भारत का डिजिटल रक्षा तंत्र

जेन जी : भारत का डिजिटल डिफेन्स फोर्स

डिजिटल युग में युवा, सूचना-तंत्र के सक्षम संरक्षक के रूप में उभर रहे हैं, जिनकी साक्षरता और सूचना की परख की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करती है।

By : नरेंद्र कुमार
जेन जी : भारत का डिजिटल डिफेन्स फोर्स

आज का युवा सुबह उठते ही दुनिया के किसी भी कोने की खबर देख सकता है, किसी वैज्ञानिक का व्याख्यान सुन सकता है, किसी मीम के जरिए राजनीतिक संदेश ग्रहण कर सकता है और कुछ ही सेकंड में एआई से हजारों शब्दों की जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि इंफॉर्मेशन पावर है। जिस पीढ़ी के पास इतनी सूचना-शक्ति है, उसके पास देश के सूचना-तंत्र की रक्षा करने की सबसे बड़ी क्षमता भी है।

प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को सामान्यतः जेन जी कहा जाता है। वहीं, शोधकर्ता मार्क मैक्रिंडल ने 2010 से 2024 के बीच जन्मी पीढ़ी के लिए जेन अल्फा शब्द का इस्तेमाल किया। अलग-अलग संस्थाएं इनकी समय-सीमा थोड़ी अलग भी रखती हैं। इसलिए इन्हें कोई कठोर वैज्ञानिक वर्गीकरण मानने के बजाय, बदलते डिजिटल परिवेश में पली-बढ़ी पीढ़ियों को समझने का एक ढांचा मानना चाहिए।

इस पीढ़ी की असली विशेषता उसकी उम्र नहीं, बल्कि उसका सूचना-पर्यावरण है। जेन जी की दुनिया रील्स, यूट्यूब, पॉडकास्ट, गेमिंग और इन्फ्लुएंसर्स से बनी है। किसी घटना की पहली जानकारी अब अखबार या टीवी से नहीं, बल्कि किसी क्रिएटर के छोटे वीडियो से सामने आती है। एक ही स्क्रीन पर मनोरंजन, समाचार, विज्ञापन और राजनीतिक राय साथ-साथ मौजूद हैं। समस्या यह है कि किसी भी सामग्री पर यह टैग नहीं लगा होता कि 'यह तथ्य है', 'यह राय है' या 'यह प्रायोजित प्रचार है।'डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल फेक न्यूज पहचानना नहीं, बल्कि लोकप्रिय और सत्य के बीच का अंतर समझना है। यदि दस हजार लोग किसी बात को शेयर कर रहे हों, तब भी वह गलत हो सकती है। इसके विपरीत, कोई बात बहुत कम लोगों तक पहुंची हो, फिर भी वह पूरी तरह सच हो सकती है।

डिजिटल दुनिया में साथियों का प्रभाव बहुत तेज होता है। हमारी पहचान भी अब डिजिटल पहचान का हिस्सा बन चुकी है। हम किसे फॉलो करते हैं, किन विचारों पर प्रतिक्रिया देते हैं और क्या शेयर करते हैं, ये सब मिलकर हमारी ऑनलाइन पहचान तय करते हैं। इसलिए किसी सूचना पर हमारी पहली प्रतिक्रिया कई बार तथ्यों से नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल पहचान और भावनाओं से संचालित होती है।दूसरी ओर, जेन अल्फा के लिए एआई कोई भविष्य की तकनीक नहीं, बल्कि उनके बचपन का सामान्य हिस्सा है। वे एआई से पढ़ाई में मदद लेते हैं, कहानियां बनवाते हैं और वर्चुअल पात्रों से संवाद करते हैं। यहाँ से एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव शुरू होता है। पहले सवाल पूछा जाता था, 'क्या तुमने यह देखा?' अब सवाल पूछना होगा, 'क्या जो मैंने देखा, वह वास्तव में हुआ भी है?'

