माणिकचंद्रजी वाजपेयी, जिन्हें हम सभी 'मामाजी' कहकर पुकारते थे, अत्यंत सहज, सरल व सामान्य से दिखने वाले पत्रकार थे। वे स्वदेश, जो मालवा क्षेत्र का लोकप्रिय समाचार-पत्र था, के प्रधान संपादक थे। उनकी धारदार लेखनी के सभी कायल थे।
प्रथम दृष्टया एक झबरीली मूंछों वाले, बालों में कभी कंघी की तो ठीक, नहीं की तो भी ठीक। एक धोती की ऊंची-ऊंची लांग और कुर्ता पहने अपने रामबाग स्थित निवास से स्वदेश कार्यालय पैदल जाते दिखाई देते थे। उन्हें देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ये एक लोकप्रिय समाचार-पत्र के प्रधान संपादक हो सकते हैं। सचमुच में मुझे तो कहानीकार प्रेमचंदजी के उपन्यास के कोई पात्र जैसे दिखाई देते थे। सहजता व सरलता की पराकाष्ठा।
इंदौर नगर में किसी कार्यक्रम में जाना हो तो उनका वाहन साइकिल होती थी। अनेक बार तो जनसामान्य उनकी इस वेशभूषा तथा साइकिल सवारी के कारण पहचान नहीं पाते थे। एक बार ऐसा हुआ भी। जाल सभागृह में एक कार्यक्रम में वे प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। वे अपनी पुरानी साइकिल पर समय से 5-10 मिनट पूर्व पहुंचकर हॉल में जाकर बैठ गए। आयोजकगण निश्चित समय से 15-20 मिनट पश्चात पहुंचकर बाहर प्रतीक्षा करते रहे। कुछ समय पश्चात उनमें से एक ने उन्हें अंदर बैठे देखा तो हतप्रभ रह गए।
उनकी बातचीत व व्यवहार में कोई बनावट नहीं होती थी। सीधी-सपाट तरीके से अपनी बात कह देते थे, परंतु जब लिखते थे तो उनकी लेखनी गजब ढा देती थी। श्री मामाजी से मेरा परिचय तब से रहा, जब से वे स्वदेश में आए थे। मेरे बड़े भाईसाहब उन दिनों शाजापुर जिला कार्यवाह थे और साथ-साथ स्वदेश के जिला प्रतिनिधि भी थे। इस कारण मामाजी का अनेक बार हमारे निवास ग्राम झोंकर में आना-जाना बना रहता था। वास्तव में उन दिनों स्वदेश की आर्थिक स्थिति कोई बड़ी अच्छी नहीं थी। इस कारण श्री छोटेलालजी नागर व श्री मधुकररावजी चितले सतत भ्रमण कर प्रबंध में जुटे रहते थे और कुछेक स्थानों पर श्री मामाजी जाया करते थे।
उन स्थानों पर वे स्वदेश के ग्राहकों के साथ चर्चा करते थे और नए सदस्य व अभिकर्ता बनाने हेतु प्रयास चलता रहता था। मामाजी हमारे ग्रामीण क्षेत्र में बड़ी जल्दी घुल-मिल जाते थे। किसानों के साथ उनके घर चाय हेतु चले जाते थे और उनके परिवारों से मेलजोल स्थापित कर लेते थे। मेरे पूज्य पिताजी उनसे बड़े प्रभावित थे। वे स्वयं पगड़ी-धोती पहनते थे, अतः मामाजी उन्हें अपने जैसे लगते थे। पिताजी अनेक बार पूछ बैठते थे- 'अरे! अपने स्वदेश वाले मामाजी बहुत दिनों से नहीं आए।' फिर स्वयं ही कह उठते थे, 'अरे भाई, उनके पास भी तो बहुत काम है।'
सन् 1973 में मैं भी इंदौर रहने आ गया। मामाजी संघ की गतिविधियों में सदा जुटे रहते थे और मुझे भी प्रारंभ में मल्हारगंज के मंडल कार्यवाह का दायित्व दिया गया। साथ ही स्वदेश में नई रोटरी मशीन लगाने हेतु भवन निर्माण का कार्य भी। इस कारण मामाजी से भेंट होती रहती थी।आपातकाल लगने पर दिनांक 13 अगस्त 1975 को इंदौर से हम 26 कार्यकर्ता एक साथ गिरफ्तार होकर सेंट्रल जेल में निरुद्ध किए गए। हमारे साथ मामाजी भी थे। यहां जेल में कुछ विद्यार्थी कार्यकर्ता खूब उधम मचाते थे और कभी-कभी चक्कर पर जाकर जेल अधिकारी से तू-तू, मैं-मैं कर आते थे। मामाजी ने उन्हें डांट लगाई कि हम संघ के स्वयंसेवक हैं, यह सब हमारे लिए उचित नहीं है। हमारी लड़ाई सत्ता से है, उनसे नहीं। इन्हें अपना काम करने दें। बात भी सही थी, परंतु युवा लोगों को इसका भान नहीं था।
