AI और पर्यावरण संरक्षण

एआई से पर्यावरण संरक्षण और मौसम का पूर्वानुमान

भारत में AI तकनीक जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में मदद कर रही है, मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन में सुधार कर रही है।

By : नरेंद्र कुमार
एआई से पर्यावरण संरक्षण और मौसम का पूर्वानुमान

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में एक शक्तिशाली उपकरण है। यह कंप्यूटरों को आँकड़ों से सीखने और निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। एआई प्रणालियाँ जलवायु संबंधी आँकड़ों का विश्लेषण करके मौसम पूर्वानुमान, जलवायु मॉडलिंग, अक्षय ऊर्जा, कृषि प्रबंधन और आपदा नियंत्रण को प्रभावी बनाती हैं। भारत में इन तकनीकों से मौसम पूर्वानुमान बेहतर हुआ है और उनका लाभ ग्राम पंचायत स्तर तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत फोरकास्टिंग सिस्टम छह किलोमीटर के उच्च रिजॉल्यूशन पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति है। समुद्र के जलस्तर की निगरानी और चक्रवातों की तीव्रता के आकलन में भी एआई सहायक है।

जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वास्तविकता है, जो जीवन और आजीविका को प्रभावित कर रही है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, चक्रवात, बाढ़, सूखा और भूस्खलन ने समय रहते खतरों का अनुमान लगाने की आवश्यकता बढ़ा दी है। भारत ने हरित क्षेत्र बढ़ाने, अक्षय ऊर्जा अपनाने, उत्सर्जन कम करने और मौसम पूर्वानुमान बेहतर बनाने के प्रयास किए हैं। इनमें एआई की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है।

भारतीय मौसम विभाग समुद्री तूफानों की निगरानी के लिए उपग्रहों के आँकड़ों और एआई-आधारित उपकरणों का उपयोग करता है। चक्रवात की तीव्रता के आकलन में उन्नत ड्वोरक तकनीक मदद करती है। मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यूरोपीय केंद्र से प्राप्त एआई-आधारित मार्गदर्शन भी उपयोगी है। इन तकनीकों से चक्रवात के बनने, उसकी दिशा, गति और तीव्रता का अनुमान लगाया जाता है। भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विकसित ट्रांसफॉर्मर-आधारित न्यूरल नेटवर्क मानसून के व्यवहार का लगभग 18 दिन पहले तक पूर्वानुमान लगा सकते हैं। एआई प्रणालियों से चक्रवात के मार्ग का पहले से अनुमान लगाने में सुधार हुआ है। इससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने, राहत एवं बचाव की तैयारी करने और बिजली-पानी जैसी सुविधाओं को नुकसान से बचाने में मदद मिलती है।

आपदा प्रबंधन में एआई का उपयोग चक्रवातों तक सीमित नहीं है। आईआईटी बॉम्बे ने स्पेशली अवेयर डोमेन एडाप्टेशन नेटवर्क नामक एआई मॉडल विकसित किया है, जो हवाई तस्वीरों से तूफानों के नुकसान का आकलन करता है। आईआईटी मद्रास जलवायु पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए रिलायबिलिटी एनसेंबल एवरेजिंग तकनीक का उपयोग कर रहा है।पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन एक गंभीर चुनौती है। इससे जनहानि होती है और बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचता है। भारत में विकसित एआई-आधारित चेतावनी प्रणाली मिट्टी की नमी, वर्षा, तापमान और जमीन की हलचल मापने वाले कम लागत के सेंसरों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण करती है। मशीन लर्निंग मॉडल संभावित खतरे की पहचान करता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, कुछ स्थानों पर यह प्रणाली भूस्खलन से लगभग तीन घंटे पहले चेतावनी देने और 90 प्रतिशत से अधिक सटीकता प्राप्त करने में सक्षम है। हिमाचल प्रदेश में 60 से अधिक स्थानों पर इसकी स्थापना से निगरानी व्यवस्था मजबूत हुई है। ऐसी प्रणालियाँ कम लागत में आपदा प्रबंधन की क्षमता बढ़ा सकती हैं।