डीपफेक और सिंथेटिक मीडिया ने इस सवाल को अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। किसी व्यक्ति का चेहरा या आवाज वीडियो में दिखाई देना अब इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने वह कार्य वास्तव में किया है। शोध संकेत देते हैं कि युवाओं को डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं से बचाने के लिए एआई साक्षरता और मीडिया-साक्षरता का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना अनिवार्य हो चुका है। बच्चों को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि 'इस पर विश्वास मत करो', बल्कि उन्हें यह सिखाना होगा कि किसी सूचना की जांच कैसे की जाती है।

यहीं से 'डिजिटल डिफेंस फोर्स' का विचार जन्म लेता है। इसके लिए किसी वर्दी, सीमा चौकी या औपचारिक भर्ती की आवश्यकता नहीं है। इसका पहला सैनिक वह युवा है जो किसी वायरल वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले उसका मूल स्रोत देखता है। वह छात्र है जो डीपफेक को पहचानने का प्रयास करता है। वह क्रिएटर है जो सनसनी फैलाने के बजाय सत्यापित तथ्य साझा करता है। और वह दोस्त है जो व्हाट्सएप ग्रुप में आई किसी अफवाह पर तुरंत कहता है, 'रुको, पहले इसे वेरिफाई करते हैं।'इसलिए, हमें युवाओं से संवाद की भाषा भी बदलनी होगी। हमें उनसे यह कहने के बजाय कि 'तुम आसानी से बहकावे में आ जाते हो', यह कहना होगा कि 'तुम्हारे पास भ्रामक सूचनाओं को रोकने की सबसे बड़ी क्षमता है।'

किसी एक व्यक्ति का यह छोटा-सा ठहराव पूरे डिजिटल नेटवर्क पर बड़ा असर डालता है। गलत सूचना की सबसे बड़ी ताकत उसका तेजी से फैलना है, और उस श्रृंखला को तोड़ने की सबसे सुरक्षित जगह शेयर बटन दबाने से ठीक पहले की आपकी उंगली है।भारत को आने वाले वर्षों में केवल तकनीकी साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि करोड़ों ऐसे जागरूक नागरिकों की जरूरत होगी जो सूचना की विश्वसनीयता परख सकें। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है; समाज का आपसी विश्वास, संस्थाओं पर भरोसा और नागरिकों की सूचना-साक्षरता भी राष्ट्र की संप्रभुता का आधार हैं।हमें जेन जी और जेन अल्फा को केवल रणनीतिक टारगेट या ऑडियंस के रूप में देखने का नजरिया बदलना होगा। वे केवल दर्शक नहीं हैं; वे क्रिएटर, कम्युनिकेटर और सूचना-तंत्र के सक्रिय भागीदार हैं। सूचना-क्रांति के इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कोई हमें प्रभावित करने का प्रयास करेगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम हर प्रभाव को बिना जांचे-परखे स्वीकार कर लेंगे?

इसका उत्तर हमारी दैनिक डिजिटल आदतों में छिपा है। रुकना, पढ़ना, स्रोत जांचना, संदर्भ समझना और फिर कोई निर्णय लेना, यही आधुनिक दौर की सबसे बड़ी नागरिक शक्ति है। हर स्मार्टफोन एक संभावित डिजिटल बैटलफील्ड हो सकता है, लेकिन उसका उपयोग करने वाला हर जागरूक नागरिक देश का संभावित डिफेंडर है। अगली बार जब कोई वीडियो आपको आक्रोशित करे, कोई मीम आपको किसी समुदाय के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करे, कोई इन्फ्लुएंसर बिना प्रमाण बड़ा दावा करे या एआई से बना कोई चित्र आपको वास्तविक लगे, तो शेयर बटन दबाने से पहले स्वयं से तीन सीधे सवाल पूछिए: 'स्रोत क्या है? प्रमाण क्या है? संदर्भ क्या है?'

याद रखिए, वायरल होना सत्य होने का प्रमाण नहीं है। हर फॉरवर्ड आपकी जिम्मेदारी है, हर शेयर आपकी नागरिक शक्ति है, और हर बार तथ्य को सत्यापित करने का आपका निर्णय भारत की डिजिटल सुरक्षा में आपका प्रत्यक्ष योगदान है। हम सभी 5जी के दौर में भारत के डिजिटल डिफेन्स फोर्स के सजग सैनिक हैं।


विप्लव विकास
(लेखक कोलकाता निवासी स्तंभकार हैं)

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