मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। बेशक, तीन बार वह अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 2007 में बसपा को अकेले दम मिले बहुमत ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। जिस बसपा की छवि दलित पार्टी से भी ज्यादा सवर्ण-विरोधी बन गई थी, उसी ने मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत उत्तर प्रदेश के सारे परंपरागत सामाजिक-राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर दिए। लगभग दो दशक तक देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीति दो क्षेत्रीय दलों—समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी—के बीच ही बंटी रही, जबकि दोनों राष्ट्रीय दल हाशिये के दर्शक बनकर रह गए। मुलायम सिंह यादव के बाद भी उनके बेटे अखिलेश यादव सपा को मुख्य विपक्षी दल के रूप में बचाए हुए हैं, लेकिन मायावती की बसपा अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
बहुजन समाज पार्टी, सुप्रीमो मायावती की अस्थिर राजनीति की ही बंधक बनी नजर आ रही है। लगभग सवा दो साल में तीन बार भतीजे आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाने का संकेत देकर पलट जाने के बाद अब मायावती ने उन्हें बसपा से पूरी तरह 'फ्री' कर दिया है। दूसरे भतीजे ईशान आनंद से तो बुआ का विश्वास और जल्दी डगमगा गया। पहले 'अपरिपक्व' और फिर श्वसुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव में बताकर आकाश को 'फ्री' करते हुए चंद दिन पहले ही ईशान पर भरोसा जताया गया था, लेकिन अब मायावती की उम्मीदें भतीजी दीपिका आनंद पर टिक गई हैं। आकाश और ईशान की राह पर चलते हुए दीपिका भी लंदन में कानून की पढ़ाई कर रही हैं।
अपने स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों का खंडन करते हुए 70 वर्षीय मायावती ने जो कुछ कहा, उसका अर्थ यही है कि भाई आनंद की मदद से वह खुद बसपा की कमान संभालेंगी। दीपिका के विदेश से वापस आने पर उन्हें पार्टी में जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। मायावती ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की कमान अपने पास रखते हुए शेष राज्यों को दो सेक्टरों में बांटकर उपाध्यक्ष भाई आनंद को सौंप दिया है, जो हर डेढ़ महीने में इनकी समीक्षा कर उन्हें रिपोर्ट देंगे।लगभग तीन दशक तक उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित करने वाली बसपा में यह राजनीतिक अस्थिरता चौंकाने वाली है। बेशक, जिस सामाजिक-राजनीतिक सपने के साथ कांशीराम ने बसपा बनाई, उसे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ता के शीर्ष तक उनकी उत्तराधिकारी मायावती ने ही पहुंचाया।
मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। बेशक, तीन बार वह अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 2007 में बसपा को अकेले दम मिले बहुमत ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। जिस बसपा की छवि दलित पार्टी से भी ज्यादा सवर्ण-विरोधी बन गई थी, उसी ने मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत उत्तर प्रदेश के सारे परंपरागत सामाजिक-राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर दिए। लगभग दो दशक तक देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीति दो क्षेत्रीय दलों—समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी—के बीच ही बंटी रही, जबकि दोनों राष्ट्रीय दल हाशिये के दर्शक बनकर रह गए। मुलायम सिंह यादव के बाद भी उनके बेटे अखिलेश यादव सपा को मुख्य विपक्षी दल के रूप में बचाए हुए हैं, लेकिन मायावती की बसपा अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
कभी जिस बसपा के 21 लोकसभा सदस्य होते थे, उसका 2024 के चुनाव में खाता तक नहीं खुल पाया। 2007 में 206 सीटों के साथ अकेले दम बहुमत हासिल कर लेने वाली बसपा 2022 के विधानसभा चुनाव में बमुश्किल एक सीट जीत पाई और उसका मत प्रतिशत गिरकर 10 से भी नीचे चला गया। जो बसपा कभी अपनी उपस्थिति पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक दर्ज कराने में सफल रही, उसकी ऐसी विडंबना चौंकाने वाली तो है ही, कई बड़े सवाल भी खड़े करती है।जैसा कि शुरू में ही लिखा गया है, अपने संस्थापक कांशीराम के गृह राज्य पंजाब में, देश में सर्वाधिक 32 प्रतिशत दलित आबादी के बावजूद, कभी बड़ी राजनीतिक ताकत न बन पाने वाली बसपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का श्रेय मायावती को जाता है। कांशीराम ने 15 दिसंबर, 2001 को मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था। कांशीराम के जीवनकाल में ही 18 सितंबर, 2003 को मायावती ने बसपा की कमान पूरी तरह संभाल भी ली थी।
