सीमावर्ती संवेदनशील राज्य पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में होने हैं, लेकिन राजनीतिक समीकरण अभी से बदलने लगे हैं। पंजाब में भाजपा को बड़ा राजनीतिक खिलाड़ी नहीं माना जाता, लेकिन उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने लगातार दूसरी बार पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर सबको चौंका दिया है। इस जीत का राजनीतिक अर्थ तब और बड़ा हो जाता है, जब पता चले कि पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) का छात्र संगठन दूसरे और सत्ता की प्रबल दावेदार कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई तीसरे स्थान पर रहा। जुलाई में जंतर-मंतर पर 'जेन जी' आंदोलन से बने माहौल के मद्देनजर यह जीत भाजपा के लिए बेहद राहतकारी है। बेशक पिछली बार एबीवीपी ने अकेले दम पर ही जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार उसे शिरोमणि अकाली दल के छात्र संगठन एसओआई का समर्थन आगामी विधानसभा चुनाव की बाबत राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है।
पिछले दिनों अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में भाजपा-अकाली गठबंधन की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं। मोदी सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बने परिसीमन विधेयक के समर्थन का ऐलान भी अकाली दल कर चुका है। बेशक भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोष और पंजाब के प्रभारी बनाए गए सतीश पूनिया सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का इरादा दोहरा रहे हैं, लेकिन जमीनी समीकरण बहुत अनुकूल नजर नहीं आता। दशकों तक गठबंधन में रहे भाजपा-अकाली कई बार पंजाब में सरकार बना चुके हैं, लेकिन विवादास्पद कृषि कानूनों के विरुद्ध लंबे चले किसान आंदोलन के चलते दोनों की दोस्ती टूट गई।
उन कृषि कानूनों की वापसी के बाद परस्पर विवाद का कोई कारण नहीं बचा। फिर 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दल अकेले लड़कर अपनी-अपनी ताकत भी आंक चुके हैं। अकाली दल मात्र तीन सीट जीत पाया, तो भाजपा दो। तब कैप्टन अमरेंद्र सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस और अकाली दल (संयुक्त) के साथ गठबंधन कर भाजपा 73 सीटों पर लड़ी थी। शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन में भाजपा 23 सीटों पर लड़ती रही, जिनमें सबसे ज्यादा 19 उसने 2017 के लोकसभा चुनाव में जीती थीं। बेशक 2024 के लोकसभा चुनाव में बिना कोई सीट जीते ही भाजपा ने मत प्रतिशत में छलांग लगाई, पर सिर्फ उसके बल पर राज्य में सत्ता का सपना साकार नहीं हो सकता। भाजपा का पूरा चुनावी गणित इस बात पर निर्भर नजर आता है कि बहुकोणीय मुकाबले में वह अपना हिंदू वोट बैंक एकजुट रख पाएगी, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि पंजाब में दूसरी बड़ी ताकत कांग्रेस को भी बड़ी संख्या में हिंदू मत मिलते रहे हैं। दरअसल, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में सिख मतदाताओं पर मजबूत पकड़ वाला अकाली दल और खासकर शहरी क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं की पसंद भाजपा मिलकर पंजाब में विजयी समीकरण बनाते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं। इस बीच आप के चमत्कारिक उभार से अकाली दल और भाजपा राज्य की राजनीति में तीसरे और चौथे स्थान पर फिसल गए हैं। फिर पिछले लोकसभा चुनाव में 'वारिस पंजाब दे' के नाम पर अमृतपाल सिंह की जीत ने भी पंजाब की बाबत चिंताजनक संकेत दिए हैं। इसलिए भी इस बार के विधानसभा चुनाव पंजाब की राजनीतिक दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनाव को संकेतक मानें, तस्वीर यही उभरती है कि सत्तारूढ़ आप को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ही चुनौती दे सकता है, लेकिन दोनों में अंतर्कलह कम नहीं।
