फ्रांस और इटली के अलावा पुर्तगाल और अल्बानिया में भी जन असंतोष सड़कों पर है। अपनी खूबसूरती के लिए वैश्विक पर्यटकों में लोकप्रिय अल्बानिया में महंगाई से मुश्किल होते जीवनयापन के अलावा बेलगाम भ्रष्टाचार को लेकर भी प्रधानमंत्री ईडी रामा से नाराजगी जन असंतोष का बड़ा कारण है। असंतोष की उग्रता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर पेट्रोल बम तक फेंके गए। अल्बानिया में आंदोलनकारी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, पर 2013 से सत्ता पर काबिज ईडी रामा कुर्सी छोड़ने के मूड में नहीं दिखते।
अमेरिका को अपवाद मान लें, तो शेष विश्व के लिए यूरोप स्वप्नलोक की तरह है। वहाँ का विकास, संपन्नता और चमक-दमक वाली जीवनशैली आकर्षित करती है। अगर वहाँ बसना वश की बात न हो, तो घूमने हर कोई जाना चाहता है। उसी यूरोप के कई देशों से अब डरावनी खबरें और तस्वीरें आ रही हैं। फ्रांस यूरोप के बड़े और विकसित देशों में से एक है, लेकिन वहाँ सात-आठ लाख लोग सरकार के विरोध में सड़कों पर आ गए। राजधानी पेरिस में ही एक लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर नजर आए। फ्रांस के कई शहरों में आगजनी और लूटपाट के दृश्य आम हो गए। बेशक, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सख्ती और दो हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी के बाद हिंसा पर अंकुश लग सकता है, लेकिन विकास की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा बेनकाब हो गया है।
फ्रांस में जन असंतोष के संकेत पहले भी मिलते रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें समय रहते समझने और सुलझाने में विफल रही। चमक-दमक वाली जीवनशैली के अलावा पेरिस फैशन, परफ्यूम और ऐतिहासिक इमारतों के लिए जाना जाता है। 143 साल पुराने टाउन हॉल को दंगाइयों ने जला दिया। फ्रांस सरीखे विकसित और आधुनिक देश में ऐसे डरावने दृश्यों ने कई सवाल खड़े किए हैं, लेकिन विडंबना है कि जवाब सोच और सुविधा के अनुसार दिए जा रहे हैं।फ्रांस में अगले साल चुनाव हैं। इसलिए इस हिंसा के राजनीतिक प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। कई जानकार इसमें कट्टर वामपंथ और आप्रवासियों की भूमिका भी देख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो सीधे-सीधे मुस्लिम आप्रवासियों को निशाने पर लेते हुए कहा है कि पेरिस जल्दी ही मुस्लिम शहर बन जाएगा। ट्रंप ने मैक्रों को सीमाएँ बंद करने की सलाह देते हुए कहा है कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध स्कूल या किसी और चीज से नहीं, बल्कि आप्रवासन से है।
आप्रवासन के मामले में फ्रांस यूरोप के सबसे उदार देशों में से एक है। इसका असर जनसांख्यिकीय परिवर्तन के रूप में दिखता भी है। जनसांख्यिकीय परिवर्तन से किसी देश या शहर का स्वरूप बदलने और सामाजिक चुनौतियाँ पैदा होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। पिछले एक दशक में ही फ्रांस ने इस्लामी आतंकवाद के कई दंश झेले हैं। इसलिए यूरोपीय देशों को राष्ट्रहित में आप्रवासन नीतियों पर पुनर्विचार तो करना ही चाहिए, लेकिन सिर्फ आप्रवासियों को हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराना सच से मुँह चुराना ही होगा।
सच यह भी है कि अन्य देशों की तरह फ्रांस में भी संसाधनों और संपत्ति पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है और बड़ी आबादी के लिए जीवनयापन मुश्किल होता जा रहा है। शायद इसलिए भी पिछले महीने स्कूलों की बदहाली के विरोध में शुरू हुए आंदोलन को अचानक सरकार-विरोधी हिंसक आंदोलन में तब्दील कर पाना आसान रहा। बेशक, मुद्दों की वास्तविकता के बावजूद किसी आंदोलन को हिंसक और अराजक होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। आंदोलनकारियों की आड़ में असामाजिक और आपराधिक तत्व अपने मंसूबों को अंजाम देने में सफल हो गए, तो यह सरकार और कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार एजेंसियों की भी नाकामी है।
