भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं को सरकार की आलोचना करने, धार्मिक-सामाजिक विचारों पर बहस करने और चुनाव आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या इस अधिकार की कोई सीमा नहीं है? क्या चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति की भावनाओं को उभारना, विरोधी समुदाय के प्रति शत्रुता पैदा करना या संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध आक्रामक अभियान चलाना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है?
भारत में एक प्रमुख राजनीतिक नेता को चुनावी आचरण के मामले में छह वर्ष के लिए अयोग्य ठहराया गया था। वह नेता थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे। आज कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषणों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), हिंदुत्व, जातिगत टिप्पणियों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत तथा चुनाव आयोग को लेकर उनके राजनीतिक अभियान के संदर्भ में सवाल उठता है कि कानून की कसौटी सभी नेताओं के लिए समान है या नहीं?बाल ठाकरे की मिसाल आज भी महत्वपूर्ण है। 11 दिसंबर 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम प्रभाकर काशीनाथ कुंटे मामले में फैसला सुनाया। यह मामला महाराष्ट्र विधानसभा के 1987 के विले पार्ले उपचुनाव से जुड़ा था। शिवसेना उम्मीदवार डॉ. रमेश प्रभू के पक्ष में प्रचार करते हुए बाल ठाकरे ने 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 को भाषण दिए थे। इनमें हिंदू धर्म के आधार पर समर्थन जुटाने और धार्मिक समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप लगाए गए थे। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपों को सिद्ध माना और सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलों पर सुनवाई करते हुए उस निर्णय को बरकरार रखा।
इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) और 123(3ए) निर्णायक थीं। पहली धारा चुनाव में धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट माँगने से संबंधित है। दूसरी धारा चुनावी लाभ के लिए इन आधारों पर नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा बढ़ाने अथवा ऐसा करने का प्रयास करने को भ्रष्ट आचरण मानती है।ठाकरे स्वयं उम्मीदवार नहीं थे, फिर भी उम्मीदवार की सहमति से चुनाव प्रचार में उनकी भूमिका के कारण उन्हें धारा 99 के अंतर्गत नामित किया गया। धारा 8ए की प्रक्रिया के बाद उनकी छह वर्ष की अयोग्यता निर्धारित हुई। इससे स्पष्ट है कि निर्धारित शर्तें पूरी होने पर उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करने वाला व्यक्ति भी जवाबदेह हो सकता है।
राहुल गांधी और कांग्रेस के कुछ नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीतिक व्याख्या की आलोचना करते रहे हैं। जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता भी उनके अभियान के विषय हैं। जुलाई 2024 में संसद में राहुल गांधी के भाषण के दौरान हिंदू धर्म, भाजपा और कथित हिंसा को लेकर दिए गए वक्तव्यों पर विवाद हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने भाषण के कुछ अंश कार्यवाही से हटा दिए। राहुल गांधी ने अपनी टिप्पणियों का बचाव किया, जबकि सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई। संसद की कार्यवाही से किसी टिप्पणी को हटाया जाना अपने आप में चुनावी भ्रष्ट आचरण का प्रमाण नहीं है। इसके लिए संबंधित कानून के अंतर्गत आवश्यक तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
हिंदुत्व की विचारधारा, आरएसएस की नीतियों, प्रधानमंत्री के निर्णयों अथवा किसी धार्मिक-राजनीतिक संगठन के प्रभाव की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। जातिगत असमानता पर चर्चा, आरक्षण की माँग और सामाजिक न्याय के लिए अभियान चलाना भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। लेकिन नेताओं, अधिकारियों और पत्रकारों की जातियों को इस तरह राजनीतिक विवाद का विषय बनाना कि समाज में जातिगत वैमनस्य बढ़े, एक अलग प्रश्न है। यदि किसी भाषण में किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा या शत्रुता बढ़ाने का प्रयास किया गया हो अथवा चुनाव में किसी उम्मीदवार को जिताने के लिए कानून द्वारा निषिद्ध धार्मिक या जातिगत अपील की गई हो, तो यह कानूनी कार्रवाई का आधार बन सकता है। इसके लिए भाषण की रिकॉर्डिंग, सटीक शब्द, तारीख, स्थान, चुनाव से संबंध और कानून के आवश्यक तत्वों को प्रमाणित करना होगा।
