गर्मी बढ़ते ही देश में पानी को लेकर चिंता बढ़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार चिंता का कारण केवल आसमान से होने वाली बारिश नहीं, बल्कि जमीन पर उपलब्ध पानी को संभालने की हमारी घटती क्षमता भी है। देश के प्रमुख जलाशयों में जलस्तर तेजी से नीचे जाना और दूसरी ओर उन्हीं जलाशयों की भंडारण क्षमता का गाद के कारण लगातार कम होते जाना आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत है। सवाल केवल यह नहीं कि मानसून कितना अच्छा रहेगा, बल्कि बड़ा प्रश्न यह है कि मानसून से मिलने वाले पानी को हम कितना बचा पाएंगे।
केंद्रीय जल आयोग 166 प्रमुख जलाशयों के जलस्तर की नियमित निगरानी करता है। इन जलाशयों की कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 183.565 अरब घन मीटर है। मध्य-मई की स्थिति के अनुसार इनमें करीब 63 अरब घन मीटर पानी ही बचा था, यानी लगभग 34.45 प्रतिशत। इसका अर्थ है कि गर्मी के चरम दौर में देश के प्रमुख जलाशयों का लगभग दो-तिहाई भंडारण खाली हो चुका था। कई राज्यों में स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक रही और अनेक बांधों में पानी 40 से 50 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया।जलाशय केवल पानी जमा करने की जगह नहीं हैं। उनसे खेतों की सिंचाई होती है, शहरों और गांवों को पेयजल मिलता है तथा बिजली का उत्पादन भी होता है। इसलिए जलाशयों में पानी कम होने का सीधा असर कृषि, पेयजल और ऊर्जा पर पड़ता है। गर्मी में पानी की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ती है और यदि मानसून के आगमन में देरी हो अथवा वर्षा सामान्य से कम या असमान रहे, तो यह दबाव और बढ़ सकता है।
इस संकट का एक गंभीर और अपेक्षाकृत कम चर्चित पहलू जलाशयों में लगातार बढ़ती गाद है। केंद्रीय जल आयोग के ‘भारत में जलाशयों में गाद जमाव संबंधी संकलन-2024’ में 548 जलाशयों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया, जिनमें से 439 के आंकड़े विश्लेषण के लिए उपयुक्त पाए गए। अध्ययन के अनुसार, इन 439 जलाशयों की सकल भंडारण क्षमता में गाद जमने के कारण औसतन 19.24 प्रतिशत की कमी हो चुकी है। वहीं, जलाशयों की भंडारण क्षमता में प्रत्येक वर्ष औसतन 0.74 प्रतिशत की कमी दर्ज की जा रही है।यह स्थिति भविष्य की चुनौती को स्पष्ट करती है। यदि नदियां और बरसाती धाराएं अपने साथ मिट्टी और तलछट लाती रहें तथा जलाशयों में गाद जमा होती रहे, तो कुछ वर्षों बाद अच्छी बारिश होने पर भी हमारे पास पानी रखने की पर्याप्त क्षमता नहीं होगी। यानी एक ओर वर्षा की अनिश्चितता और दूसरी ओर घटती भंडारण क्षमता-देश एक साथ दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है।
गाद की समस्या का समाधान केवल जलाशयों से गाद निकालने तक सीमित नहीं हो सकता। इसका बड़ा स्रोत जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव है। इसलिए पहाड़ियों और नदी घाटियों में वनों की कटाई, भूमि क्षरण, अवैज्ञानिक खेती, अनियोजित निर्माण गतिविधियों और जलग्रहण क्षेत्रों के कमजोर प्रबंधन को रोकना जरूरी है। यदि ऊपर की मिट्टी को बहने से नहीं रोका गया, तो नीचे जलाशयों से गाद निकालने का काम लगातार चलता रहेगा और समस्या स्थायी बनी रहेगी।देश के पुराने बांध भी इस चुनौती का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। राष्ट्रीय रजिस्टर ऑफ स्पेसिफाइड डैम्स 2025 के अनुसार देश में 6,628 निर्दिष्ट बड़े बांध हैं। इनमें 6,545 बांध पूर्ण और कार्यशील हैं तथा 83 निर्माणाधीन हैं। इनमें से 1,681 बांध 50 वर्ष से अधिक पुराने और 291 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हैं। लगभग 26 प्रतिशत निर्दिष्ट बांध आधी सदी से अधिक पुराने हैं।
