दिल्ली में एसीपी विवेक भगत से जुड़ा कथित एआई-निर्मित वीडियो आधुनिक सूचना-युद्ध के खतरनाक स्वरूप को उजागर करता है। द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, 3 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों के कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें की थीं। इसी बीच, एसीपी विवेक भगत को एक महिला प्रदर्शनकारी के साथ दुर्व्यवहार करते हुए दिखाने वाला वीडियो सामने आया। दिल्ली पुलिस ने इसे फर्जी बताया और वीडियो बनाने तथा प्रसारित करने के आरोप में नदीम अहमद अमीन को गिरफ्तार किया। सवाल है कि जब कृत्रिम प्रमाण गढ़े जा सकते हैं, तो आम नागरिक सच और छल में अंतर कैसे करेगा?
वीडियो का खंडन हो सकता है और आरोपी गिरफ्तार हो सकता है, लेकिन उससे बनी गलत धारणा समाप्त नहीं होती। स्क्रीनशॉट और क्लिप लगातार प्रसारित होते रह सकते हैं, जबकि अनेक दर्शकों तक सच्चाई पहुँच ही नहीं पाती। यही गलत सूचना की सबसे बड़ी चुनौती है। एआई और डीपफेक तकनीक अब किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और हावभाव की नकल करके झूठ को वास्तविकता जैसा प्रस्तुत करती है, जिससे संस्थाओं पर जनविश्वास भी कमजोर होता है।
कोविड महामारी ने इस समस्या की कीमत समझने का अवसर दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी के दौरान सही और गलत सूचनाओं की अत्यधिक उपलब्धता से पैदा हुई स्थिति को 'इन्फोडेमिक' कहा। अप्रमाणित उपचारों, टीकों के बारे में भ्रामक दावों और स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों ने लोगों के निर्णयों को प्रभावित करने का जोखिम पैदा किया। जब कोई व्यक्ति गलत सूचना के आधार पर चिकित्सकीय सलाह लेने में देर करता है या प्रमाणित उपचार पर अविश्वास करने लगता है, तो डिजिटल संदेश का प्रभाव वास्तविक जीवन में दिखाई देने लगता है। महामारी ने स्पष्ट किया कि संकट के समय गलत सूचना केवल भ्रम नहीं फैलाती, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रयासों को भी कठिन बना सकती है।
गलत सूचना की कीमत अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी चुकानी पड़ सकती है। किसी बैंक के बारे में झूठी खबर जमाकर्ताओं में घबराहट पैदा कर सकती है। किसी कंपनी के विरुद्ध अप्रमाणित आरोप उसके ग्राहकों और निवेशकों के भरोसे को नुकसान पहुँचा सकते हैं। हिंडनबर्ग मामले में हमने देखा कि कैसे एक खबर के कारण शेयर बाजार में गिरावट आ गई थी। किसी पर्यटन स्थल पर सुरक्षा को लेकर फैली अफवाह स्थानीय कारोबार और रोजगार को प्रभावित कर सकती है। सीमा पर तनाव या आतंकी हमले के समय नकली वीडियो, पुरानी तस्वीरें और अपुष्ट दावे जनता में भय पैदा कर सकते हैं तथा सुरक्षा संबंधी जानकारी को लेकर भ्रम बढ़ा सकते हैं। इससे पर्यटन और विदेशी निवेश बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। इन सभी परिस्थितियों में वास्तविक नुकसान की मात्रा प्रमाणों से निर्धारित की जानी चाहिए, लेकिन जोखिम की प्रकृति स्पष्ट है: गलत सूचना के कारण लिया गया गलत निर्णय वास्तविक कीमत वसूल सकता है।
पाँचवीं पीढ़ी के युद्ध और आधुनिक सूचना-संघर्षों के संदर्भ में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नागरिकों के बीच संस्थाओं की विश्वसनीयता पर अनावश्यक संदेह पैदा करना और साझा तथ्यों पर सहमति बनाने की क्षमता को कमजोर करना भी नुकसानदेह हो सकता है। किसी सूचना-अभियान के पीछे की मंशा और उसके संचालकों की पहचान जाँच से ही निर्धारित की जानी चाहिए। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि यदि कोई शत्रुतापूर्ण शक्ति समाज में मौजूद दरारों का लाभ उठाना चाहे, तो भ्रामक डिजिटल सामग्री उसके लिए एक उपयोगी माध्यम बन सकती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल सरकारी खंडन या कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। डिजिटल मंचों को संदिग्ध सामग्री की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी। समाचार संस्थानों को आरोप और सिद्ध तथ्य के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना होगा। जाँच एजेंसियों को मूल वीडियो, उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी प्रमाणों को सुरक्षित रखकर निष्पक्ष जाँच करनी होगी। एआई-निर्मित सामग्री की पहचान के लिए तकनीकी क्षमता विकसित करनी होगी, लेकिन किसी एक डिटेक्टर को अंतिम सत्य मानने से बचना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकों में डिजिटल साक्षरता विकसित की जाए, ताकि वे दृश्य, कैप्शन और वास्तविक प्रमाण के बीच अंतर समझ सकें।
यहाँ नागरिक की जिम्मेदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। किसी वीडियो को साझा करने से पहले उसके मूल स्रोत की जाँच करना, विश्वसनीय समाचार संस्थानों की रिपोर्ट देखना, आधिकारिक जानकारी से उसका मिलान करना और संदेह की स्थिति में उसे आगे न बढ़ाना छोटे कदम लग सकते हैं। लेकिन गलत सूचना के प्रसार की श्रृंखला को तोड़ने के लिए यही सबसे प्रभावी आदतों में से हैं। विशेषकर किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगाने वाली सामग्री को साझा करने से पहले यह याद रखना चाहिए कि हम केवल एक वीडियो नहीं भेज रहे, बल्कि किसी व्यक्ति के प्रति दूसरों की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं। यदि सामग्री झूठी निकली, तो उसका खंडन शायद उन सभी लोगों तक न पहुँचे, जिन्होंने मूल आरोप देखा था।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना आवश्यक है, शिकायत करना नागरिक का अधिकार है और सत्ता तथा संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना स्वतंत्र समाज की बुनियादी जरूरत है। लेकिन इन अधिकारों की रक्षा के लिए प्रमाणों की शुचिता भी आवश्यक है। किसी शिकायत की निष्पक्ष जाँच करना और किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण के दोषी ठहराना दो अलग बातें हैं। इसी प्रकार, किसी वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल उठाना और अपने अनुकूल निष्कर्ष निकालने के लिए उसे फर्जी घोषित कर देना भी अलग बातें हैं। जब हम इन अंतरों को भूल जाते हैं, तब सत्य की जगह राजनीतिक सुविधा और प्रमाण की जगह भावनात्मक आग्रह लेने लगते हैं।
गलत सूचना का सबसे बड़ा नुकसान किसी एक वायरल पोस्ट, किसी एक गिरफ्तारी या किसी एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता। यह समाज की निर्णय लेने की क्षमता, नागरिकों के आपसी विश्वास और संस्थाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है। यदि नागरिकों को यह विश्वास ही न रहे कि वे किसी दृश्य, समाचार या सार्वजनिक दावे की सत्यता का निर्धारण कर सकते हैं, तो लोकतांत्रिक विमर्श भी कमजोर पड़ने लगता है। भारत की डिजिटल सुरक्षा के लिए तकनीकी प्रणालियाँ और कानून जितने आवश्यक हैं, उतना ही आवश्यक एक ऐसा नागरिक समाज है, जो भावनात्मक उकसावे से पहले प्रमाण माँगे और अपने पक्ष के अनुकूल झूठ को भी स्वीकार करने से इनकार करे।
गलत सूचना की कीमत अंततः पूरा देश चुकाता है। कभी किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा के रूप में, कभी सामाजिक सद्भाव के रूप में, कभी आर्थिक नुकसान के रूप में और कभी राष्ट्रीय सुरक्षा पर बढ़ते जोखिम के रूप में। इसलिए किसी सूचना को आगे बढ़ाने से पहले उसका सत्यापन करना केवल व्यक्तिगत सावधानी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। झूठ को फैलने में कुछ सेकंड लगते हैं; उसके नुकसान की भरपाई में वर्षों लग सकते हैं।

विप्लव विकास
(लेखक कोलकाता निवासी स्तंभकार हैं।)