श्रीनगर की धरती से भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर का यह कहना कि जम्मू-कश्मीर भारत का 'अहम हिस्सा' है, निश्चित रूप से भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की यह यात्रा, कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था की सराहना और अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी यात्रा परामर्श की समीक्षा की संभावना—इन सबको भारत-अमेरिका संबंधों में बदलती परिस्थितियों के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। किंतु इसके साथ ही भारत को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता भी है।
वास्तव में, अमेरिका के इस बदले हुए रुख को पाकिस्तान पर भारत की स्थायी कूटनीतिक विजय या वॉशिंगटन के हमेशा के लिए नई दिल्ली के पक्ष में खड़े हो जाने के रूप में देखना भूल होगी। अमेरिका की भारत नीति का इतिहास स्वयं इस बात का गवाह है कि परिस्थितियां बदलने के साथ वह अपने मित्रों, साझेदारों और प्राथमिकताओं को भी बदलता रहा है। इसलिए आज पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की भाषा भारत के लिए सुखद भले हो, लेकिन इसे अंतिम सत्य मान लेना दूरदर्शिता नहीं होगी।
हां, सर्जियो गोर की इस यात्रा को भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत अवश्य माना जाना चाहिए। पाकिस्तान के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि कश्मीर को लेकर वॉशिंगटन की सार्वजनिक भाषा पहले जैसी नहीं रही। लेकिन यहां यह समझना आवश्यक है कि सकारात्मक संकेत और स्थायी नीति में अंतर होता है। जो लोग सर्जियो गोर के बयान से अत्यधिक उत्साहित होकर इसे अमेरिकी नीति में निर्णायक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, उन्हें थोड़ा ठहरकर विचार करना चाहिए। आखिर यह अमेरिका है!
अमेरिकी नीति का इतिहास हमें क्या बताता है? जो लोग यह मान रहे हैं कि वॉशिंगटन ने पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ दिया है, उन्हें अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास एक बार फिर पढ़ना चाहिए। शीतयुद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका ने पाकिस्तान को सोवियत प्रभाव के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनाया था। पाकिस्तान को सैन्य गठबंधनों से जोड़ना और उसे बड़े पैमाने पर आर्थिक तथा सैन्य सहायता देना उस समय अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था।
1950 और 1960 के दशक में पाकिस्तान को मिले अमेरिकी हथियारों में पैटन टैंक और एफ-86 जैसे लड़ाकू विमान भी शामिल थे, जिनका उपयोग भारत-पाकिस्तान संघर्षों में भारत के विरुद्ध किया गया। अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों का सबसे चर्चित और भारत के लिए सबसे असहज अध्याय 1971 के युद्ध के दौरान सामने आया। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई दिए। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने इस्लामाबाद को पूरी तरह अलग-थलग नहीं किया। युद्ध के निर्णायक दौर में अमेरिकी सातवें बेड़े की गतिविधियों को भारत पर दबाव बनाने के संकेत के रूप में देखा गया।
यह अलग बात है कि भारत ने उस समय अपनी सैन्य और कूटनीतिक शक्ति के बल पर परिस्थितियों को अपने पक्ष में बदला और अंततः बांग्लादेश का जन्म हुआ। लेकिन यह भी इतिहास का तथ्य है कि उस दौर में अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने और पाकिस्तान के पक्ष में परिस्थितियां निर्मित करने का प्रयास किया था।
1979 के बाद अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप और रोनाल्ड रीगन प्रशासन के दौर में पाकिस्तान अमेरिका का 'अग्रिम मोर्चे वाला राष्ट्र' बन गया। उसे व्यापक आर्थिक और सैन्य सहायता मिली। एफ-16 लड़ाकू विमानों सहित आधुनिक हथियारों की आपूर्ति हुई और पाकिस्तान की खुफिया संरचना ने अफगान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके दूरगामी प्रभाव केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहे। पाकिस्तान में विकसित हुआ आतंकवादी ढांचा बाद के वर्षों में भारत के लिए भी गंभीर चुनौती बना और उसकी प्रतिध्वनि आज तक सुनाई देती है।
कारगिल के बाद बदली अमेरिकी भूमिका 1990 के दशक में कश्मीर को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर ऐसे बयान भी सामने आए, जिनसे भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई। लेकिन 1999 के कारगिल युद्ध ने अमेरिकी नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर सैन्य वापसी के लिए दबाव बनाया।इस परिवर्तन को भारत के प्रति अमेरिकी प्रेम का परिणाम मानना भी उचित नहीं होगा। बदलती वैश्विक परिस्थितियां, पाकिस्तान की भूमिका और भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी हित इसके पीछे महत्वपूर्ण कारक थे। यही बात वर्तमान परिस्थिति पर भी लागू होती है।
भारत अमेरिका के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? आज अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना करने के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है। भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, सैन्य क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भूमिका ने उसकी उपयोगिता अमेरिका के लिए बहुत बढ़ा दी है।
इसलिए अमेरिका का भारत की ओर बढ़ता झुकाव वास्तविक है, लेकिन इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रीय हित प्रमुख हैं। इसे केवल मित्रता, भावनात्मक निकटता या किसी स्थायी वैचारिक समानता के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। सच यह है कि यदि भविष्य में अमेरिका को किसी ऐसे क्षेत्रीय समीकरण की आवश्यकता महसूस होती है, जिसमें पाकिस्तान उसके लिए उपयोगी हो, तो वॉशिंगटन उसके साथ फिर से निकटता बढ़ा सकता है। यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वभाव है। अमेरिका ने इतिहास में कई बार ऐसा किया है।
जिस पाकिस्तान को कभी सोवियत संघ के खिलाफ सबसे उपयोगी सहयोगी माना गया, उसी पाकिस्तान से बाद के वर्षों में आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिकी असंतोष खुलकर सामने आया। जिस भारत पर कभी कश्मीर को लेकर दबाव डाला गया, वही भारत आज अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत रणनीति का प्रमुख साझेदार है।
असली उपलब्धि अमेरिका का बदलना नहीं, भारत का मजबूत होना है इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत को अमेरिका के बदले हुए रुख से केवल प्रसन्न होने के बजाय यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि अमेरिका का रुख क्यों बदला है। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य और वैश्विक प्रभाव ने उसे ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां दुनिया की बड़ी शक्तियां उसकी अनदेखी नहीं कर सकतीं। वस्तुतः यही भारत की वास्तविक उपलब्धि है।
सर्जियो गोर का श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा कहना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था की सराहना और यात्रा परामर्श की समीक्षा की संभावना भी सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे पुराना सत्य आज भी वही है स्थायी मित्रता नहीं होती, स्थायी हित होते हैं।
इसलिए भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहिए, लेकिन अपनी शक्ति, अपनी कूटनीति और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। अमेरिका का साथ भारत के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन भारत की विदेश नीति की दिशा किसी बाहरी शक्ति की इच्छा से तय नहीं होनी चाहिए।
सर्जियो गोर के श्रीनगर में मुस्कुराते चेहरे को देखकर भारत को प्रसन्न अवश्य होना चाहिए, लेकिन अत्यधिक उत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों से संचालित होती है—और अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी
(लेखक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार हैं।)