कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता

कुटुंब प्रबोधन ही बचा सकता है बिरवरते परिवारों को 

भारतीय समाज में परिवारों के बीच घटते संवाद और बढ़ती भावनात्मक दूरियों के बीच, 'कुटुंब प्रबोधन' आधुनिक भारतीय परिवारों को मजबूती प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया है।

By : स्वदेश डेस्क
कुटुंब प्रबोधन ही बचा सकता है बिरवरते परिवारों को 

चंद्रवेश पांडेय

पुणे का केतन हो, इंदौर का राजा रघुवंशी हो, या फिर ऐसे अनेक युवा जिनकी हत्या अपने ही निकटतम रिश्तों के षड्यंत्र में हुई इन घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। इन मामलों में सबसे अधिक चर्चा अपराधियों की होती है, लेकिन एक पक्ष ऐसा भी है जो किसी अदालत में अभियुक्त नहीं होता, फिर भी उम्रभर सजा भुगतता है। वे हैं दोनों पक्षों के माता-पिता। एक परिवार अपने बेटे को खो देता है, दूसरा अपनी बेटी या बेटे के अपराध के कलंक के साथ जीने को विवश हो जाता है। एक घर में तस्वीर पर माला चढ़ती है, दूसरे घर में जीवित संतान का चेहरा देखने की हिम्मत नहीं बचती। इसलिए इन घटनाओं को केवल अपराध की दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था के संकट के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'कुटुंब प्रबोधन' का आग्रह इसी प्रश्न के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। वर्षों से संघ कहता आया है कि समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति नहीं, बल्कि परिवार है। परिवार यदि संवादशील, संस्कारित और आत्मीय होगा तो समाज भी वैसा ही बनेगा। यदि परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था बनकर रह जाएगा, तो समाज में संवेदनहीनता, अकेलापन और नैतिक विघटन बढ़‌ना स्वाभाविक है।

अपराध से पहले टूटता है संवाद

आज अधिकांश चर्चित अपराधों की पड़ताल करने पर एक बात बार-बार सामने आती है कि घर और बाहर की दुनिया के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है। माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार और सुविधाएँ देने में कोई कमी नहीं छोड़ते, लेकिन कई बार वे यह जान ही नहीं पाते कि घर की चौखट के बाहर उनके बच्चे किस मानसिक संसार में जी रहे हैं।

सिया के माता-पिता को विश्वास था कि उनकी बेटी अपने मंगेतर के साथ सुखी जीवन की तैयारी कर रही है। चेतन के परिवार को लगा कि उनका बेटा सामान्य दिनचर्या में व्यस्त है। केतन के माता-पिता अपनी होने वाली बहू पर पूरा भरोसा करते थे। लेकिन इन तीनों परिवारों के समानांतर एक ऐसी कहानी लिखी जा रही थी जिसकी किसी को भनक तक नहीं लगी। परिणाम-तीन परिवार एक साथ बिखर गए। यही स्थिति केवल इन चर्चित मामलों तक सीमित नहीं है। रिश्तों में छल, विवाहेतरसंबंध, डिजिटल दुनिया में गुप्त जीवन, संवाद का अभाव और भावनात्मक अलगाव आज अनेक पारिवारिक त्रासदियों की पृष्ठभूमि बन रहे हैं।

पितृसत्ता का सुविधाजनक नैरेटिव इन घटनाओं के बाद एक वर्ग ने तुरंत यह निष्कर्ष निकालना शुरू कर दिया कि भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था बेटियों को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता नहीं देती, इसलिए वे अपराध जैसे रास्ते पर चली जाती हैं। यह निष्कर्ष न केवल जल्दबाजी है, बल्कि इन मामलों के उपलब्ध तथ्यों से भी मेल नहीं खाता। सिया, सोनम या मुस्कान के मामलों में अब तक ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया कि परिवार ने उन्हें अपनी बात कहने से रोका था, उन्हें बंधक बनाकर रखा था या उनकी इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए प्रताड़ित किया था। इसके विपरीत उपलब्ध जानकारी बताती है कि परिवार सामान्य विश्वास और आत्मीयता के साथ रिश्ते आगे बढ़ा रहे थे। यदि किसी का मन कहीं और था, तो उसके सामने विवाह से इनकार करने, संबंध समाप्त करने, घरवालों से खुलकर बात करने या कानूनन अपनी पसंद से विवाह करने जैसे अनेक विकल्प उपलब्ध थे। हत्या किसी भी परिस्थिति में विकल्प नहीं हो सकती।

यह भी ध्यान रखना होगा कि आज का भारतीय समाज पचास वर्ष पहले वाला समाज नहीं है। प्रेम विवाह, अंतरजातीय विवाह और स्वयं जीवनसाथी चुनने के उदाहरण निरंतर बढ़ रहे हैं। हजारों परिवार मतभेदों के बाद भी अंततः अपने बच्चों के निर्णय स्वीकार कर रहे हैं। इसलिए हर अपराध को पितृसत्ता का परिणाम बताना सामाजिक यथार्थ का सरलीकरण है। दरअसल, समस्या स्वतंत्रता की नहीं, उत्तरदायित्व की है। स्वतंत्रता जब नैतिकता और संवेदनशीलता से कट जाती है, तब वह विनाशकारी भी बन सकती है। इसलिए समाज को स्त्री-पुरुष के संघर्ष का नया विमर्श खड़ा करने की नहीं, बल्कि परिवारों में विश्वास और संवाद बढ़ाने की आवश्यकता है।

