भारत निर्वाचन आयोग और उसके विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर देशभर में बहस अब केवल मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों की संख्या तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि मतदाता सूचियाँ कैसे तैयार, सत्यापित और संशोधित होती हैं तथा निर्णय लेने का अधिकार किस स्तर पर है। विशेष गहन पुनरीक्षण ने सटीक मतदाता सूचियों और समावेशी पंजीकरण के बीच संतुलन की आवश्यकता बताई है। 24 जून 2025 से अक्टूबर 2026 के बीच 2.37 करोड़ नई पीढ़ी के मतदाताओं के जुड़ने के बीच यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि प्रत्येक पात्र नागरिक अपना पंजीकरण करा सके और विवरण का सत्यापन कर सके।
विशेष गहन पुनरीक्षण क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
विशेष गहन पुनरीक्षण मतदाता सूचियों के व्यापक सत्यापन और अद्यतन की प्रक्रिया है। नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण के विपरीत, इसमें मौजूदा प्रविष्टियों का गहन सत्यापन किया जाता है। यह देखा जाता है कि मतदाता जीवित है, संबंधित पते पर निवास करता है और उसका नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नहीं है। इसका कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) में निहित है। यह आयोग को विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देता है।
मतदाता सूचियाँ किसी भी समय स्थिर नहीं होतीं। समय के साथ लोगों की मृत्यु होती है, वे स्थान बदलते हैं, निर्वाचन क्षेत्र बदलते हैं और कभी-कभी एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई 2026 के निर्णय में उल्लेख किया कि बिहार में पिछला गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था। इसके बाद दो दशकों में तेज शहरीकरण, बड़े पैमाने पर पलायन, मृत्यु की सूचना दर्ज न होने और दोहराव जैसी स्थितियाँ सामने आईं। न्यायालय ने माना कि मतदाता सूचियों की सटीकता और अखंडता बनाए रखना तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना विशेष गहन पुनरीक्षण का वैध उद्देश्य है।
बिहार में पुनरीक्षण ने क्या तस्वीर सामने रखी?
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत 24 जून 2025 को हुई। इसमें 98.01 प्रतिशत मतदाताओं को शामिल किया गया और 7.17 करोड़ गणना प्रपत्र, यानी कुल का 90.89 प्रतिशत, प्राप्त कर उनका डिजिटलीकरण किया गया। इस प्रक्रिया में लगभग 20 लाख मृत, 28 लाख स्थायी रूप से पलायन कर चुके, सात लाख दोहराव वाले और एक लाख अप्राप्य मतदाताओं की पहचान हुई। लगभग 15 लाख गणना प्रपत्र वापस नहीं आए।ये आँकड़े बताते हैं कि मतदाता सूची का गहन सत्यापन क्यों आवश्यक है। लेकिन सूची की शुद्धता के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे।
मतदाताओं की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्थाएँ हैं?
निर्वाचन आयोग के अनुसार, बिहार और पश्चिम बंगाल सहित 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण पूरा हो चुका है तथा शेष 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में तीसरे चरण की शुरुआत की गई है। जिन मतदाताओं को नाम के मिलान में विसंगति या अन्य कारणों से सूचना दी जाती है, उनके लिए बूथ स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं, दस्तावेज एकत्र करते हैं और उन्हें निर्वाचन आयोग के तंत्र पर अपलोड करते हैं।सुनवाई यथासंभव ऑनलाइन होती है और मतदाता अपने पक्ष का प्रतिनिधित्व करने के लिए परिवार के किसी वयस्क सदस्य को अधिकृत कर सकता है। गोवा में भी छूटे हुए मतदाताओं को पंजीकरण बहाल कराने में मदद मिली।
बूथ स्तर पर व्यापक भागीदारी
बिहार में 77,895 मौजूदा और 20,603 नए बूथ स्तर के अधिकारी तैनात किए गए। बुजुर्गों, दिव्यांगों और कमजोर नागरिकों की सहायता के लिए चार लाख से अधिक स्वयंसेवकों की भागीदारी रही। मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने मतदाता सूचियों के समानांतर सत्यापन के लिए लगभग 1.56 लाख बूथ स्तर के अभिकर्ता नियुक्त किए। चुनाव के दिन मतदान केंद्रों पर शत-प्रतिशत वेब प्रसारण भी निगरानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
13 करोड़ नाम हटाए जाने का सवाल
