जेन जी शब्द आज भारतीयों के लिए अपरिचित नहीं है। विशेषकर दिल्ली में छात्र-युवाओं के आंदोलनों और उसके बाद हुई विभिन्न घटनाओं को लेकर इस पीढ़ी की सोच, राजनीतिक चेतना और विरोध के तौर-तरीकों पर व्यापक चर्चा हुई है। कहीं उनके आक्रोश को राजनीतिक साजिश बताया गया, तो कहीं उनके विरोध को लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना गया। इसी बहस के बीच मुंबई में लगभग 2,000 जेन जी और जेन अल्फा विद्यार्थियों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सीधा संवाद एक महत्वपूर्ण संदेश सामने लाता है- युवा समाज को दोष देने के बजाय उसके साथ संवाद की आवश्यकता है।
देश के 100 से अधिक शहरों के स्कूल और कॉलेजों से आए विद्यार्थियों के साथ इस संवाद में 11 वर्ष के किशोरों से लेकर युवा-युवतियों तक ने भाग लिया। देश के एक बड़े सामाजिक संगठन के प्रमुख का इतने कम उम्र के विद्यार्थियों के बीच बैठकर उनकी बातें सुनना ही युवाओं के महत्व को स्पष्ट करता है। संदेश साफ है- 'युवा निरर्थक नहीं हैं'; बल्कि यही युवा भारत के भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक हैं।डॉ. भागवत ने कहा, 'मुझे लगता है कि जेन जी और जेन अल्फा हमारी पीढ़ी से अधिक ईमानदार हैं। अगर मुझे आंख बंद करके किसी पर विश्वास करना हो, तो मैं जेन जी पर विश्वास करूंगा।' जिस जेन जी के आंदोलनों में कभी 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हटाओ' जैसे नारे भी सुनाई दिए थे, उसी जेन जी पर मोहन भागवत का विश्वास जताना संवाद और लोकतांत्रिक दृष्टि का महत्वपूर्ण उदाहरण है। जब प्रश्न भारत का हो, तब व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, मतभेद और क्षणिक भावनाओं से ऊपर उठकर भारत को सर्वोपरि रखना चाहिए।
भागवत के वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने जेन जी के विरोध को सीधे राष्ट्रविरोधी कहकर खारिज नहीं किया। उनके अनुसार, यदि युवा आंदोलन कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके सामने कोई समस्या या असंतोष है। सबसे पहले उस समस्या को समझना जरूरी है। उन्हें चुप कराना नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का समाधान करना हमारा कर्तव्य है।हालांकि, लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण पक्ष को भी समझना होगा। विरोध करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन विरोध का भी एक लोकतांत्रिक तरीका होता है। भागवत ने इसी बात की ओर संकेत किया। उन्होंने स्पष्ट कहा, 'मैं कभी नहीं कहूंगा कि जेन जी को आंदोलन नहीं करना चाहिए था। लेकिन आंदोलन कैसे किया जाए, उसकी भी एक लोकतांत्रिक पद्धति है। संविधान निर्माता बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इस विषय पर स्पष्ट विचार रखे हैं। संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए आंदोलन करना कभी गलत नहीं हो सकता।'
भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही- पहले की पीढ़ियों में बड़ों की बात मान लेने की प्रवृत्ति अधिक थी। लेकिन समय बदल गया है। आज का युवा किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करना चाहता कि 'बड़ों ने कहा है'। वह पूछता है- क्यों? इस 'क्यों' को नकारात्मक दृष्टि से देखने का कोई कारण नहीं है। बल्कि प्रश्न करने की आदत स्वस्थ समाज की पहचान है। जब कोई बच्चा प्रश्न करता है, तो हम उसे जिज्ञासु कहते हैं। फिर जब कोई युवा प्रश्न करता है, तो उसे अवज्ञाकारी क्यों कहा जाए? जेन जी और जेन अल्फा सूचना के युग में बड़े हो रहे हैं। उनके हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट है तथा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के विचारों तक उनकी पहुंच है। उनके सामने सूचना की कमी नहीं, बल्कि चुनौती यह है कि इतनी अधिक सूचनाओं के बीच सत्य और असत्य को कैसे पहचाना जाए। इसलिए आज के युवाओं को केवल निर्देश देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें तर्क के साथ समझाना होगा। उनके प्रश्नों का सम्मान करना होगा। यही पीढ़ियों के बीच संबंध को मजबूत कर सकता है।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की चिंताएं भी गंभीरता से समझी जानी चाहिए। नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, शिक्षा के अवसरों में असमानता और बुनियादी ढांचे की समस्याओं को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह समझना होगा कि युवाओं के आक्रोश के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं। भागवत ने कहा, 'हमें यह भी देखना चाहिए कि युवा, जेन जी आंदोलन कर रहे हैं तो निश्चित रूप से उन्हें कोई असुविधा है। विरोध मेरे-आपके खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए होना चाहिए। कहीं कोई कमी है तो उसे ठीक किया जा सकता है। उन्हें चुप कराने के बजाय उनकी समस्याओं का समाधान करना हमारा कर्तव्य है।'
विभिन्न रिपोर्टों में भारत की लगभग 35 प्रतिशत आबादी को जेन जी और जेन अल्फा से संबंधित बताया गया है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की तस्वीर है। यदि इस पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, संस्कार, मूल्य और अवसर मिलें, तो भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति उसकी सबसे बड़ी संपत्ति बन सकती है।लेकिन जिम्मेदारी केवल राज्य और समाज की नहीं है। युवाओं को भी समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य जुड़े होते हैं। प्रश्न करने का अधिकार है तो लोकतांत्रिक पद्धति का पालन करने की जिम्मेदारी भी है। विरोध का अधिकार है तो सामाजिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता के प्रति जिम्मेदारी भी है। इसलिए जेन जी से डरने की नहीं, उसे समझने की आवश्यकता है। उन्हें प्रश्न करने देना होगा, उनकी बातें सुननी होंगी और जहां वे गलत हों, वहां तर्क के साथ समझाना होगा। साथ ही उनकी ऊर्जा और क्षमता को राष्ट्र निर्माण से जोड़ना होगा।
मुंबई में उन लगभग दो हजार युवा मनों के सामने मोहन भागवत का संवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट संदेश देता है- जेन जी और जेन अल्फा केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं; वे आज के भारत के निर्माण में भी सहभागी हैं।

दिगंत चक्रवर्ती
(लेखक जागरण जोश अवॉर्डी युवा स्तंभकार हैं)