इंदौर। आपातकाल लागू होते ही मधुकरराव चितले पुलिस की प्राथमिक सूची में शामिल हो गए। उस समय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रकाशचंद्र सेठी अधिक से अधिक विरोधियों को गिरफ्तार करवाने में जुटे थे। संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेशजी सोनी की गिरफ्तारी के बाद चितलेजी को भी उनका सहयोगी बताते हुए हिरासत में लेने की तैयारी शुरू हो गई।
8 जुलाई 1975 को पुलिस ने उनके जवाहर मार्ग स्थित कार्यालय पर फोन किया। दूसरी ओर से चितलेजी ने बेहद शांत स्वर में कहा, 'आप यहां आने का कष्ट मत कीजिए, मैं स्वयं आ जाता हूं।' कुछ ही देर बाद वे स्वयं पुलिस के सामने उपस्थित हो गए। पहले जिला जेल और फिर केंद्रीय जेल भेजे गए। बाद में उनकी संगठन क्षमता और रणनीतिक सोच को देखते हुए उन्हें जावरा जेल स्थानांतरित कर दिया गया। पूरे 21 महीने उन्होंने न पैरोल मांगी, न किसी प्रकार का माफीनामा स्वीकार किया। मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने पर ही वे जेल से बाहर आए।
जेल पहुंचने के बाद भी उन्होंने स्वयं को बंदी नहीं, बल्कि दायित्व निभाने वाला कार्यकर्ता माना। नए आने वाले प्रत्येक मीसा बंदी को जेल के नियम, अधिकार और व्यवस्था समझाने का काम वे ही करते थे। उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति, व्यवस्थित कार्यशैली और समस्याओं का त्वरित समाधान खोजने की क्षमता के कारण साथी मीसा बंदी उन्हें चलता-फिरता ज्ञानकोष मानते थे।
जेल मैन्युअल की अच्छी जानकारी थी
1948 में भी जेल का अनुभव होने के कारण उन्हें जेल मैन्युअल की अच्छी जानकारी थी। उन्होंने उसके आधार पर मीसा बदियों को अनेक सुविधाएं दिलाईं। उनके प्रयासों से शाकाहारी बंदियों को अंडों के स्थान पर दूध मिलने की व्यवस्था लागू हुई। जेल प्रशासन से अधिकारपूर्वक, लेकिन तार्किक ढंग से अपनी बात मनवाने की उनकी क्षमता सभी को प्रभावित करती थी। र्तयंबकराव कुलकर्णी, माणिकचंद्र वाजपेयी 'मामाजी', भालचंद्रजी देशमुख और गोरेलालजी परमार जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उन्होंने जेल के भीतर अनुशासित दिनचर्या तैयार की। सुबह योग, श्रीमदभगवगीता का पारायण, अध्ययन, बौद्धिक चर्चा और संगठनात्मक प्रशिक्षण नियमित चलता था। एक अध्याय कंठस्थ होने पर ही दूसरा अध्याय शुरू किया जाता। पूरा वातावरण ऐसा बन गया था कि अनेक मीसा बंदी कहा करते थे, 'ऐसा लगता है जैसे हम जेल में नहीं, किसी प्रशिक्षण वर्ग में आए हैं।'
कठिन जिम्मेदारी के निर्वहन में मधुकरराव चितले की केंद्रीय भूमिका रही
आपातकाल के दौरान 'स्वदेश' समाचार पत्र पर भी बड़ा संकट आया। उसके संपादक, प्रकाशक, व्यवस्थापक, अध्यक्ष और न्यासी तक गिरफ्तार कर लिए गए। सामान्य परिस्थितियों में किसी भी समाचार पत्र का प्रकाशन बंद हो जाता, लेकिन जेल में बंद इन कार्यकर्ताओं ने तय किया कि 'स्वदेश' यथासंभव प्रकाशित होता रहना चाहिए। इस कठिन जिम्मेदारी के निर्वहन में मधुकरराव चितले की केंद्रीय भूमिका रहीं। जेल में रहते हुए भी उन्होंने रहते हुए समाचार पत्र को जीवित रखने की रणनीति बनाने और समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। यह लोकतंत्र और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का दुर्लभ उदाहरण था।
जेल की सजा केवल उन्होंने ही नहीं, उनके परिवार ने भी भुगती। पत्नी प्रमिला चितले 'आई', मेडिकल की छात्रा बेटी डॉ. विद्या वितले (गोखले) और जीएसआईटीएस में इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष के छात्र पुत्र सच्चिदानंद चितले ने कठिन परिस्थितियों में घर और कार्यालय दोनों संभाले। परिवार चलाने के लिए 'आई' को नौकरी करनी पड़ी, जबकि सच्चिदानंद ने अपनी पढ़ाई के साथ कार्यालय की जिम्मेदारी भी निभाई। पहली बार जब पुलिस घर पहुंची तो बेटी कंबल ओढ़कर सो रही थी।
घर की तलाशी ली गई और कोई सुराग न मिलने पर बेटे को कई घंटे थाने में बैठाकर रखा गया। बाद में कार्यालय का फोन नंबर मिलने पर पुलिस ने संपर्क किया और चितलेजी ने वही जवाब दिया जिसने उनके व्यक्तित्व की पहचान बना दी, 'आप मत आइए, मैं स्वयं आ जाता हूं।'
संघ की शाखाओं के विस्तार में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
मूल रूप से वर्धा निवासी मधुकरराव चितले केमिकल इंजीनियर थे। नागपुर से शिक्षा पूरी करने के बाद वे एक विवाह समारोह में इंदौर आए और यहीं बस गए। नगर निगम के जल यंत्रालय में अभियंता रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नंदानगर, पाटनीपुरा, परदेशीपुरा और स्नेहलतागंज सहित अनेक क्षेत्रों में नई शाखाएं प्रारंभ हुई। बाद में उन्होंने वनवासी कल्याण परिषद के कार्य को भी नई गति दी और उसकी मुख पत्रिका 'वनपुत्र' के प्रकाशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक बार आपातकाल की चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, 'जेल जाना बुरा नहीं रहा। इससे परिवार ने कठिन परिस्थितियों में जीना सीख लिया।' यही उनका जीवन दर्शन था। स्वभाव से वे अत्यंत मधुर थे, लेकिन दायित्वों के निर्वहन में कभी समझौता नहीं करते थे। 3 सितंबर 2016 को उनका निधन हो गया, लेकिन त्याग, अनुशासन, संगठन क्षमता और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा की उनकी विरासत आज भी हजारों स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देती है। उनकी जीवन यात्रा बताती है कि कालकोठरी में भी यदि संकल्प जीवित हो, तो लोकतंत्र की मशाल बुझती नहीं और अंधेरे के बीच भी प्रकाश फैलाती रहती है।
आपातकाल के दौरान अधिकांश लोग गिरफ्तारी से बचने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसने पुलिस से कहा, 'आप यहां मत आइए, मैं स्वयं आ जाता हूं।' यह व्यक्ति थे वरिष्ठ स्वयंसेवक, अभियंता, वनवासी कल्याण परिषद के प्रमुख कार्यकर्ता और 'स्वदेश' के संचालक रहे मधुकरराव चितले। उन्होंने पूरे 21 महीने मीसा के तहत जेल में बिताए, न कभी पैरोल मांगी और न माफीनामा लिखकर दिया। जेल की कालकोठरी को उन्होंने अनुशासन, अध्ययन और संगठन का केंद्र बना दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मधुर स्वभाव और कठोर कर्तव्यनिष्ठा साथ-साथ कैसे चल सकती है।