आप के सात राज्यसभा सांसद भाजपा का कमल थाम चुके हैं। बेशक उनमें से कोई भी जनाधार वाला नेता नहीं है, लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाले दलबदल माहौल बनाने-बिगाड़ने में मददगार होते हैं, खासकर तब, जब आलाकमान के करीबी ही पाला बदल गए हों। उधर, पिछले विधानसभा चुनाव से पहले अपना घर खुद ही तहस-नहस कर लेने वाली कांग्रेस में भी सब कुछ ठीक नहीं है। भाजपा से आए नवजोत सिंह सिद्धू पर प्रियंका गांधी के वरदहस्त के चलते पहले तो पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ को इस्तीफा देना पड़ा और फिर मुख्यमंत्री पद से कैप्टन अमरेंद्र सिंह की भी अपमानजनक विदाई हुई।
फिलहाल दोनों नेता भाजपा में हैं। सिद्धू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने में तो सफल हो गए, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर चरणजीत सिंह चन्नी का दांव लग गया। हालांकि, वह विधायकों की पसंद नहीं थे, पर दलित होना उनके पक्ष में गया, लेकिन वह दोनों विधानसभा सीटों से खुद चुनाव हार गए। उसके बाद लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे चन्नी अब कांग्रेस पर खुलकर दबाव बना रहे हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए या फिर 'मुख्यमंत्री चेहरा' घोषित किया जाए, लेकिन बात बन नहीं रही। चन्नी की भाजपा से नजदीकियों की भी चर्चा है। अभी कह पाना जल्दबाजी होगी कि चन्नी भाजपा में शामिल होंगे या अलग दल बनाएंगे, लेकिन कांग्रेस में उनकी पारी लंबी नहीं बची है। बड़ी संख्या में दलित कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। इसलिए चन्नी का 'दलित कार्ड' कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। वैसे, इस बीच मायावती की बसपा का अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान भी अंततः कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाएगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा, शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन कर 20 सीटों पर लड़ी थी और नवांशहर की सीट जीतने में सफल भी रही थी। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि देश में सबसे ज्यादा 32 प्रतिशत दलित आबादी पंजाब में होने के बावजूद बसपा वहां कभी बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन पाई, जबकि वह उसके संस्थापक कांशीराम का गृह राज्य भी है।
जाहिर है, पंजाब में बहुकोणीय चुनावी मुकाबले की तस्वीर उभर रही है, लेकिन उसका लाभ सिर्फ भाजपा को ही मिलने की कोई गारंटी नहीं। ऐसे में सत्ता के लिए मुख्य चुनावी मुकाबला आप और कांग्रेस के बीच ही होने से रोकने के लिए भी भाजपा-अकाली गठबंधन जरूरी लगता है। बेशक अब गठबंधन पुरानी शर्तों पर नहीं हो सकता, जब अकाली दल 94 और भाजपा मात्र 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। जाहिर है, सभी 117 सीटों पर अकेले दम लड़ने की हुंकार भरने वाली भाजपा बराबर की हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाएगी और 40 से कम पर शायद मानेगी भी नहीं, पर वह बंटवारा भी न सिर्फ इन दोनों, बल्कि पंजाब के लिए भी अच्छा साबित होगा। सुखबीर सिंह बादल का शिरोमणि अकाली दल जहां ग्रामीण क्षेत्रों और खासकर सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं भाजपा शहरी क्षेत्रों और खासकर हिंदू समुदाय का। ऐसे में दोनों के बीच गठबंधन की बहाली पंजाब में राजनीतिक के साथ ही सामाजिक एकता को भी मजबूत करेगी। बेशक पंजाब आतंकवाद की अंधेरी सुरंग से निकल आया है, लेकिन अभी भी देश-विदेश में बैठे कुछ विघ्नसंतोषी तत्व फिर से माहौल बिगाड़ने के खतरनाक मंसूबे पाले हुए हैं, जिन्हें नाकाम करने के लिए राज्य में मजबूत सरकार और सामाजिक समरसता जरूरी है।

राजकुमार सिंह
(लेखक दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक हैं)