इक्कीसवीं सदी की भू-राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल सैन्य शक्ति या भौगोलिक विस्तार से नहीं समझा जा सकता। आज किसी राष्ट्र की वास्तविक सामर्थ्य का महत्वपूर्ण आधार उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता और तकनीकी संप्रभुता है। पिछले एक दशक में भारत ने अंतरिक्ष, अर्धचालक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए अनेक नीतिगत और संस्थागत कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद भारत के तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने से लेकर अर्धचालक निर्माण के लिए प्रोत्साहन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय मिशन तक, इन पहलों ने भारत की तकनीकी विकास-यात्रा को नई दिशा दी है।
2020 के अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारों के बाद निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में व्यापक भागीदारी का अवसर मिला। इसी क्रम में भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र प्रोत्साहन और अनुमति केंद्र की स्थापना की गई। यह एकल-खिड़की व्यवस्था के रूप में निजी क्षेत्र को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन, अनुमति और मार्गदर्शन उपलब्ध कराती है।भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 ने इस बदलाव को व्यापक नीतिगत आधार दिया। नीति का उद्देश्य अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ाना और एक स्थिर एवं पूर्वानुमेय नियामकीय वातावरण तैयार करना है।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा में चंद्रयान-3 एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही। 23 अगस्त 2023 को विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी उच्च अक्षांश वाले क्षेत्र में सफल सॉफ्ट लैंडिंग की। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अनुसार, यह दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में पहली सफल सॉफ्ट लैंडिंग थी। मिशन ने चंद्रमा की सतह पर प्रत्यक्ष वैज्ञानिक अध्ययन भी किए। इसके बाद आदित्य-एल1 मिशन ने भारत की अंतरिक्ष विज्ञान क्षमताओं को सूर्य के अध्ययन तक विस्तारित किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मिशन रिकॉर्ड के अनुसार, आदित्य-एल1 अब भारत के सक्रिय अंतरिक्ष विज्ञान मिशनों में शामिल है।
भारत की अंतरिक्ष क्षमता का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उसका व्यावसायिक विस्तार है। भारतीय अंतरिक्ष वाणिज्यिक उपक्रम के माध्यम से भारतीय प्रक्षेपण सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा गया है। इस प्रकार अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं रहा; यह उद्योग, रोजगार, नवाचार और वैश्विक वाणिज्य का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है।कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान ने यह स्पष्ट कर दिया कि अर्धचालक केवल औद्योगिक उत्पाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण घटक हैं।
सरकार ने भारत अर्धचालक मिशन के माध्यम से भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स और अर्धचालक निर्माण के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय प्रोत्साहन और उत्पादन क्षमता निर्माण की नीति अपनाई गई है। इस पहल का उद्देश्य केवल चिप निर्माण तक सीमित नहीं है। इसमें अभिकल्पना, निर्माण, पैकेजिंग, परीक्षण और संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की कोशिश शामिल है।गुजरात के धोलेरा में अर्धचालक कारखाना और साणंद में पैकेजिंग एवं परीक्षण जैसी परियोजनाएँ भारत को वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका दिलाने की दिशा में कदम हैं। इसी प्रकार, असम के मोरीगांव में अर्धचालक संयोजन और परीक्षण क्षमता विकसित करने की योजनाएँ पूर्वोत्तर भारत को भी इस नई औद्योगिक अर्थव्यवस्था से जोड़ती हैं।
अर्धचालक उद्योग में भारत की सबसे बड़ी मौजूदा ताकत उसकी अभियंत्रिकी और अभिकल्पना प्रतिभा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अन्य तकनीकी केंद्र लंबे समय से वैश्विक कंपनियों के अनुसंधान एवं विकास केंद्रों के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। अभिकल्पना-संबद्ध प्रोत्साहन जैसी पहल का उद्देश्य भारतीय नवोद्यमों और कंपनियों को चिप अभिकल्पना तथा बौद्धिक संपदा निर्माण की दिशा में आगे बढ़ाना है। इसका दीर्घकालिक महत्व इस बात में है कि भारत केवल इलेक्ट्रॉनिक्स की असेंबली का केंद्र न रहे, बल्कि उच्च मूल्य वाले डिजाइन और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में भी अपनी स्थिति मजबूत करे।
मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिशन को 10,371.92 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान के साथ मंजूरी दी। मिशन का उद्देश्य भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए संगणना क्षमता, आंकड़े, कौशल, नवोद्यम वित्तपोषण, नवाचार और सुरक्षित एवं विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता का व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।भारत की भाषाई विविधता कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। भाषिणी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय भाषाओं में अनुवाद, भाषण पहचान और डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, तेलुगु सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में सहज रूप से उपलब्ध होती है, तो इसका प्रभाव डिजिटल समावेशन पर व्यापक हो सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वास्तविक महत्व केवल बड़े भाषा मॉडल या संवादात्मक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। कृषि में मौसम, फसल और बाजार से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण से किसानों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। इसी प्रकार, शिक्षा, यातायात, शहरी नियोजन, वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं की निगरानी में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ रहा है।अंतरिक्ष, अर्धचालक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अलग-अलग तकनीकी क्षेत्र मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा। इन तीनों के बीच एक महत्वपूर्ण साझा आधार है डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना। भारत में आधार, एकीकृत भुगतान प्रणाली और डिजिलॉकर जैसी प्रणालियों ने बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाओं के लिए आधारभूत ढांचा तैयार किया है। अब चुनौती यह है कि इस डिजिटल आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत संगणना क्षमताओं का उपयोग किस प्रकार किया जाए।
आज तकनीक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। भारत ने अमेरिका और अन्य साझेदार देशों के साथ महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है।भारत की तकनीकी यात्रा को केवल सरकारी योजनाओं या कुछ सफल परियोजनाओं के आधार पर नहीं मापा जा सकता। वास्तविक परीक्षा इस बात की होगी कि ये निवेश और नीतियाँ आने वाले वर्षों में कितनी गहरी औद्योगिक क्षमता, वैज्ञानिक अनुसंधान, रोजगार और सामाजिक लाभ पैदा करती हैं। फिर भी, पिछले एक दशक में तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देते हैं अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी का विस्तार, अर्धचालक विनिर्माण की आधारशिला और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय स्तर की संरचना का निर्माण। इनके साथ भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एक चौथा आधार प्रदान करती है।
यदि इन पहलों के साथ उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, निजी निवेश, पारदर्शी नियमन, आंकड़ा सुरक्षा और मानव संसाधन विकास को समान महत्व दिया जाता है, तो भारत आने वाले दशकों में वैश्विक तकनीकी अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकता है। इक्कीसवीं सदी की प्रतिस्पर्धा केवल संसाधनों की नहीं, ज्ञान, नवाचार और तकनीकी क्षमता की भी है। भारत के सामने अवसर बड़ा है और इस अवसर को स्थायी राष्ट्रीय शक्ति में बदलने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है।

प्रो. धर्म प्रकाश वाजपेयी
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, शिक्षाविद तथा जेएनयू पूर्व छात्र संघ के अध्यक्ष हैं।)