उम्र अपने आप में किसी बांध को असुरक्षित नहीं बनाती, लेकिन समय बीतने के साथ संरचनात्मक रखरखाव, जलाशय की वास्तविक क्षमता, गाद, जलग्रहण क्षेत्र में बदलाव और संचालन व्यवस्था की नियमित समीक्षा अधिक जरूरी हो जाती है। सरकार के अनुसार, वर्ष 2025 में 6,524 बांधों का मानसून-पूर्व और 6,553 बांधों का मानसून पश्चात निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के बाद तीन बांधों को श्रेणी-1 और 216 बांधों को श्रेणी-2 में रखा गया। इससे स्पष्ट है कि बांधों की सुरक्षा को उनके पूरे जीवन-चक्र में प्राथमिकता देना आवश्यक है।भारत ने बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 और बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना जैसे कदमों के माध्यम से इस दिशा में संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया है। अब जरूरत इन व्यवस्थाओं को राज्यों और स्थानीय स्तर तक प्रभावी रूप से लागू करने की है। प्रत्येक बड़े बांध के लिए नियमित निरीक्षण, समयबद्ध रखरखाव, आपातकालीन कार्ययोजना, वास्तविक भंडारण क्षमता का आकलन और गाद प्रबंधन को जल प्रबंधन व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
जल संकट से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में भी दृष्टिकोण बदलना होगा। भारत में पानी का सबसे बड़ा उपयोग कृषि में होता है। ऐसे में कम पानी में अधिक उत्पादन की दिशा में फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, टपक और फव्वारा सिंचाई जैसी तकनीकों का विस्तार जरूरी है। जिन क्षेत्रों में पानी सीमित है, वहां अत्यधिक जल मांग वाली फसलों को लगातार बढ़ावा देना दीर्घकाल में संकट बढ़ा सकता है। स्थानीय जल उपलब्धता के आधार पर फसल नियोजन अधिक व्यावहारिक रास्ता है।दरअसल, जल संकट का स्थायी समाधान केवल अच्छे मानसून में नहीं है। मानसून अच्छा हो और हम पानी रोक न पाएं, जलाशयों की क्षमता घटती रहे तथा भूजल का अत्यधिक दोहन जारी रहे, तो अगले कुछ वर्षों में समस्या फिर सामने खड़ी होगी। इसलिए जल प्रबंधन को मानसून से स्वतंत्र एक निरंतर राष्ट्रीय अभियान बनाना होगा। जलाशयों की निगरानी केवल जलस्तर मापने तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी वास्तविक भंडारण क्षमता, गाद की मात्रा, जलग्रहण क्षेत्र और भविष्य की जल मांग का भी नियमित आकलन हो।
सबसे बड़ी जरूरत सोच बदलने की है। पानी को असीमित प्राकृतिक संसाधन मानने की बजाय सीमित और मूल्यवान संपदा समझना होगा। देश के पास 6,628 निर्दिष्ट बड़े बांधों का विशाल नेटवर्क है। यह हमारी बड़ी ताकत है, लेकिन इसकी उपयोगिता तभी कायम रहेगी, जब हम जलाशयों की उम्र, गाद और घटती क्षमता को गंभीरता से लें।
आज आवश्यकता नए जलाशयों की संख्या बढ़ाने से अधिक मौजूदा जलाशयों की बची हुई क्षमता बचाने की है। इसके लिए जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, गाद नियंत्रण, पुराने बांधों का पुनर्वास, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को साझा राष्ट्रीय अभियान बनाना होगा। आखिरकार सवाल यह नहीं है कि आसमान से कितना पानी बरसेगा; सवाल यह है कि धरती पर गिरने वाली हर बूंद में से हम कितनी बूंदें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख पाएंगे।

बलकार सिंह पूनियाँ
(लेखक ग्रामीण विकास विभाग, इग्नू, नई दिल्ली में सहायक प्रोफेसर हैं।)