30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक प्रारूपिक विलोपन का आँकड़ा बहस का केंद्र बना हुआ है। हालाँकि, इसमें मृतक, स्थायी रूप से पलायन कर चुके, दोहराव वाले और सत्यापन नहीं हो पाने वाले नाम शामिल हैं। इसलिए प्रारूपिक विलोपन को अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होना मानना उचित नहीं है। अंतिम सूची से पहले दावे और आपत्तियाँ दर्ज कराने तथा दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। यहीं समावेशिता और त्रुटि-सुधार की परीक्षा होती है।
युवा मतदाता और न्यायिक निगरानी
24 जून 2025 से अक्टूबर 2026 के बीच 2.37 करोड़ नई पीढ़ी के मतदाता जोड़े गए। इससे युवा भागीदारी के साथ मतदाता सूची को लगातार अद्यतन रखने की आवश्यकता भी स्पष्ट होती है। निर्वाचन आयोग ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े आदेशों पर तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति थी। दिल्ली और महाराष्ट्र में दावे-आपत्तियों तथा उनके निपटारे के लिए अलग-अलग समय-सीमाएँ निर्धारित की गई हैं।
प्रशासनिक और तकनीकी सवाल
विशेष गहन पुनरीक्षण के साथ निर्वाचन आयोग की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था और तकनीकी ढाँचे को लेकर भी सवाल उठे हैं। तकनीकी तंत्र की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उपचुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसमें एक स्वतंत्र विशेषज्ञ को भी शामिल किया गया। यह व्यवस्था इस बात की ओर संकेत करती है कि निर्वाचन प्रक्रिया में तकनीकी प्रणालियों की विश्वसनीयता को लेकर संस्थागत समीक्षा आवश्यक मानी गई है।
ईवीएम और तकनीकी सुरक्षा
इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनें स्वतंत्र इकाइयाँ हैं और किसी संचार तंत्र से जुड़ी नहीं होतीं। इनके लिए प्रथम स्तर की जाँच, उम्मीदवारों के अभिकर्ताओं की उपस्थिति में दो चरणों में यादृच्छिकीकरण, अनिवार्य मतदान-पूर्व परीक्षण, अभिलेखित स्मृति का उम्मीदवारों द्वारा सत्यापन तथा प्रत्येक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में यादृच्छिक रूप से चुने गए पाँच मतदान केंद्रों पर मतदाता सत्यापन पर्ची का अनिवार्य मिलान जैसी व्यवस्थाएँ लागू हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2024 में इन सुरक्षा व्यवस्थाओं की समीक्षा की थी।
सटीकता के साथ समावेश भी जरूरी
विशेष गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। मृत्यु, पलायन, दोहराव और निवास में परिवर्तन के कारण मतदाता सूचियों का सत्यापन आवश्यक है। लेकिन गहन पुनरीक्षण जितना व्यापक होता है, उससे जुड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है।
किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल यह पर्याप्त नहीं है कि मतदाता सूची साफ-सुथरी हो। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कोई पात्र नागरिक प्रक्रिया की जटिलता, दस्तावेजों की कमी, सूचना के अभाव या प्रशासनिक त्रुटि के कारण मताधिकार से वंचित न हो।13 करोड़ से अधिक प्रारूपिक विलोपन, 2.37 करोड़ नए युवा मतदाता, 20 लाख से अधिक बूथ स्तर के अभिकर्ता, शत-प्रतिशत वेब प्रसारण, घर-घर सत्यापन, तकनीकी सुरक्षा और न्यायिक निगरानी विशेष गहन पुनरीक्षण के विशाल पैमाने को दर्शाते हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण संचालित करने की निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्ति और उसके अंतर्गत लिए गए प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय की वैधता एक ही प्रश्न नहीं हैं। न्यायालय पुनरीक्षण आयोजित करने की आयोग की शक्ति की जाँच कर चुका है; अब विशिष्ट प्रशासनिक निर्णयों और संशोधित प्रपत्र-6 से जुड़े आरोपों की वैधता का परीक्षण अलग प्रश्न के रूप में सामने आ सकता है।
अंततः चुनावी सुधार की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि मतदाता सूची कितनी शुद्ध है। उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से प्रभावित होता है, तो उसे समय पर अपनी बात रखने, दस्तावेज प्रस्तुत करने और गलती सुधरवाने का अवसर मिले। सटीक मतदाता सूची और प्रभावी सुधार-व्यवस्था लोकतांत्रिक विश्वास की यही दो मूल अनिवार्य शर्तें हैं।
निशांक जैन
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता, नई दिल्ली हैं।)