बाढ़ की भविष्यवाणी और जल संसाधन प्रबंधन में एआई उपयोगी है। इसरो द्वारा वित्तपोषित इंडियन लैंड डेटा एसिमिलेशन सिस्टम में रिमोट सेंसिंग और कंप्यूटर मॉडल के माध्यम से भूमि की स्थिति का आकलन किया जाता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र क्षेत्रों में भौतिक विज्ञान पर आधारित मॉडलों तथा एआई की मदद से बाढ़ की आशंका का आकलन किया जाता है। आँकड़ों से संभावित जलभराव का अनुमान लगाया जा सकता है। चेतावनी मिलने पर प्रशासन लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने और राहत सामग्री जुटाने की तैयारी कर सकता है।मौसम संबंधी जानकारी गाँवों तक पहुँचाना एआई का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। भारतीय मौसम विभाग ने पंचायती राज मंत्रालय के सहयोग से ग्राम पंचायत स्तर पर मौसम पूर्वानुमान सेवा शुरू की है। विभिन्न मौसम मॉडलों से प्राप्त जानकारी के आधार पर किसान ई-ग्राम स्वराज, मेरी पंचायत और मौसम ग्राम जैसे माध्यमों से तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा और बादलों की स्थिति जान सकते हैं। इससे बुवाई, सिंचाई और कटाई के बेहतर निर्णय लेने तथा मौसम बदलने पर फसलों की सुरक्षा करने में मदद मिलती है। मौसम की जानकारी पहले मिलने से किसान सिंचाई का समय तय कर सकते हैं और बारिश या तेज हवा की आशंका होने पर कटाई की योजना बदल सकते हैं।

एआई आग, घने कोहरे, बिजली गिरने और गरज के साथ तूफान जैसी घटनाओं के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने में उपयोगी है। डीप लर्निंग मौसम के आँकड़ों का विश्लेषण करके वर्षा की संभावनाओं को समझने में सहायता करती है। इससे कृषि और परिवहन पर मौसम के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है।वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में भी एआई उपयोगी है। कैमरों से प्राप्त दृश्यों का विश्लेषण करने के लिए मशीन विजन का उपयोग किया जाता है। इससे जंगल में आग लगने के शुरुआती संकेतों, संदिग्ध गतिविधियों, अवैध अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की पहचान करने में मदद मिलती है। समय पर सूचना मिलने पर वन विभाग आग को फैलने से रोक सकता है। निगरानी प्रणालियाँ वन्यजीवों की आवाजाही की पहचान करके मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में सहायक हो सकती हैं।

शहरों को स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ बनाने में एआई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आईआईटी कानपुर के रिसर्च फाउंडेशन और आईआईटी दिल्ली ने टिकाऊ शहरों के लिए एआई तकनीक विकसित करने की पहल की है। इसका लक्ष्य वायु गुणवत्ता, बिजली, यातायात, कचरा प्रबंधन और डिजिटल सरकारी सेवाओं से जुड़ी समस्याओं का समाधान तलाशना है। स्मार्ट सेंसर हवा में प्रदूषकों और हानिकारक जैविक कणों यानी बायोएरोसोल की पहचान कर सकते हैं। आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का अनुमान लगाने के लिए एक एआई मॉडल विकसित किया है। यह गंगा के किनारे स्थित उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है, जहाँ भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी एक गंभीर चुनौती है।भारत एआई-आधारित जलवायु समाधानों के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। देश ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। अक्षय ऊर्जा, पर्यावरण-अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और आपदा पूर्वानुमान में एआई उपयोगी है। इसकी सफलता के लिए गुणवत्तापूर्ण आँकड़े, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मॉडल, विशेषज्ञों की उपलब्धता और आम लोगों तक समय पर चेतावनी पहुँचाने की व्यवस्था आवश्यक है। भविष्यवाणियों को वैज्ञानिक परीक्षण और मानवीय निर्णयों से जोड़ना भी जरूरी है।

स्पष्ट है कि एआई केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। खतरों का पहले अनुमान लगाकर जनहानि कम की जा सकती है, किसानों को मौसम के अनुरूप निर्णय लेने में मदद मिल सकती है और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जा सकती है। भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में एआई का जिम्मेदार उपयोग विशेष महत्त्व रखता है। वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रशासनिक तैयारी और जनभागीदारी के साथ इन तकनीकों का विस्तार पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु जोखिम प्रबंधन को नई दिशा दे सकता है। किफायती समाधान विकसित करके भारत संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण के अन्य देशों के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। इसका लाभ तभी व्यापक होगा, जब तकनीक सुलभ हो और स्थानीय समुदायों तक इसकी जानकारी सरल भाषा में पहुँचे। इसके लिए स्थानीय जरूरतों और वैज्ञानिक प्रमाणों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

एस. एन. वर्मा

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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