हिमालय की पिघलती बर्फ की चुनौती

हिंदुकुश हिमालयः पिघलती बर्फ और दक्षिण एशिया के भविष्य की चुनौती

हिंदुकुश हिमालय की पिघलती बर्फ और तेजी से पीछे हटते हिमनद दक्षिण एशिया की जल, खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियाँ पेश कर रहे हैं।

By : नरेंद्र कुमार
हिंदुकुश हिमालयः पिघलती बर्फ और दक्षिण एशिया के भविष्य की चुनौती

हिंदुकुश हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं का विस्तार नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की जीवन रेखा है। अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान और म्यांमार तक फैला यह विशाल पर्वतीय क्षेत्र जल, कृषि, ऊर्जा, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। इसलिए इसका पर्यावरणीय परिवर्तन पूरे दक्षिण एशिया की जल, खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा का प्रश्न है।

आज इस क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बढ़ता तापमान, बदलती वर्षा, घटती बर्फ, तेजी से पीछे हटते हिमनद, पिघलता परमाफ्रॉस्ट, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और हिमनदीय झीलों के विस्तार ने हिमालयी पारिस्थितिकी की स्थिरता को चुनौती दी है। तापमान वृद्धि के साथ हिमनदों के पिघलने, बाढ़ और सूखे का जोखिम बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने हिमनदों के पीछे हटने और बर्फ के आवरण में कमी को महत्वपूर्ण जलवायु जोखिमों में शामिल किया है।

सबसे चिंताजनक संकेत हिमनदों और बर्फ में हो रहे बदलाव हैं। मार्च 2026 में इसिमोड की रिपोर्टों ने बताया कि हिंदुकुश हिमालय के हिमनदों में बर्फ के नुकसान की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है। 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में हिमनदों की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है। यह बदलाव लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा से जुड़ा है।

हिमनद प्राकृतिक जल-भंडार की तरह काम करते हैं। उनका तेजी से पिघलना प्रारंभिक तौर पर अतिरिक्त पानी ला सकता है, लेकिन लगातार घटता आकार भविष्य में नदी प्रवाह को बनाए रखने की क्षमता को कमजोर करेगा। मौसमी बर्फ भी दक्षिण एशिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसिमोड की 2025 की 'स्नो अपडेट' रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुकुश हिमालय में लगातार तीसरे वर्ष सामान्य से कम बर्फ पड़ी। 2026 की रिपोर्ट में बर्फ का आवरण दीर्घकालिक औसत से 27.8 प्रतिशत कम रहा और यह लगातार चौथा वर्ष था, जब मौसमी बर्फ सामान्य से नीचे रही। कई नदी बेसिनों में इसका योगदान 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत से अधिक तक हो सकता है। बर्फ में बदलाव सीधे जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।

इस बदलती जल-व्यवस्था का प्रभाव कृषि पर सबसे पहले और व्यापक रूप से पड़ सकता है। दक्षिण एशिया की बड़ी आबादी कृषि, पशुपालन और जल आधारित आजीविकाओं पर निर्भर है। सिंचाई के पानी में मौसमी असंतुलन खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। शहरों में पेयजल की मांग बढ़ रही है। इसलिए हिमालय की रक्षा वास्तव में दक्षिण एशिया की खाद्य और जल सुरक्षा की रक्षा है।जलवायु संकट ने आपदाओं की प्रकृति को भी जटिल बनाया है। तीव्र वर्षा, अचानक बाढ़, भूस्खलन और हिमनदीय झीलों के फटने से होने वाली बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) का खतरा बढ़ रहा है। इसिमोड ने 2026 में इन आपदाओं के जोखिम बढ़ने की चेतावनी दी है।

नेपाल की लांगटांग घाटी स्थित याला ग्लेशियर इसका स्पष्ट उदाहरण है। इसिमोड के अनुसार, 1970 के दशक से याला ग्लेशियर लगभग 66 प्रतिशत क्षेत्रफल खो चुका है और इसका अग्रभाग करीब 784 मीटर पीछे हट चुका है। मई 2025 में इसे 'मृत ग्लेशियर' घोषित किया गया। इसका क्षरण जल सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है और कृषि, जलविद्युत तथा पर्वतीय आजीविका प्रभावित हो सकती है। याला ग्लेशियर स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की नहीं, वर्तमान की चुनौती है।