क्या कहता है कुटुंब प्रबोधन यहीं संघ का कुटुंब प्रबोधन महत्वपूर्ण हो जाता है। यह अभियान न तो बेटियों की स्वतंत्रता छीनने की बात करता है और न ही किसी पर नियंत्रण स्थापित करने की। इसका मूल आग्रह है कि परिवार साथ बैठे, साथ भोजन करे, साथ संवाद करे और एक-दूसरे के जीवन में वास्तविक रुचि ले। संघ ने जिन छह सूत्रों - भाषा, भूषा, भजन, भोजन, भ्रमण और भवन पर बल दिया है, उनका उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि परिवार को फिर से संवाद की जीवंत इकाई बनाना है। सप्ताह में एक दिन पूरा परिवार बिना मोबाइल और टीवी के साथ बैठे, यह सुनने में साधारण लगता है, लेकिन आज के समय में यही सबसे कठिन और सबसे आवश्यक अभ्यास है।

परिवार निगरानी का नहीं, विश्वास का केंद्र बने

आज परिवारों में साथ रहने का समय कम और साथ होते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय अधिक है। एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एक-दूसरे की दिनचर्या, मित्रों, मानसिक तनाव और भावनात्मक संघर्ष से अनजान होते जा रहे हैं।कुटुंब प्रबोधन का अर्थ निगरानी नहीं, सहभागिता है। इसका अर्थ संदेह नहीं, विश्वास है। इसका अर्थ नियंत्रण नहीं, संवाद है। जब परिवार में ऐसा वातावरण बनता है जहाँ बेटा या बेटी बिना भय के अपने मन की बात कह सके, अपने संबंधों, दुविधाओं और निर्णयों पर खुलकर चर्चा कर सके, तब अनेक संकट जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं। यदि किसी युवक या युवती को विवाह स्वीकार नहीं है, यदि उसका मन कहीं और जुड़ा है, यदि वह किसी दबाव में है, तो सबसे पहले यह बात उसके अपने परिवार तक पहुँचनी चाहिए। संवाद के अभाव में छिपे हुए संबंध कई बार अपराध का रूप ले लेते हैं। एक सच समय पर बोल दिया जाए तो अनेक जिंदगियां बच सकती हैं।

संस्कार बनाम नियंत्रण

संघ वर्षों से कहता आया है कि परिवार केवल

आर्थिक इकाई नहीं, संस्कार की पहली पाठशाला है। विद्यालय ज्ञान दे सकता है, कानून दंड दे सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा दायित्व परिवार का ही होता है। संस्कार का अर्थ नियंत्रण नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच विवेक विकसित करना है। आज बच्चों को करियर की शिक्षा भरपूर मिल रही है, लेकिन संबंधों की नैतिकता, असहमति का सभ्य समाधान, क्रोध पर नियंत्रण और जीवन के निर्णयों की जिम्मेदारी कौन सिखाएगा? इसका उत्तर केवल कानून नहीं दे सकता; इसका उत्तर परिवार ही दे सकता है। समाज के लिए एक आवश्यक विमर्श आज आवश्यकता किसी संगठन विशेष के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि उस मूल प्रश्न पर विचार करने की है जिसे वह उठा रहा है। क्या परिवारों में संवाद कम हुआ है? क्या डिजिटल जीवन ने भावनात्मक दूरी बढ़ाई है? क्या माता-पिता और बच्चों के बीच विश्वास का संकट बढ़ रहा है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' है, तो कुटुंब प्रबोधन जैसी पहल केवल एक वैचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन जाती है।

हर सामाजिक समस्या का समाधान अदालतों में नहीं मिलता। कुछ समाधान घर के भोजन-कक्ष में बैठकर होने वाली बातचीत में मिलते हैं। कुछ समाधान तब मिलते हैं जब माता-पिता केवल बच्चों की उपलब्धियाँ नहीं, उनके मन को भी समझने का प्रयास करते हैं। कुछ समाधान तब मिलते हैं जब परिवार साथ बैठकर असहमत भी होते हैं और फिर भी जुड़े रहते हैं।

केतन, राजा रघुवंशी, साहिल और ऐसे अनेक युवाओं की त्रासदी हमें केवल अपराध की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि समाज की सबसे बड़ी सुरक्षा व्यवस्था पुलिस नहीं, बल्कि संस्कारित, संवादशीलऔर आत्मीय परिवार हैं। शायद इसलिए आज कुटुंब प्रबोधन केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर सामाजिक आवश्यकता बन चुका है। यदि आने वाली पीढ़ियों को केवल सफल नहीं, बल्कि संवेदनशील, उत्तरदायी और चरित्रवान बनाना है, तो परिवारों को पुनः संवाद, विश्वास और संस्कार का केंद्र बनाना ही होगा। क्योंकि अंततः समाज वहीं सुरक्षित होता है, जहाँ परिवार सुरक्षित और सशक्त होते हैं।

कुटुंब प्रबोधन का अर्थ निगरानी नहीं, सहभागिता है। इसका अर्थ संदेह नहीं, विश्वास है। इसका अर्थ नियंत्रण नहीं, संवाद है। जब परिवार में ऐसा वातावरण बनता है जहाँ बेटा या बेटी बिना भय के अपने मन की बात कह सके, अपने संबंधों, दुविधाओं और निर्णयों पर खुलकर चर्चा कर सके, तब अनेक संकट जन्म लेने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं। यदि किसी युवक या युवती को विवाह स्वीकार नहीं है, यदि उसका मन कहीं और जुड़ा है, यदि वह किसी दबाव में है, तो सबसे पहले यह बात उसके अपने परिवार तक पहुँचनी चाहिए।


 

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