इसी प्रकार हमारी सेवा में नियुक्त कैदी बंधुओं से भी कई बार खटपट कर बैठते थे। मामाजी ने बड़ी सख्ती से रोका और समझाया कि ये सभी बेचारे मुसीबत के मारे यहां जेल में बंद हैं और आप सभी का सहयोग करने हेतु इन्हें नियुक्त किया गया है, अतः इनके साथ हमें सभ्यता से व्यवहार करना चाहिए।श्री मामाजी का इस जेल में हमने एक अलग ही रूप देखा। वे सेंट्रल जेल में लगभग दो महीने तक हमारे साथ रहे। पश्चात उनका जिला जेल, इंदौर में स्थानांतरण हो गया था। इन दो माहों में वे हमारी बैरक में केवल प्रार्थना, भोजन व शयन हेतु ही दिखाई देते थे। उनका बाकी समय इस दोषसिद्ध जेल में बंद ग्रामीण क्षेत्र के कैदियों के साथ व्यतीत होता था। वे जाकर उन्हें पढ़ाते थे तथा श्रेष्ठ संस्कारों से दीक्षित करने में लगे रहते थे। हमने उन्हें न तो दोपहर में हमारे साथ विश्राम करते देखा और न ही अन्य कोई कार्य करते।
संध्याकाल में वे उनकी बैरकों में स्थित मंदिरों में पूजा-आरती आदि में सम्मिलित होकर उनके साथ एकाकार हो जाते थे, जबकि हम यदाकदा ही उनकी आरती में सम्मिलित हो पाते थे। जेल में मामाजी के व्यवहार से सभी अधिकारीगण प्रसन्न रहते थे। वे स्वयं जेल के नियमों का कड़ाई से पालन करते थे और हम सबको पालन करने हेतु प्रेरित करते थे। जेल अधिकारी उनका बड़ा आदर करते थे, परंतु उन्होंने इन संबंधों का कभी भी गलत उपयोग नहीं किया।
मामाजी के जिला जेल में स्थानांतरण के कुछ समय पश्चात उनकी धर्मपरायणा सहधर्मिणी का देहावसान हो गया। उनकी अंतिम क्रिया हेतु इंदौर के पत्रकारों व कार्यकर्ताओं ने जिला कलेक्टर से आग्रह कर उन्हें पैरोल दिलवाने का भरसक प्रयत्न किया। इस कारण उन्हें केवल चार घंटे हेतु पुलिस कस्टडी में श्मशान ले जाकर अंतिम संस्कार हेतु पैरोल दिया गया। पुनः चार घंटे में उन्हें वापस जिला जेल में लाकर बंद कर दिया गया। आपातकाल में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का मामाजी ने अपने सहलेखक श्री प्र.ग. सहस्त्रबुद्धेजी के साथ 'आपातकालीन संघर्षगाथा' में उल्लेख किया है, परंतु इस घटना का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है।
वास्तव में यह एक सत्य घटना थी, जिसका यदि उल्लेख किया जाता तो कोई अनुचित बात नहीं होती, परंतु मामाजी कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे। उनके जीवन में आत्मश्लाघा अथवा अपने साथ बीते कष्टों का कोई वर्णन उन्हें जरा भी नहीं सुहाता था। इसी कारण लगभग साढ़े छह सौ पृष्ठों की उस पुस्तक में उन्होंने अपने जीवन की इतनी महत्वपूर्ण घटना का रंचमात्र भी उल्लेख नहीं किया।वास्तव में मामाजी एक तपस्वी थे, जिनकी आंखों में डॉक्टर हेडगेवारजी के स्वप्नों को साकार करने की तीव्र ललक थी। उनका अपना व्यक्तिगत जीवन अति सामान्य था, जिसमें कोई तड़क-भड़क नहीं, कोई अहंभाव नहीं और न ही कोई दिखावा। वे एक सद्गृहस्थ होकर भी प्रचारक का जीवन जीए। संपादन कार्य अति रात्रि तक चलता था, पश्चात घर आकर पुनः प्रभात शाखा में उपस्थित रहना, उनका जीवनक्रम था। वे सचमुच में एक अद्भुत महामानव थे, जिनके हृदय में सतत दुखी, पीड़ित एवं शोषित मानव की आत्मा बसती थी। ऐसे महामानव की जयंती पर उन्हें कोटिशः प्रणाम।

रमेश गुप्ता
(लेखक मीसाबंदी व जाने-माने इंजीनियर हैं।)