इस साल फरवरी में जब मेरी किताब 'रिवालूशनरी राज-नरेंद्र मोदी रूल ऑफ 25 इयर्स' प्रकाशित हुई, तो कुछ कार्यक्रमों में मुझसे इस क्रांतिकारी राज में विश्व राजनीति में भारत को मोदी के कार्यकाल में मिली किसी बड़ी उपलब्धि को लेकर सवाल हुए। मैंने उन्हें 1971 से अब तक की अपनी पत्रकारिता और तथ्यों के आधार पर उत्तर दिए। इसमें सबसे बड़ा तर्क यही है कि इंदिरा गांधी से मनमोहन सिंह के राज तक संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत को 'गुटनिरपेक्षता' का ठप्पा लगाकर पेश किया जाता था। 1983 के प्रारंभ में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन के कवरेज के समय ही मुझे लगा था कि यह ठप्पा वास्तव में अमेरिका और चीन से नाराज अथवा सोवियत रूस समर्थक देशों का समूह बन गया है।
इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के साथ ऐसी निर्गुट नीति अपनाई, जिसमें रूस, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, अफ्रीका, मध्य पूर्व, पश्चिम और पूर्वी एशिया तथा यूरोप के देशों के शीर्ष नेताओं से सीधे कूटनीतिक और कुछ हद तक अपनत्व वाले संबंध बनाने की कोशिश की गई। इसका मूल मंत्र रहा सबसे संबंध, किसी से गुलामी नहीं।
ताजा प्रमाण ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की भूमिका और विभिन्न देशों की सक्रिय भागीदारी में दिखाई देता है। भारत ने 2016 में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी की थी और अब 2026 में इसकी अध्यक्षता की है। सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन जैसे नेताओं के साथ भारत का संवाद मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दुनिया की लगभग आधी आबादी और अर्थव्यवस्था का करीब 40 प्रतिशत इस समूह से जुड़ा है।
ब्रिक्स सम्मेलन की बड़ी उपलब्धियों में घोषणा-पत्र में पाकिस्तान द्वारा अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर में किए गए आतंकी हमले की भर्त्सना और आतंकवाद तथा आतंकियों की फंडिंग के विरुद्ध मिलकर लड़ने का संकल्प महत्वपूर्ण है। मोदी के लिए ब्रिक्स का महत्व केवल किसी एक घोषणा तक सीमित नहीं है। इसमें ग्लोबल साउथ की अवधारणा, पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले संगठनों में सुधार, वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, विकास के वित्तीय प्रबंध और बहुध्रुवीय विश्व की दिशा शामिल है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के सफल 25 वर्षों के सत्ता-काल का उत्सव मनाने जा रही है।ध्यान देने की बात यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय समझ 2014 के बाद अचानक पैदा नहीं हुई। वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और बाद में भाजपा संगठन में आए। 1978 में वे संघ के क्षेत्रीय स्तर के प्रचारक बने और 1979 में दिल्ली में संघ के काम से जुड़े। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बढ़ी। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा और 1991-92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस दौर में उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों को संगठन की दृष्टि से समझा और बाद में विदेशों में भारतीय समुदाय से संपर्क का अनुभव भी प्राप्त किया।
उस समय वे न मुख्यमंत्री थे, न सांसद और न केंद्र सरकार में कोई पद था। वे भाजपा-संघ संगठन से जुड़े नेता थे। उनका पहला प्रशिक्षण दौरा अमेरिकन काउंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स संस्था के निमंत्रण पर हुआ था। इस दौरान उन्हें अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था, नेतृत्व, चुनावी राजनीति और संस्थागत कामकाज को देखने तथा नेताओं और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर मिला।दिलचस्प बात यह है कि उस समय का अनुभव बाद के मोदी में दिखाई देता है विदेश जाकर केवल सरकारों से बात नहीं करना, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था, कारोबारी समुदाय और प्रवासी भारतीयों को भी समझना। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विदेश नीति का पहला प्रयोग शुरू किया।
2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उनकी विशेषता थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री के पद को केवल प्रशासनिक पद नहीं माना। उन्होंने गुजरात को आर्थिक प्रगति वाले मॉडल प्रदेश के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। विदेशी निवेश, उद्योग, तकनीक, बुनियादी ढांचा, बंदरगाह, ऊर्जा, औषधि उद्योग, हीरा उद्योग, वाहन उद्योग और प्रवासी भारतीयों को निवेश से जोड़ना उनकी रणनीति के केंद्र में रहा। इसी सोच के साथ वाइब्रेंट गुजरात के अंतरराष्ट्रीय आयोजन शुरू हुए। इन आयोजनों को अहमदाबाद और गांधीनगर में जाकर मैंने स्वयं देखा है।
