खाद्य पदार्थों में मिलावट केवल उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सीधे जनस्वास्थ्य और मानव जीवन पर हमला है। जिस भोजन को मनुष्य अपने जीवन और स्वास्थ्य का आधार मानकर ग्रहण करता है, उसमें जानबूझकर हानिकारक या घटिया पदार्थ मिलाकर मुनाफा कमाना सामान्य कारोबारी अपराध नहीं माना जा सकता। यह सामाजिक विश्वास के साथ गंभीर आपराधिक विश्वासघात है। इसलिए मिलावटखोरी के विरुद्ध कानून जितना कठोर हो, उसका क्रियान्वयन उससे भी अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध होना चाहिए।
हाल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खाद्य पदार्थों की शुद्धता से किसी भी स्तर पर समझौता न करने का स्पष्ट संदेश दिया है। मानव अपशिष्ट, अखाद्य अथवा गंदी वस्तुओं की मिलावट रोकने और दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रस्ताव इसी गंभीरता को दर्शाता है। ऐसे अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाने की पहल महत्वपूर्ण है, लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या कानून का भय वास्तव में मिलावटखोरों तक पहुंच रहा है?
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि मिलावटखोर इतने बेखौफ क्यों हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें विश्वास रहता है कि पकड़े जाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया वर्षों तक चल सकती है। नमूना जांच, प्रयोगशाला रिपोर्ट, मुकदमा और अदालत की लंबी प्रक्रिया कठोर कानून के निवारक प्रभाव को कमजोर कर देती है। सजा में जितनी देरी होती है, कानून का डर उतना ही कम होता जाता है।
बेंगलुरु जैसे अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले शहर में खाद्य सुरक्षा जांच के दौरान कई होटल और रेस्तरां में बासी तथा निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री मिलने की घटनाएं बताती हैं कि समस्या केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित नहीं है। यदि प्रतिष्ठित संस्थानों में भी उपभोक्ता की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है, तो छोटे होटल, ढाबों और फुटपाथी दुकानों की निगरानी पर गंभीरता से विचार करना होगा।
यह किसी एक शहर की समस्या नहीं है। देशभर में नकली घी, खाद्य तेल, पनीर, खोया, मसाले और अन्य खाद्य पदार्थों की मिलावट के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि मिलावटखोरी अब संगठित कारोबार का रूप ले चुकी है। त्योहारों से पहले छापेमारी और बाद में शिथिलता की परंपरा से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 पहले से लागू है। असुरक्षित खाद्य पदार्थों के मामलों में कठोर दंड और मृत्यु जैसे गंभीर परिणामों पर आजीवन कारावास तक का प्रावधान भी मौजूद है। फिर भी यदि मिलावटखोरों में कानून का भय नहीं है, तो समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी अमल की है।
गंभीर मिलावट के मामलों के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था और समयबद्ध सुनवाई आवश्यक है। नमूना जांच से लेकर अभियोजन तक प्रत्येक चरण की समयसीमा तय हो। दोष सिद्ध होने पर लाइसेंस रद्द करने, कारोबार बंद कराने और आर्थिक दंड लगाने की कार्रवाई प्रभावी हो। बार-बार अपराध करने वालों के लिए दंड कई गुना कठोर होना चाहिए। यदि मिलावटी खाद्य पदार्थ से किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी, स्थायी क्षति अथवा मृत्यु होती है, तो ऐसे मामलों में कम-से-कम आजीवन कारावास जैसी कठोरतम सजा सुनिश्चित होनी चाहिए।
बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों में केवल कंपनी पर जुर्माना लगाकर जिम्मेदारी समाप्त नहीं होनी चाहिए। जिन निदेशकों, संचालकों अथवा जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी, सहमति या लापरवाही से मिलावटी खाद्य बाजार में पहुंचा, उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। अपराध से अर्जित लाभ जब्त करने और पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने की व्यवस्था भी आवश्यक है।
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। नमूना कब लिया गया, किस अधिकारी ने लिया, किस प्रयोगशाला में भेजा गया, रिपोर्ट कब आई और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई—इन सभी चरणों का डिजिटल रिकॉर्ड सार्वजनिक निगरानी के दायरे में होना चाहिए। अधिकारियों की मिलीभगत या जानबूझकर की गई लापरवाही को भी गंभीर अपराध माना जाए।
अब समय है कि खाद्य सुरक्षा को केवल छापेमारी और त्योहार-विशेष अभियानों तक सीमित न रखा जाए। जोखिम आधारित निरंतर निरीक्षण, आधुनिक प्रयोगशालाएं, पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारी और उपभोक्ताओं के लिए सरल शिकायत व्यवस्था अनिवार्य हो। नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने के साथ उसकी जांच की स्थिति जानने का अधिकार भी मिलना चाहिए।
अंततः मिलावटखोरी को सामान्य कारोबारी अनियमितता मानने की मानसिकता बदलनी होगी। भोजन में मिलावट करके मुनाफा कमाना किसी व्यक्ति के जीवन और स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। इसलिए सरकार, प्रशासन, न्यायपालिका, स्थानीय निकाय, खाद्य कारोबारी और उपभोक्ता सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। मिलावटखोर को यह विश्वास होना चाहिए कि पकड़े जाने पर बच निकलना आसान नहीं होगा, लाइसेंस और कारोबार खोना पड़ेगा, आर्थिक दंड भुगतना होगा और गंभीर मामलों में शीघ्र कठोर सजा मिलेगी। यही वास्तविक निवारण है।

प्रो. डॉ. राकेश शर्मा
(लेखक स्वदेश के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख हैं।)