लाखों लोग सड़कों पर आगजनी और लूट के लिए उतर आए, पर पुलिस और खुफिया तंत्र को भनक भी नहीं लगी। आगजनी और लूट में संलिप्त लोगों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई और उन्हीं से नुकसान की भरपाई सही सोच है, लेकिन आंदोलन को वामपंथियों और आप्रवासियों की कारगुजारी बता देने भर से सरकार अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती।मैक्रों सरकार को बढ़ती आर्थिक विषमता, महंगाई और बेरोजगारी से मुश्किल होते जीवनयापन जैसे आम आदमी से जुड़े अहम मुद्दों से मुँह चुराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर सरकार ने आम आदमी के जीवनयापन को आसान बनाने के लिए जरूरी कदम उठाए होते और स्कूलों की बदहाली के विरुद्ध आंदोलन से भी समय रहते संवाद के जरिये निपटने की कोशिश की होती, तो शायद असामाजिक और आपराधिक तत्व उसमें घुसकर अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे पाते।
फ्रांस के हालात जैसे ही संकेत कुछ अन्य यूरोपीय देशों से भी मिल रहे हैं। मिलान इटली की राजधानी नहीं है, लेकिन उसे दुनिया की फैशन राजधानी कहा जाता है। मिलान भी खूबसूरती और संपन्नता के लिए मशहूर है, लेकिन वहाँ से भी पिछले कुछ दिनों से उग्र जन असंतोष की खबरें और तस्वीरें आ रही हैं। इटली में भी जन असंतोष कई शहरों तक फैल चुका है और हिंसा में 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबरें हैं। उसके मूल में भी कमोबेश फ्रांस जैसे ही कारण हैं। बेलगाम महंगाई तथा शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की बदहाली और बढ़ती आर्थिक विषमता को लेकर चिंताएँ नई नहीं हैं। अगर समय रहते ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो जॉर्जिया मेलोनी को भी इटली में वैसे ही हालात का सामना करना पड़ सकता है, जैसे मुश्किल हालात से फ्रांस में मैक्रों रूबरू हैं।
फ्रांस और इटली के अलावा पुर्तगाल और अल्बानिया में भी जन असंतोष सड़कों पर है। अपनी खूबसूरती के लिए वैश्विक पर्यटकों में लोकप्रिय अल्बानिया में महंगाई से मुश्किल होते जीवनयापन के अलावा बेलगाम भ्रष्टाचार को लेकर भी प्रधानमंत्री ईडी रामा से नाराजगी जन असंतोष का बड़ा कारण है। असंतोष की उग्रता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर पेट्रोल बम तक फेंके गए। अल्बानिया में आंदोलनकारी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, पर 2013 से सत्ता पर काबिज ईडी रामा कुर्सी छोड़ने के मूड में नहीं दिखते।
पुर्तगाल और स्पेन अपनी समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ये दोनों देश भी बेलगाम महंगाई से आम नागरिक का जीवनयापन दूभर होने के कारण मुखर होते जन असंतोष से जूझ रहे हैं। पुर्तगाल, खासकर राजधानी लिस्बन में, बेलगाम रियल एस्टेट माफिया की बदौलत आवासीय संपत्तियाँ इतनी महँगी हो गई हैं कि आम पुर्तगाली न तो उन्हें खरीद सकता है और न ही किराये पर ले सकता है। इसमें विदेशी निवेशकों की भी बड़ी भूमिका है, जिनके लिए तमाम देशों की सरकारें लाल कालीन बिछाने को लालायित रहती हैं बिना यह विचार किए कि बेलगाम बाजारवाद का आम नागरिकों के जीवनयापन पर क्या असर पड़ेगा।
ब्रिटेन के नागरिक भी अरसे से महंगाई की मार झेल रहे हैं। वहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ ही आम नागरिक की पहुँच से बाहर हो गई हैं। ऐसा नहीं है कि बढ़ती आर्थिक असमानता से उपजा जन असंतोष सिर्फ यूरोप तक सीमित है। महंगाई की तपिश आर्थिक महाशक्ति अमेरिका में भी आम आदमी महसूस कर रहा है और अफ्रीकी देश केन्या में भी।जाहिर है, इधर-उधर की बातें करने के बजाय जन असंतोष के असली कारणों को समझते हुए नीतिगत सुधार का वक्त आ गया है। देश के लिए बाजार होना चाहिए, बाजार के लिए देश नहीं।

राजकुमार सिंह
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)