जेन जेड और जेन एल्फा के मुद्दे

जेन जेड एवं जेन एल्फा : अपेक्षा और विमर्श

जेन जेड और जेन एल्फा की समस्याओं पर भाजपा का विचार, डिजिटल माध्यमों और शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता पर जोर।

By : नरेंद्र कुमार
जेन जेड एवं जेन एल्फा : अपेक्षा और विमर्श

जेन-जी एवं जेन एल्फा को लेकर ईमानदारी से देखना होगा कि समस्या कहां है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने युवा नेतृत्व देने का कार्य किया। विभिन्न आयामों में निरंतर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का कार्य हो भी रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने जेन-जेड और जेन एल्फा के साथ उनकी समस्याओं को समझने तथा समाधान हेतु व्यापक संवाद एवं संपर्क करने का कार्य स्वयं अपने नेतृत्व में गठित समिति के जिम्मे लिया है। यह इस पीढ़ी की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में बड़ा और सराहनीय कदम है।

समस्या की जड़ कहां है

जेन-जेड और जेन एल्फा की समस्याओं के मूल में जो कारण दिखता है, वह इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों की वैश्विक दुनिया है, जो हर क्षण विविध दृश्य, संवाद और सामग्री परोस रही है। इसने बचपन से किशोरावस्था एवं युवावस्था तक के मानस पटल पर आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं एवं कल्पना की उड़ान को जो असीमित गति दी है, वह बाढ़ में उफनाई नदी के प्रचंड जल वेग की तरह है। यहां कोई सीमा है, न स्पष्ट लक्ष्य, न अनुशासन। यह भी उतना ही सच है कि किशोर एवं युवा पीढ़ी का संकल्प, अदम्य उत्साह, साहस एवं कुछ कर गुजरने का जुनून ही बड़े पैमाने पर सृजन करता है। यह ऊर्जा नष्ट नहीं होनी चाहिए। इसे दिशा मिलनी चाहिए। जेन-जेड एवं जेन एल्फा अनुशासित तथा सकारात्मक सृजन शक्ति से भरपूर हों, यह दायित्व समाज और शिक्षा जगत का है।

प्रथम कारण  इंटरनेट और नीतिगत शून्यता

सार्वजनिक इंटरनेट सेवा 1995 में वीएसएनएल के माध्यम से आई। उस समय से ही अनेक चिंतकों ने संभावित दुरुपयोग को लेकर आगाह किया था, परंतु किसी भी सरकार ने डिजिटल सामग्री को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बनाई। परिणामस्वरूप ओटीटी प्लेटफॉर्म, यूट्यूब एवं अन्य डिजिटल माध्यमों पर अश्लील सामग्री, क्रूरतम हिंसा, आक्रोश, नशे को महिमामंडित करने वाली सामग्री बेरोकटोक प्रवाहित हो रही है। यह किशोर और युवा मन को अराजक बनाने तथा नशे जैसी कुप्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का काम कर रही है। इंटरनेट अब अपरिहार्य जरूरत है, पर परोसी जाने वाली सामग्री का कोई जवाबदेह नियामक ढांचा अब तक नहीं है।

द्वितीय कारण

शिक्षा व्यवस्था का व्यवसायीकरण भारत में शिक्षा, शिक्षक एवं स्कूल की भूमिका कभी उस कुम्हार जैसी थी, जो मिट्टी के लोंदे को धैर्य से गढ़कर आकार देता है। बच्चे शिक्षा संग संस्कार, अनुशासन, खेल भावना एवं सह-अस्तित्व के गुण भी सीखते थे। शिक्षा, शिक्षक एवं स्कूल मिलकर प्रतिभा निखारते तथा राष्ट्र निर्माण के लिए जिम्मेदार नागरिक बनाते थे। 1991 में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने के बाद शिक्षा के स्वरूप में आमूल बदलाव आया। शिक्षा उद्योग बन गई है। कुकुरमुत्ते की तरह फैले कोचिंग संस्थान, डिग्री बांटने वाले संस्थान एवं नकल माफिया इसी व्यवस्था की उपज हैं। उद्योग में नैतिकता, संवेदनशीलता या चरित्र निर्माण की कोई जगह नहीं होती, वहां केवल लाभ-हानि होती है। यही जेन-जेड की असल त्रासदी है। पहचान की तलाश, दिशाहीनता, अस्तित्व का संकट। आए दिन मीडिया में खबरें आती हैं कि मोबाइल छीनने पर, परीक्षा में असफलता पर, नौकरी न मिलने पर युवक आत्महत्या कर रहे हैं। यह स्थिति हमारी सामूहिक विफलता की गवाही देती है।

तृतीय कारण

भविष्य की अनिश्चितता और उपभोक्तावादी दबाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के चलते सरकारी, सार्वजनिक और निजी तीनों क्षेत्रों में तेजी से बदलाव आया है। शिक्षा निरंतर महंगी हो रही है, रोजगार अनिश्चित है। प्रतिस्पर्धा बेहिसाब है। समाज में धन-प्रदर्शन की संस्कृति तेजी से बढ़ी है। महंगे मोबाइल, ब्रांडेड वस्त्र, लग्जरी वाहन और रुतबे का प्रदर्शन, इन सबको सामाजिक मान्यता मिल रही है। एक को देख दूसरे की महत्वाकांक्षा जागती है। जब साधन न हों तो आक्रोश जन्म लेता है। जेन-जेड एवं जेन एल्फा का एक बड़ा हिस्सा इसी आक्रोश को भीतर लिए जी रहा है।

समाधान की राह

आवश्यकता है कि शिक्षाविद, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और नीति-निर्माता मिलकर जेन-जेड एवं जेन एल्फा के मनोविज्ञान को गहराई से समझें। उनसे संवाद करें, उनकी सुनें और उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का ठोस रोडमैप तैयार करें। यह पीढ़ी समस्या नहीं है। यह पीढ़ी एक विशाल संभावना है। इसे केवल सही दिशा और भरोसेमंद व्यवस्था की जरूरत है।

हरिश्चंद्र श्रीवास्तव
(लेखक, भाजपा के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता हैं।)

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