भारत में उनके विरोधियों और केंद्र में कांग्रेस की सरकार के कारण 2005 में अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी विदेश नीति को रोकने के बजाय एशिया की ओर अधिक ध्यान दिया। चीन, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, मलेशिया, थाईलैंड और अन्य एशियाई केंद्रों से आर्थिक संपर्क बढ़ाते रहे। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी रूस और चीन की तीन-तीन यात्राएं तथा इजरायल, स्विट्जरलैंड, युगांडा और केन्या जैसे देशों की यात्राएं भी इसी दृष्टि का हिस्सा थीं।
मुख्यमंत्री मोदी ने चीन को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं देखा। उन्होंने चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्र, बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों, लघु एवं मध्यम उद्योगों और शहरी विकास का अध्ययन किया। 2006, 2007 और 2011 में उनकी चीन यात्राओं का उल्लेख मिलता है। यानी संदेश स्पष्ट था जिस देश से प्रतिस्पर्धा करनी है, उससे भी सीखो।26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मोदी प्रधानमंत्री के रूप में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएं कर चुके हैं और 80 से अधिक देशों तक पहुंचे हैं।
मोदी की विदेश नीति को केवल अमेरिकी या रूसी झुकाव वाली नीति नहीं कहा जा सकता। वे एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, आसियान और अफ्रीका के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से संबंध नहीं तोड़े, लेकिन यूक्रेन के साथ भी संवाद रखा। पश्चिम एशिया में इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी संबंध जारी रहे। चीन के साथ सीमा विवाद गंभीर है, लेकिन ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर संवाद बना हुआ है।
अगर मोदी के प्रधानमंत्री काल की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता चुननी हो, तो 2023 में जी-20 की अध्यक्षता सबसे महत्वपूर्ण कही जा सकती है। नई दिल्ली में हुए जी-20 सम्मेलन के दौरान भारत ने अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दिल्ली घोषणा-पत्र पर सहमति बनाने में सफलता पाई। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे की घोषणा में भी भारत की भूमिका रही। यह इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण जी-20 के भीतर मतभेद बहुत गहरे थे। फिर भी भारत सर्वसम्मति से घोषणा जारी कराने में सफल रहा।
भारत ने पाकिस्तान के आतंकवाद के प्रश्न को भी लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, लेकिन मोदी को कई अवसरों पर जी-7 के विशेष सत्रों में आमंत्रित किया गया।क्वाड—अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के माध्यम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक भूमिका मजबूत हुई। सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग भी दोहराई गई। उनकी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा यह रहा है कि भारत केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने में भाग लेने वाली शक्ति बने।
इसी सोच के तहत संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद से संघर्ष, पर्यावरण संरक्षण, सौर ऊर्जा गठबंधन और योग जैसे मुद्दों को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया गया। इसलिए उन्हें पसंद करें या न करें, नरेंद्र मोदी के दौर में भारत की वैश्विक भूमिका का विस्तार हुआ है। और यह परिवर्तन स्पष्ट दिखता है। विश्व राजनीति में भारत अब दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय और दिशा तय करने वाली शक्तियों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
यही मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि है भारत को किसी एक शक्ति के खेमे में खड़ा किए बिना, अनेक शक्तियों के बीच अपनी स्वतंत्र जगह बनाना। उनके जन्मदिन और मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के 25 वर्षों के सत्ता-काल पर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं।

आलोक मेहता
(लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)