए गौरीशंकर 19 महीने जेल में रहे। उनके साथ घर की हंसी भी और बच्चों की खुशियां भी कैद हो गई थीं।
गौरीशंकर रावत डबरा जनसंघ के महामंत्री रहे और भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। वे डबरा लोकसभा प्रभारी और किसान संघ डबरा अध्यक्ष भी रहे। आपातकाल के विरोध में सत्याग्रह करने के बाद पुलिस ने उन्हें डबरा बस स्टैंड से गिरफ्तार किया। पहले डबरा थाने और फिर ग्वालियर केंद्रीय जेल भेज दिया गया। अचानक हुई गिरफ्तारी से परिवार स्तब्ध रह गया। परिजनों को लगा कि कुछ दिनों में रिहाई हो जाएगी, लेकिन प्रतीक्षा लंबी होती चली गई।
सात बच्चों की आंखों में एक सवाल- गौरीशंकर के कंधों पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी थी।
पत्नी देवाबाई और सात बच्चों का संसार उनसे जुड़ा था। बड़े बेटे सुरेश की उम्र उस समय करीब 15 वर्ष थी, जबकि छोटे बेटे जितेंद्र महज तीन साल के। पांच बेटियां भी थीं। पिता के अचानक दूर हो जाने से बच्चों की दुनिया जैसे अधूरी हो गई। वे मां से बार बार पूछते 'पिताजी कब आएंगे?' देवाबाई के पास इस सवाल का कोई उत्तर नहीं था। उनके पास केवल पति की वापसी की उम्मीद और ईश्वर से की जाने वाली प्रार्थना थी। आपातकाल का भय घर की चौखट तक पहुंच गया था। कुछ रिश्तेदार और परिचित भी सरकारी खौफ के कारण दूरी बनाने लगे। मुखिया की अनुपस्थिति में पत्नी पर बच्चों और गृहस्थी का भार आ पड़ा। सबसे कठिन था यह जानना कि प्रतीक्षा की कोई निश्चित अवधि नहीं है।
त्योहार आए, लेकिन खुशियां नहींः रक्षा बंधन हो या दीपावली, त्योहार भी घर की उदासी दूर नहीं कर सके। दीपावली के दिन जिस आंगन में बच्चों की हंसी और आतिशबाजी गूंजनी चाहिए थी, वहां सन्नाटा पसरा रहा। औपचारिकता के लिए दीपक जलाए गए, लेकिन घर का मुखिया दूर जेल में था। इसलिए पर्व की रोशनी भी जैसे अधूरी थी। गौरीशंकर के छोटे बेटे जितेंद्र रावत बताते हैं कि उस समय वे बहुत छोटे थे। पिता की जेल यात्रा की अधिकांश बातें उन्होंने बाद में मां से सुनीं। उनकी मां बताया करती थीं कि पिताजी से मिलने उनके छोटे भाई अर्जुन सिंह जेल जाया करते थे। मुलाकात में वे परिवार को ढांढस देते और कहते समय जरूर बदलेगा, सब ठीक हो जाएगा।
19 महीने बाद घर लौटी दीपावली
फिर करीब 19 महीने बाद वह दिन आया, जिसका परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा था। गौरीशंकर जेल से रिहा होकर घर लौटे। उनकी वापसी के साथ जैसे पसरा अंधेरा छंट गया। उनके घर लौटते ही उदासी रौनक में बदल गई। जितेंद्र रावत बताते हैं कि पिता की वापसी किसी त्योहार से कम नहीं थी। ऐसा लगा, जैसे घर में फिर दीपावली आ गई हो। बच्चों की आंखों में चमक लौट आई। गौरीशंकर रावत की कहानी जेलयात्रा नहीं, बल्कि उस परिवार की पीड़ा की कथा है, जिसने आर्थिक संकट, सामाजिक दूरी और लंबी प्रतीक्षा को सहा। बच्चों का पिता की राह ताकना और फीके पड़े त्योहार उस दौर की अनकही पीड़ा को सामने लाते हैं। परिवार के लिए आपातकाल आज भी कोई केवल बीती तारीख नहीं, बल्कि 19 महीने का वह इंतजार है, जिसकी हर घड़ी में एक घर अपने मुखिया की राह देखता रहा। और जब वे लौटे तो लगा, जैसे केवल एक व्यक्ति नहीं, घर की खोई हुई खुशियां भी वापस लौट आई हों।
प्रस्तुतिः अभिषेक शर्मा