हर वर्ष जब बाबा अमरनाथ यात्रा प्रारम्भ होती है, तब जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था खड़ी करनी पड़ती है। हजारों सैनिक, केंद्रीय अर्धसैनिक बल, जम्मू-कश्मीर पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और प्रशासनिक अधिकारी केवल इस उद्देश्य से तैनात किए जाते हैं कि श्रद्धालु बिना किसी भय के अपनी धार्मिक यात्रा पूरी कर सकें। सड़कों पर कड़ी निगरानी रहती है, काफिलों को सुरक्षा दी जाती है और यात्रा का हर चरण सुरक्षा बलों की सतर्कता पर निर्भर करता है। यह दृश्य केवल प्रशासनिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि एक गहरे राष्ट्रीय प्रश्न का संकेत है।
इस वर्ष भी अमरनाथ यात्रा सुरक्षा बलों के बलिदान की साक्षी बनी। अनंतनाग में यात्रा ड्यूटी के दौरान एक पुलिसकर्मी ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी शहादत केवल एक अधिकारी के कर्तव्य-पालन की कहानी नहीं है; यह उस संवैधानिक अधिकार की रक्षा का प्रतीक है, जो प्रत्येक भारतीय को अपनी आस्था के अनुसार पूजा करने और तीर्थ करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह बलिदान हमें कुछ असहज प्रश्न पूछने के लिए भी बाध्य करता है।
भारत में एक राजनीतिक विमर्श लगातार दोहराया जाता है कि 'अल्पसंख्यक खतरे में हैं'। निस्संदेह, किसी भी समुदाय की सुरक्षा और सम्मान लोकतंत्र की मूल शर्त है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और राज्य का दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक की रक्षा करे। किन्तु क्या राष्ट्रीय विमर्श यहीं समाप्त हो जाता है? यदि भारत का बहुसंख्यक समुदाय वास्तव में इतना ही सुरक्षित है, तो उसकी सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में हर वर्ष हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती क्यों करनी पड़ती है? अमरनाथ यात्रा दशकों से आतंकवादी संगठनों के निशाने पर क्यों रही है? श्रद्धालुओं को सैन्य सुरक्षा के घेरे में यात्रा करने के लिए क्यों विवश होना पड़ता है? और सबसे बड़ा प्रश्न हर कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों के जवान इस यात्रा की रक्षा करते हुए शहीद क्यों होते हैं?
अमरनाथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना, सनातन परंपरा और करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। इस यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालु किसी संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि भगवान शिव के दर्शन के लिए निकलते हैं। उनके हाथों में हथियार नहीं, श्रद्धा होती है। फिर भी उन्हें आतंकवाद के भय के कारण बुलेटप्रूफ सुरक्षा घेरे में यात्रा करनी पड़ती है।विडंबना यह है कि जब हिंदू धार्मिक स्थलों या यात्राओं पर आतंकवादी हमले होते हैं, तब उन्हें अक्सर सामान्य सुरक्षा चुनौती कहकर भुला दिया जाता है। लेकिन यदि किसी अन्य समुदाय के धार्मिक अधिकारों पर संकट आता है, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस छिड़ जाती है। क्या समान संवेदनशीलता का सिद्धांत केवल एक दिशा में लागू होगा? क्या बहुसंख्यक समाज की पीड़ा इसलिए कम महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह बहुसंख्यक है?
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कभी भी यह नहीं था कि एक समुदाय की आशंकाओं को स्वीकार किया जाए और दूसरे समुदाय की वास्तविक सुरक्षा चुनौतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। सच्चा धर्मनिरपेक्ष समाज वही है, जहाँ हर नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता समान रूप से मूल्यवान हो, चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक।कश्मीर का इतिहास भी इस संदर्भ में गंभीर आत्मचिंतन की माँग करता है। कश्मीरी हिंदुओं का विस्थापन स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक है। तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यदि अमरनाथ यात्रा को अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ की मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इस सत्य से आँखें मूंद लेने से न तो समस्या समाप्त होगी और न ही धर्मनिरपेक्षता मजबूत होगी।
स्वामी विवेकानंद ने 1897 में भारत लौटने के बाद गर्व से कहा था, "I am proud to call myself a Hindu." उनका यह गर्व किसी अन्य धर्म के प्रति घृणा पर आधारित नहीं था, बल्कि उस सनातन परंपरा पर आधारित था, जिसने विश्व को सहिष्णुता, स्वीकार्यता और "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया।इसी प्रकार श्री अरविंद ने अपने प्रसिद्ध उत्तरपाड़ा भाषण में कहा था "जब कहा जाता है कि भारत उठेगा, तो उसका अर्थ है कि सनातन धर्म उठेगा।" उनका आशय किसी सांप्रदायिक वर्चस्व से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति से था, जिसने भारत को हजारों वर्षों तक जीवित रखा।
यदि सनातन भारत की सांस्कृतिक आत्मा है, तो उसके अनुयायियों की धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए, जितनी किसी अन्य समुदाय के अधिकारों को दी जाती है। बहुसंख्यक होना किसी समुदाय के अधिकारों को कम नहीं करता। लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकार उनकी संख्या से नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक दर्जे से तय होते हैं।अनंतनाग में शहीद हुए पुलिसकर्मी ने किसी दल, विचारधारा या चुनावी नारे की रक्षा करते हुए अपने प्राण नहीं दिए। उन्होंने भारत के संविधान और करोड़ों श्रद्धालुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
भारत ऐसा राष्ट्र अवश्य बने, जहाँ किसी भी धर्म के तीर्थयात्रियों को अपनी आस्था का पालन करने के लिए असाधारण सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता न पड़े। यही संविधान की वास्तविक भावना होगी। लेकिन जब तक ऐसा भारत नहीं बनता, तब तक यह प्रश्न उठाना आवश्यक रहेगा कि आखिर सबसे बड़े बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की धार्मिक यात्राएँ आज भी आतंकवाद के साये में क्यों आयोजित होती हैं? आखिर क्यों हर वर्ष हजारों सुरक्षाकर्मियों को केवल इसलिए तैनात करना पड़ता है कि हिंदू श्रद्धालु सुरक्षित दर्शन कर सकें?इन प्रश्नों से असहज होना स्वाभाविक है, लेकिन इन्हें टालना राष्ट्र के हित में नहीं है। यदि हम वास्तव में समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हिंदुओं की सुरक्षा और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी किसी अन्य नागरिक की। बहुसंख्यक होने का अर्थ यह नहीं कि उनकी पीड़ा अदृश्य हो जाए। लोकतंत्र का तकाजा है कि हर पीड़ा को समान संवेदनशीलता से देखा जाए, और अमरनाथ यात्रा हर वर्ष हमें इसी अधूरे दायित्व की याद दिलाती है।
मैंने केवल व्याकरण, विराम चिह्न, उद्धरण चिह्न, स्पेसिंग और टाइपिंग संबंधी त्रुटियाँ ठीक की हैं। लेख की मूल भाषा, तर्क और शैली यथावत रखी गई है।

दिगंत चक्रवर्ती
(लेखक स्तंभकार हैं)