आरएसएस ने 2025 में स्थापना के सौ वर्ष पूरे किए। भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन पर उसका प्रभाव सार्वजनिक बहस का विषय है। राहुल गांधी संघ की विचारधारा और भाजपा से उसके संबंधों की आलोचना करते हैं, जबकि समर्थक इसे अपनी सांस्कृतिक तथा राजनीतिक मान्यताओं पर हमला मान सकते हैं। यदि राहुल गांधी कहते हैं कि आरएसएस की विचारधारा संविधान की उनकी समझ से मेल नहीं खाती अथवा मोदी सरकार की नीतियाँ गलत हैं, तो ऐसी आलोचना को केवल अप्रिय या कठोर भाषा के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि कोई विशिष्ट वक्तव्य कानून के तहत निषिद्ध घृणा, हिंसा के उकसावे या चुनावी भ्रष्ट आचरण की आवश्यक शर्तें पूरी करता है, तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यही कसौटी भाजपा अथवा किसी अन्य दल के नेताओं पर भी लागू होनी चाहिए।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8ए के अंतर्गत चुनावी भ्रष्ट आचरण के लिए अयोग्यता निर्धारित करने की वैधानिक प्रक्रिया है। इसमें न्यायिक निष्कर्षों और चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है। कानून में अधिकतम छह वर्ष की अयोग्यता का प्रावधान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय में याचिका देकर किसी नेता पर सीधे छह वर्ष की पाबंदी लगवा सकता है। शिकायत, जाँच, दोष सिद्ध होना और अयोग्यता लागू होना अलग-अलग चरण हैं।चुनाव आयोग और न्यायपालिका की आलोचना भी कानूनी कसौटी पर समझनी चाहिए। चुनावी अनियमितताओं के आरोप उठाना, मतदाता सूची में पारदर्शिता की माँग करना और अदालत से राहत माँगना संवैधानिक व्यवस्था के भीतर उपलब्ध अधिकार हैं। लेकिन आलोचना का अधिकार न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, अदालत पर अनुचित दबाव डालने या न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करने की छूट नहीं देता। किसी आचरण को अवमानना अथवा अन्य अपराध मानने के लिए संबंधित कानून की शर्तें पूरी होना आवश्यक है।
जातिगत जनगणना, आरक्षण, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक आकांक्षाओं पर राजनीतिक दल अपनी नीतियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन सामाजिक न्याय की चर्चा और जातियों के बीच वैमनस्य फैलाने में अंतर है। इसी तरह धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना और धर्म के आधार पर नागरिकों को एक-दूसरे का शत्रु बताना दो अलग बातें हैं। कानून को देखना होगा कि कोई वक्तव्य सामाजिक समस्या पर बहस कर रहा है या किसी समुदाय के प्रति शत्रुता बढ़ा रहा है।नागरिक संबंधित भाषणों के प्रमाण जुटाकर चुनाव आयोग या सक्षम प्राधिकारी से शिकायत कर सकते हैं और जहाँ उचित हो, न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं। बाल ठाकरे की छह वर्ष की चुनावी अयोग्यता बताती है कि चुनाव प्रचार में धर्म के इस्तेमाल और समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप कानून के अनुसार सिद्ध होने पर गंभीर परिणाम ला सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राहुल गांधी के भाषणों या राजनीतिक गतिविधियों को बिना स्वतंत्र जाँच और कानूनी परीक्षण के उसी श्रेणी में रख दिया जाए।
प्रश्न यह नहीं है कि राहुल गांधी को बाल ठाकरे की तरह दंडित किया जाना चाहिए या नहीं। असली प्रश्न यह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी भी नेता के विरुद्ध कानून के उल्लंघन के पर्याप्त प्रमाण मिलने पर निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई होगी या नहीं। न्याय का अर्थ सभी नेताओं को समान दंड देना नहीं, बल्कि समान कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत प्रत्येक मामले का निर्णय करना है। भारतीय लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब धर्म, जाति और संस्थागत टकराव के बीच कानून की सर्वोच्चता कायम रहेगी।

आलोक मेहता
(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं।)