18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत के लिए इस समूह के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। एक संस्थापक सदस्य और ब्रिक्स की रणनीतिक प्रासंगिकता के एक निरंतर हिमायती के रूप में, भारत इस शिखर सम्मेलन का उपयोग समावेशी विकास, सतत विकास और एक अधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति इस समूह की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करने के लिए कर रहा है। शिखर सम्मेलन का एजेंडा दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करना, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को आगे बढ़ाना, हरित ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देना और ग्लोबल साउथ में संपर्क को बढ़ाना भारत की व्यापक विदेश नीति प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
भारत की अध्यक्षता में, शिखर सम्मेलन स्वास्थ्य सेवा नवाचार, खाद्य सुरक्षा, जलवायु-लचीला कृषि और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग पर जोर देता है। भारत ब्रिक्स तंत्रों के अधिक संस्थागतकरण के लिए भी जोर देता है, जिसमें अफ्रीका और एशिया में बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के वित्तपोषण में न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका का विस्तार करना और आतंकवाद-रोधी खुफिया जानकारी तथा साइबर सुरक्षा मानदंडों पर सहयोग को गहरा करना शामिल है। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के नेतृत्व ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्', यानी दुनिया एक परिवार है, के लिए एक मंच के रूप में ब्रिक्स के अपने दृष्टिकोण पर जोर दिया है। यह दार्शनिक अभिमुखता बहुपक्षवाद, विकास एकजुटता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए प्रतिबद्ध एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में इसकी छवि को मजबूत करती है।
वैश्विक राजनीति में ब्रिक्स का बढ़ता महत्व
ब्रिक्स समूह, जो मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका था और अब इसमें ईरान, इथियोपिया, यूएई, सऊदी अरब, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे कई नए सदस्य शामिल हैं, समकालीन वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है। विश्व की जनसंख्या, भू-भाग और आर्थिक उत्पादन के एक महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हुए, ब्रिक्स केवल एक आर्थिक गुट के रूप में ही नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण के हितों को व्यक्त करने, बहुध्रुवीयता की वकालत करने और वैश्विक शासन संस्थानों को नया आकार देने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है।
ब्रिक्स और वैश्विक शासन की संरचना
ब्रिक्स द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के संस्थागत ढांचे को चुनौती देता है, जिस पर पश्चिमी शक्तियों का प्रभुत्व था। जी20, संयुक्त राष्ट्र और जलवायु वार्ताओं जैसे मंचों में समन्वित रुखों के माध्यम से, ब्रिक्स देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन में सुधार के लिए जोर देते हैं, ताकि वे वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से दर्शा सकें। न्यू डेवलपमेंट बैंक और आकस्मिक भंडार व्यवस्था की स्थापना, वैकल्पिक वित्तीय तंत्र बनाने की ब्रिक्स की महत्वाकांक्षा का उदाहरण है, जो पश्चिमी-प्रभावित संस्थानों और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करते हैं।
ये पहलें सदस्य देशों को ऐसी शर्तों पर विकास वित्तपोषण और तरलता सहायता प्रदान करती हैं, जो अक्सर उनकी विकासात्मक प्राथमिकताओं और संप्रभु संवेदनशीलताओं के अधिक अनुरूप होती हैं। वित्त के अलावा, ब्रिक्स एक कूटनीतिक गलियारे के रूप में कार्य करता है, जहाँ प्रमुख उभरती शक्तियाँ मतभेदों को प्रबंधित कर सकती हैं, वैश्विक मुद्दों पर सहमति बना सकती हैं और आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मामलों पर एकजुट रुख प्रस्तुत कर सकती हैं।
ब्रिक्स में भारत की रचनात्मक भूमिका
एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले लोकतांत्रिक, बहुलतावादी समाज के रूप में, भारत समूह के विविध वैचारिक दायरे को संतुलित करता है। यह पश्चिमी और गैर-पश्चिमी दोनों भागीदारों के साथ गहराई से जुड़ते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है, जिससे यह विभिन्न भू-राजनीतिक शिविरों के बीच एक पुल के रूप में कार्य कर पाता है। भारत की विदेश नीति का सिद्धांत, जो सर्व-सरेखण, रणनीतिक स्वतंत्रता और मुद्दा-आधारित गठबंधनों में निहित है, उसे ब्रिक्स के भीतर, विशेष रूप से रूस और चीन के बीच, जटिल गतिशीलता को अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना नेविगेट करने की अनुमति देता है।
भारत ने लगातार इस बात की वकालत की है कि ब्रिक्स विकास, नवाचार और जन-केंद्रित सहयोग पर केंद्रित रहे, बजाय इसके कि यह एक खुले तौर पर पश्चिमी-विरोधी या टकराव वाला गुट बन जाए। इसने समूह की विश्वसनीयता बढ़ाने वाली पहलों का समर्थन किया है, जैसे कि एनडीबी के कामकाज में पारदर्शिता को बढ़ावा देना, बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का समर्थन करना और महामारी की तैयारी तथा जलवायु अनुकूलन जैसी वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर संवाद को प्रोत्साहित करना।
इसके अलावा, भारत का आर्थिक दमखम, जनसांख्यिकीय लाभांश और तकनीकी क्षमताएँ इसे ब्रिक्स के भीतर एक अपरिहार्य भागीदार बनाती हैं। इसका डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, जिसका उदाहरण यूपीआई, आधार और कोविन हैं, अन्य ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों के लिए स्केलेबल मॉडल प्रदान करता है, जो पारंपरिक विकास पथों को पार करने की मांग कर रहे हैं। ब्रिक्स के ढांचे के माध्यम से इन नवाचारों को साझा करके, भारत इस समूह की सॉफ्ट पावर और व्यावहारिक प्रासंगिकता में योगदान देता है।
भारत अपने ऊर्जा साझेदारी को सुरक्षित करने, व्यापार मार्गों में विविधता लाने, महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुँचने और आतंकवाद तथा समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति बनाने जैसे अपने रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए भी ब्रिक्स का उपयोग करता है। साथ ही, यह सुनिश्चित करता है कि ब्रिक्स उसके द्विपक्षीय संबंधों या क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर न करे और समूह के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच एक सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखता है।
ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर ब्रिक्स 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का एक अपरिहार्य स्तंभ बन गया है, जो एक बहुध्रुवीय दुनिया में एक वैकल्पिक केंद्र-बिंदु प्रदान करता है। इसकी महत्ता न केवल इसके आर्थिक वजन में, बल्कि वैश्विक शासन में सुधार, विकासात्मक संप्रभुता को बढ़ावा देने और दक्षिण-दक्षिण एकजुटता को प्रोत्साहित करने के लिए एक साझा दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की इसकी क्षमता में भी निहित है।
जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार और विकास होता रहेगा, एक सर्वसम्मति बनाने वाले, नवाचारकर्ता और स्थिरीकरण शक्ति के रूप में भारत की भूमिका इस समूह की सफलता और एक अधिक संतुलित और न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में इसके योगदान के लिए केंद्रीय बनी रहेगी।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं।)