भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाने और जीवन में प्रेम, उल्लास तथा आत्मीयता का संचार करने के माध्यम भी हैं। करवा चौथ ऐसा ही एक पर्व है, जिसका विवाहित महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह त्योहार पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से जुड़ा है। इस वर्ष करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जाएगा।
करवा चौथ की तैयारियां कई दिन पहले से ही आरंभ हो जाती हैं। बाजारों में रंग-बिरंगी चूड़ियां, सुंदर वस्त्र, आभूषण, मेहंदी और पूजा की सामग्री सजने लगती है। महिलाएं अपने हाथों पर मेहंदी रचाती हैं और पारंपरिक वेशभूषा में सजती-संवरती हैं। घरों में उत्सव जैसा वातावरण दिखाई देता है। कहीं महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा की तैयारी करती हैं, तो कहीं परिवार के सदस्य मिलकर इस दिन को विशेष बनाने का प्रयास करते हैं। इन तैयारियों में केवल सजने-संवरने का उत्साह नहीं, बल्कि अपनों के साथ खुशियां बांटने की भावना भी छिपी होती है।
परंपरा के अनुसार, करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद व्रत आरंभ करती हैं। अनेक महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण नहीं करतीं। शाम को भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा की जाती है। महिलाएं एकत्र होकर करवा चौथ की कथा सुनती हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। पूजा में करवे का विशेष महत्व है। करवा मिट्टी का वह पात्र है, जिसमें जल रखकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
इस पर्व का सबसे प्रतीक्षित क्षण चंद्रमा के उदय होने का होता है। दिनभर व्रत रखने के बाद महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करती हैं, उन्हें अर्घ्य अर्पित करती हैं और परंपरा के अनुसार, छलनी से पहले चंद्रमा तथा फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा अनेक परिवारों में प्रचलित है। चांद के दर्शन के साथ ही दिनभर की प्रतीक्षा समाप्त होती है और परिवार में खुशियों का वातावरण छा जाता है।
करवा चौथ का धार्मिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसका भावनात्मक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह पर्व पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, सहयोग और जिम्मेदारी की याद दिलाता है। हालांकि, किसी भी रिश्ते की मजबूती केवल व्रत या अनुष्ठान पर निर्भर नहीं करती। एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना, कठिन समय में साथ देना और जीवन की जिम्मेदारियों को साझा करना दांपत्य जीवन को वास्तविक अर्थों में सुखी बनाता है।
बदलते समय के साथ करवा चौथ का स्वरूप भी व्यापक हुआ है। आज अनेक पति अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करने के लिए स्वयं भी व्रत रखते हैं। यह बदलाव बताता है कि रिश्तों में समर्पण एकतरफा नहीं, बल्कि परस्पर होना चाहिए। पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के स्वास्थ्य, सुख और सम्मान की चिंता करें, तभी परिवार में समानता और आत्मीयता का वातावरण बनता है।
करवा चौथ की परंपरा हमें यह संदेश देती है कि जीवन की व्यस्तताओं के बीच अपने संबंधों के लिए समय निकालना आवश्यक है। उपहार, आभूषण और सजावट त्योहार की सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन रिश्तों की असली चमक स्नेह, विश्वास और संवेदनशीलता से आती है। चांद का इंतजार समाप्त हो जाता है, रात ढल जाती है और त्योहार बीत जाता है, लेकिन प्रेम और अपनत्व की अनुभूति लंबे समय तक बनी रहती है। यही करवा चौथ की वास्तविक सुंदरता है।

महेन्द्र तिवारी
(लेखक स्तंभकार हैं।)