हिमालय की चुनौती केवल जलवायु परिवर्तन से पैदा नहीं हुई है। अनियोजित सड़क निर्माण, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, पर्यटन का दबाव, वनों का क्षरण और संवेदनशील ढलानों पर बढ़ता निर्माण भी जोखिम बढ़ा रहे हैं। विकास आवश्यक है, लेकिन हिमालय की सीमाओं की अनदेखी दीर्घकाल में आपदा का कारण बन सकती है। इसलिए हर परियोजना का वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य होना चाहिए।जैव विविधता की दृष्टि से भी हिंदुकुश हिमालय असाधारण महत्व रखता है। हिम तेंदुआ, लाल पांडा, कस्तूरी मृग, हिमालयी मोनाल और असंख्य वनस्पतियां इसकी पारिस्थितिक संपदा हैं। जलवायु परिवर्तन से प्रजातियों के आवास ऊपर खिसक रहे हैं और मानवीय गतिविधियों से खंडित हो रहे हैं। इसिमोड ने प्रजातियों की संख्या में कमी और आवास की गुणवत्ता में गिरावट को रेखांकित किया है।

हिमनदों का क्षरण जल-चक्र बदलता है और कृषि तथा पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है; इससे आजीविका, पलायन और सामाजिक सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। किसी एक हिस्से की अनदेखी पूरे तंत्र को कमजोर कर सकती है।वर्ष 2026 में इसिमोड द्वारा प्रस्तुत क्षेत्रीय क्रायोस्फीयर रणनीति महत्वपूर्ण कदम है। अब दक्षिण एशिया को आपदा के बाद राहत देने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर जोखिम को पहले पहचानने वाली व्यवस्था बनानी होगी। उपग्रह निगरानी, मौसम केंद्र, हिमनदीय झीलों की निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र महत्वपूर्ण हैं। जल संरक्षण को विकास नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाते हुए वर्षाजल संचयन, जलस्रोतों का पुनर्जीवन और जल-कुशल कृषि को बढ़ावा देना होगा। पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना उपयोगी होगा।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न विकास की दिशा का है। सड़कें, पुल, जलविद्युत और पर्यटन जरूरी हैं, लेकिन निर्माण हिमालय की पारिस्थितिक वहन क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। संवेदनशील ढलानों पर निर्माण सीमित हो और आपदा-जोखिम मानचित्रों को विकास योजनाओं का आधार बनाया जाए। हिमालय में 'जितना संभव हो उतना निर्माण' नहीं, बल्कि 'जितना प्रकृति सह सके उतना निर्माण' विकास का सिद्धांत होना चाहिए।नागरिक समाज और विद्यालय भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण भागीदार हो सकते हैं। पर्यावरण शिक्षा को स्थानीय जलस्रोतों, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष अध्ययन से जोड़ा जाना चाहिए। युवाओं को जल संरक्षण, टिकाऊ पर्यटन और स्थानीय पारिस्थितिकी के प्रति जिम्मेदार बनाना आवश्यक है।

आज हिंदुकुश हिमालय मानवता को स्पष्ट चेतावनी दे रहा है। 2025 और 2026 के आंकड़े तथा बढ़ते पर्वतीय जोखिम बताते हैं कि संकट को टालना अब संभव नहीं है। हिमालयी क्रायोस्फीयर दो अरब से अधिक लोगों की जल सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए तत्काल क्षेत्रीय सहयोग और वैज्ञानिक निगरानी आवश्यक है।अब समय है कि हिंदुकुश हिमालय को पर्यटन, जलविद्युत या रणनीतिक दृष्टि से आगे बढ़कर एक साझा और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जाए। दक्षिण एशिया के देशों को साझा वैज्ञानिक निगरानी, पारदर्शी जलवायु आंकड़े, सीमा-पार आपदा चेतावनी, जल सहयोग और प्रकृति-आधारित विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

हिमालय की बर्फ में केवल पानी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की सभ्यता का भविष्य सुरक्षित है। उस बर्फ का पिघलना केवल पर्यावरणीय घटना नहीं; यह आने वाले जल, खाद्य और सामाजिक संकट का संकेत है। इसलिए हिमालय की रक्षा आज की पर्यावरणीय जिम्मेदारी भर नहीं, आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। विकास और पर्यावरण के बीच चुनाव नहीं, बल्कि दोनों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन ही भारत सहित संपूर्ण दक्षिण एशिया के सुरक्षित भविष्य का रास्ता प्रशस्त करेगा।

डॉ. सुशील द्विवेदी

(लेखक विज्ञान व पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं।)

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