आज का युवा जब किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, तो वह केवल अपनी किताबों से नहीं लड़ता; वह अपनी रातों की नींद, माता-पिता के सपनों और अपने भविष्य पर लगे हर एक दांव से लड़ता है। लेकिन जब महीनों की कड़ी मेहनत के बाद अचानक 'पेपर लीक' की खबर आती है, तो दिल टूट जाता है। सोशल मीडिया पर आक्रोश का सैलाब उमड़ता है, मीम्स बनते हैं, रील्स पर गुस्सा फूटता है और व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं। लोकतंत्र में सत्ता में बैठी सरकार से जवाब मांगना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और सरकार को इसके लिए शत-प्रतिशत जिम्मेदार होना ही चाहिए। लेकिन क्या आपने कभी स्वयं से एक बुनियादी सवाल पूछा है.जब हमारे भविष्य की बलि दी जा रही हो, तब इस देश का विपक्ष क्या कर रहा होता है? क्या लोकतंत्र में जवाबदेही का दायरा सिर्फ सत्ता तक सीमित है, या देश के विपक्ष की भी देश के प्रति कोई जिम्मेदारी बनती है? आखिर वह भी जनप्रतिनिधि है।
पश्चिम की वोकिज्म (Wokeism) विचारधारा और वामपंथी नैरेटिव ने भारतीय युवाओं के दिमाग में यह बात बहुत चालाकी से भर दी है कि 'लोकतंत्र का मतलब सिर्फ सरकार का विरोध करना है।' इस इकोसिस्टम ने एक ऐसा मायाजाल बुना है, जहाँ विपक्ष को हर नैतिक जिम्मेदारी से 'फ्री पास' दे दिया जाता है। इस नैरेटिव के तहत विपक्ष चाहे कितना भी गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाए, विदेशी धरती पर जाकर देश की संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करे, या जनहित के मुद्दों पर केवल विरोध की राजनीति करे, उससे कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पिछले एक दशक में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जितनी विदेश यात्राएँ की हैं, उनमें से अधिकांश यात्राएँ या तो पूरी तरह गुप्त रहीं या उन्हें 'व्यक्तिगत' बताकर खारिज कर दिया गया। लेकिन एक पैटर्न पर ध्यान देना बेहद जरूरी है—जब-जब ये गुप्त विदेश यात्राएँ खत्म होती हैं, उनके ठीक बाद भारत में अचानक एक नए राजनीतिक हंगामे और नैरेटिव का दौर शुरू हो जाता है। विशेष रूप से संसद के किसी महत्वपूर्ण सत्र से ठीक पहले या राज्यों के चुनावों के ऐन वक्त पर देश के माहौल को अराजकता की ओर धकेलने की कोशिश की जाती है। क्या यह महज एक संयोग है, या गहरे पश्चिमी इकोसिस्टम, वामपंथी विचारकों और विदेशी ताकतों के साथ मिलकर बुना गया कोई सोचा-समझा षड्यंत्र? जब देश का विपक्ष जनहित के मुद्दों को सुलझाने के बजाय विदेशी ताकतों के हाथों का औजार बनने लगे, तो यह केवल राजनीति नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ है।
भारतीय राजनीतिक परंपरा और हमारे प्राचीन ग्रंथों में 'प्रतिपक्ष' को शत्रु नहीं, बल्कि 'धर्म' और 'सत्य' का संरक्षक माना गया है। आज के तथाकथित प्रगतिशील विपक्ष की असलियत छात्रों के मुद्दे पर पूरी तरह उजागर हो चुकी है।
जब पूरे देश में छात्रों के भविष्य और पेपर लीक को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ी, तो केंद्र सरकार ने संसद में सख्त कानूनों और कड़े प्रावधानों वाला एंटी-पेपर लीक बिल पेश किया। होना तो यह चाहिए था कि विपक्ष इस बिल पर सकारात्मक सुझाव देता, सजा को और कड़ा करने की मांग करता और सरकार को कटघरे में खड़ा करके देश के छात्रों को राहत दिलाता। लेकिन हुआ क्या? संसद में जब इस महत्वपूर्ण बिल पर बहस की बारी आई, तो नेता प्रतिपक्ष ने विषय पर बात ही नहीं की। उन्होंने पेपर लीक और छात्रों के दर्द को छोड़कर विषयांतर कर दिया और हंगामा किया।
यह दोहरापन यहीं खत्म नहीं होता। पेपर लीक की भयावह घटनाएँ केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। कांग्रेस-शासित कर्नाटक, जेएमएम-कांग्रेस शासित झारखंड और आम आदमी पार्टी शासित पंजाब में भी हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर लीक हुए और भर्तियाँ रद्द हुईं। वहाँ युवा सड़कों पर पुलिस की लाठियाँ खा रहा है। लेकिन क्या आपने कभी इस पूरे तथाकथित 'इंडी गठबंधन' को अपने शासित राज्यों के पेपर लीक पर एक शब्द भी बोलते सुना है? जब बात अपने राज्यों के कुशासन की आती है, तो पूरा विपक्ष मौन धारण कर लेता है। जब बात संसद में कड़े कानून बनाने की आती है, तो वे बहस छोड़कर चले जाते हैं। वे छात्रों के दर्द पर केवल राजनीति की रोटी सेंकना चाहते हैं, समाधान का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
भारत का विचार-दर्शन 'कर्म और दायित्व' पर टिका रहा है। गीता में श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म का संदेश पलायनवाद नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के मोर्चे पर डटे रहने की खुली हुंकार है। आज के जेन-जी को एक बात गाँठ बाँध लेनी होगी एक जीवंत और सशक्त लोकतंत्र केवल एक जवाबदेह सरकार के कंधे पर नहीं चलता; उसके लिए विपक्ष का भी राष्ट्र-प्रथम और जिम्मेदार होना अनिवार्य है। इज़राइल के विपक्ष से भारतीय विपक्षी दलों को सीखना चाहिए। यदि विपक्ष देश-विरोधी ताकतों का सॉफ्ट टूल बनकर केवल राष्ट्रीय हितों पर राजनीति करे, तो नागरिक के नाते हमारा मौन भी उस अपराध में भागीदारी है।
अगली बार जब कोई राजनेता आपके मंच पर आकर 'युवा और लोकतंत्र' का भाषण दे, तो उसकी आँखों में आँखें डालकर पूछिए, 'जब हमारे भविष्य की सुरक्षा के लिए संसद में बिल बन रहा था, तब तुम वॉकआउट करके किसके एजेंडे को हवा दे रहे थे?'भारत का युवा अब न तो वामपंथी नैरेटिव की प्रयोगशाला बनेगा और न ही किसी विदेशी एजेंडे की कठपुतली। हम सवाल सरकार से भी पूछेंगे और देश को नीचा दिखाकर अकाउंटेबिलिटी से भागने वाले विपक्ष को भी नंगा करेंगे। यही 'भारत 2.0' की पहचान है और यही हमारी पीढ़ी का धर्म।

विप्लव विकास
(लेखक कोलकाता निवासी स्तंभकार हैं।)