बेशक, उत्तर प्रदेश की सत्ता में बसपा को पहली हिस्सेदारी 1993 में ही समाजवादी पार्टी के साथ मिल गई थी, जिसका कटु अंत चर्चित स्टेट गेस्ट हाउस कांड के साथ हुआ। दोनों ही ओर से आरोप-प्रत्यारोप का लंबा दौर चला, लेकिन यह भी सच है कि अपने बूते उत्तर प्रदेश की सत्ता तक बसपा मायावती के नेतृत्वकाल में ही पहुंची।अगर 2007 की ऐतिहासिक सफलता का श्रेय मायावती को जाता है, तो 2014 के बाद शुरू हुए उसके पराभव की जिम्मेदारी भी उन्हीं की बनती है। कांग्रेस तो केंद्र में सत्तारूढ़ रहते हुए ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पहुंच चुकी थी। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की हैसियत भी वहां चौथे नंबर की पार्टी थी।
बेशक, उत्तर प्रदेश में भाजपा के कायाकल्प की मदद से भाजपा को लोकसभा में अपने बूते बहुमत दिलवाने में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की छवि और पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह की चुनावी रणनीति की निर्णायक भूमिका रही, लेकिन बसपा का शून्य पर सिमट जाना चौंकाने वाला था।मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवनकाल में ही, 2012 में सपा को बहुमत मिलने पर, बेटे अखिलेश यादव की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी करवा दी थी। जाहिर है, 2014 से शुरू हुई भाजपा की लहर में अखिलेश सरकार भी 2017 में चली गई और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार पदारूढ़ हो गई।
शायद भाजपा के इस अप्रत्याशित उभार ने ही दो दशक से भी ज्यादा समय बाद सपा-बसपा जैसे कटु प्रतिद्वंद्वियों को 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए मजबूर कर दिया। बेशक, गठबंधन बड़ा उलटफेर नहीं कर पाया, लेकिन परिवर्तित राजनीतिक परिदृश्य में 15 सीटें जीत जाना बुरा प्रदर्शन हरगिज नहीं था। पिछले चुनाव में खाता भी न खोल पाने वाली बसपा को तो 10 सीटें जीतने पर खुश होना चाहिए था, लेकिन मायावती ने सपा का वोट अपने उम्मीदवारों को ट्रांसफर न होने का आरोप लगाते हुए चुनाव परिणाम आते ही गठबंधन तोड़ दिया।
उसके बाद 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में मायावती की चुनावी रणनीति और उम्मीदवारों के चयन से बसपा पर भाजपा की 'बी' टीम की तरह राजनीति करने के आरोप और भी मजबूती से चस्पां होते गए हैं।कुछ दिनों से मायावती 2007 की तर्ज पर फिर से सोशल इंजीनियरिंग की चुनावी राजनीति के संकेत दे रही थीं, लेकिन बसपा में हाल के घटनाक्रम से तो दिशाहीनता की तस्वीर ही उभरती है। स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या न हो तो भी 70 की उम्र में मायावती के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में सघन चुनाव प्रचार अभियान आसान नहीं होगा।ऐसा नहीं कि बसपा में कभी दूसरी पंक्ति के नेता उभरे नहीं। स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा जैसे नेता उभरे तो सही, पर मायावती की अस्थिर राजनीति के चलते टिक नहीं पाए।
कुछ समय से आकाश आनंद को मायावती के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अंततः उन्हें बसपा से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मायावती की दलित राजनीति को चुनौती देने वाले नगीना के निर्दलीय सांसद चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी से लेकर सपा और कांग्रेस भी आकाश आनंद पर डोरे डाल रही हैं, लेकिन पार्टी और परिवार के जटिल रिश्ते के मद्देनजर उनके लिए वैसा फैसला आसान नहीं होगा।उसके बावजूद बसपा की राजनीतिक राह बेहद चुनौतीपूर्ण ही नजर आती है और उसके लिए उसकी सुप्रीमो मायावती ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।

राजकुमार सिंह
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)