भारत की सभ्यता का विकास नदियों के प्रवाह से जुड़ा रहा है। सिंधु, गंगा, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियां केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं हैं, बल्कि इन्होंने भारतीय समाज, कृषि, व्यापार, संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन को आधार प्रदान किया है। भारतीय परंपरा में नदियों को माता का दर्जा दिया गया है, क्योंकि वे जल और जीवन देकर सबका पालन-पोषण करती हैं। ऋग्वेद में सरस्वती को 'नदितमा, अम्बितमा, देवितमा' कहकर सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।
किंतु आधुनिक भारत में यही नदियां एक नई चुनौती का प्रतीक बन गई हैं। कहीं बाढ़ विनाश का कारण है तो कहीं जलाभाव और सूखा जीवन को संकटग्रस्त कर रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल जल की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उसके समुचित वितरण और वैज्ञानिक प्रबंधन की भी है। बुंदेलखंड में इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से केन-बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना प्रस्तावित की गई है।
पर्यावरणीय प्रभावों का भी रखा जाए ध्यान
विश्व की प्रमुख सभ्यताएं नील, टिगरिस-यूफ्रेटिस और सिंधु घाटी इस बात का प्रमाण हैं कि जल संसाधन मानव विकास की आधारशिला रहे हैं। भारत की राष्ट्रीय नदी जोड़ो योजना की पहली प्रमुख परियोजना के रूप में केन-बेतवा परियोजना को बुंदेलखंड की जल समस्या के समाधान के रूप में देखा जा रहा है। यह क्षेत्र लंबे समय से सूखा, कृषि संकट, सीमित रोजगार और पलायन जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। इसलिए इस परियोजना से लोगों की अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक हैं।लेकिन किसी भी बड़ी जल परियोजना की सफलता केवल पानी पहुंचाने से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक, पर्यावरणीय और दीर्घकालिक प्रभावों के संतुलित मूल्यांकन से निर्धारित होती है।
भू-जल संवर्धन में है बुंदेलखंड के जल संकट का समाधान
बुंदेलखंड का जल संकट प्राकृतिक और मानवीय, दोनों कारणों का परिणाम है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लगभग 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस भूभाग की संरचना कठोर ग्रेनाइट और विंध्यन चट्टानों से बनी है, जिससे वर्षा जल का भूगर्भ में समावेशन सीमित रहता है। यहां औसतन 800 से 1000 मिलीमीटर वर्षा होती है, किंतु सबसे बड़ी समस्या उसका असमान वितरण है। कुछ महीनों में अत्यधिक वर्षा होती है और शेष वर्ष लंबा शुष्क काल बना रहता है। परिणामस्वरूप अधिकांश वर्षा जल बहकर निकल जाता है और भूजल का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हो पाता।आधुनिक जल विज्ञान स्पष्ट करता है कि किसी क्षेत्र की जल सुरक्षा केवल बाहरी स्रोतों से जल लाने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जल संरचनाओं के संरक्षण पर भी समान रूप से निर्भर करती है।
शताब्दियों पहले हमारे पूर्वजों ने जल प्रबंधन की आवश्यकता समझ ली थी
भारतीय परंपरा में जल संरक्षण को सामाजिक दायित्व माना गया है। चंदेल काल में निर्मित तालाब, कुएं, बावड़ियां और छोटे जलाशय इस बात के प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज स्थानीय जल प्रबंधन की वैज्ञानिक आवश्यकता को सदियों पहले समझ चुके थे। दुर्भाग्य से समय के साथ इन पारंपरिक प्रणालियों की उपेक्षा हुई, तालाबों पर अतिक्रमण बढ़ा, भूजल दोहन तेज हुआ और जल की मांग लगातार बढ़ती गई। मानसून की बढ़ती अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।ऐसे समय में यदि केन-बेतवा परियोजना को स्थानीय जल संरक्षण योजनाओं के साथ जोड़ा जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
जल की कमी वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है परियोजना का मुख्य उद्देश्य
केन-बेतवा परियोजना का उद्देश्य केन नदी के उपलब्ध जल को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई तथा पेयजल सुविधाओं का विस्तार करना है। इसके अंतर्गत बांध, नहरों और जल हस्तांतरण संरचनाओं का निर्माण प्रस्तावित है। यदि परियोजना का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो किसान केवल वर्षा आधारित खेती तक सीमित नहीं रहेंगे। रबी फसलों, बागवानी, सब्जी उत्पादन और अन्य कृषि गतिविधियों का विस्तार संभव होगा। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों की आय में सुधार होगा तथा कृषि आधारित उद्योगों, भंडारण और स्थानीय बाजारों को भी नई गति मिलेगी।
वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए बचाई जाए इलाके की जैव विविधता
नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि जटिल पारिस्थितिकी तंत्र हैं। उनके प्राकृतिक प्रवाह में परिवर्तन से जलीय जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और मिट्टी की संरचना पर प्रभाव पड़ सकता है। केन नदी का क्षेत्र, विशेषकर पन्ना के वन, जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। इसलिए परियोजना के साथ वैज्ञानिक पर्यावरण प्रबंधन, न्यूनतम वन क्षति, प्रभावी क्षतिपूरक वनीकरण तथा सतत पर्यावरणीय निगरानी अनिवार्य है।विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही इस परियोजना की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करेगा। केवल नदी जोड़ो परियोजना बुंदेलखंड की जल समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकती। इसके साथ वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, चेक डैम, छोटे बांध, पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन और भूजल पुनर्भरण जैसी योजनाओं को समान महत्व देना होगा। जल प्रबंधन को केवल जल उपलब्ध कराने तक सीमित न रखकर जल के विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण से भी जोड़ना होगा।
जल उपलब्धता के अनुरूप हो खेती-बाड़ी
बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में फसल चयन स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप होना चाहिए। ऐसी कृषि प्रणाली विकसित करनी होगी, जो अधिक उत्पादन के साथ-साथ दीर्घकालिक जल सुरक्षा भी सुनिश्चित करे। परियोजना की सफलता सामाजिक भागीदारी पर भी निर्भर करेगी। जहां भूमि अधिग्रहण, विस्थापन अथवा आजीविका प्रभावित होने की संभावना है, वहां स्थानीय समुदायों का विश्वास अर्जित करना आवश्यक होगा। पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया, उचित पुनर्वास और जनसहभागिता किसी भी विकास परियोजना की सफलता की मूल शर्त हैं।
जलवायु परिवर्तन भी नदी गठजोड़ के लिए चुनौती
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन ने जल संसाधन प्रबंधन की चुनौती को और जटिल बना दिया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार भविष्य में वर्षा की तीव्रता, वितरण और मौसमी स्वरूप में परिवर्तन संभव है। इसलिए जल परियोजनाओं की योजना बनाते समय केवल वर्तमान परिस्थितियों को नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को भी ध्यान में रखना होगा। जल प्रबंधन को लचीला, वैज्ञानिक और सतत निगरानी आधारित बनाना समय की आवश्यकता है।
बुंदेलखंड के लिए एक बड़ा अवसर है नदी गठजोड़ योजना
केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि इसे केवल इंजीनियरिंग परियोजना के रूप में देखा गया, तो इसके लाभ सीमित रह सकते हैं। किंतु यदि इसे जल सुरक्षा, कृषि सुधार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास की समग्र योजना के रूप में लागू किया गया, तो यह क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा दे सकती है। भारत को ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता है, जिसमें आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। केन-बेतवा परियोजना इसी संतुलन की महत्वपूर्ण परीक्षा है।
और अंत में
बुंदेलखंड को केवल अधिक पानी नहीं, बल्कि स्थायी जल सुरक्षा चाहिए। उसे ऐसी कृषि व्यवस्था चाहिए, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी टिकाऊ बनी रहे। बड़े बांधों और नहरों के साथ स्थानीय जल संरक्षण, भूजल संवर्धन, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामाजिक सहभागिता का समन्वय ही इस परियोजना की वास्तविक शक्ति होगा।
यदि पारदर्शिता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और जनभागीदारी के साथ केन-बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना को लागू किया गया, तो यह केवल जल हस्तांतरण की योजना नहीं रहेगी, बल्कि बुंदेलखंड के इतिहास में जल-न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और समग्र विकास का एक परिवर्तनकारी अध्याय सिद्ध होगी।

डॉ. सुशील द्विवेदी
(लेखक विज्ञान एवं पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं।)