भारत का राजनीतिक इतिहास पढ़ना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझने के लिए उसका एक दूसरा इतिहास भी है विश्वविद्यालयों, मठों, पुस्तकालयों, यात्राओं, भाषाओं, लोक-स्मृतियों, कलाओं और उन सांस्कृतिक संपर्कों का इतिहास, जिनके माध्यम से एक भूगोल दूसरे भूगोल से जुड़ता रहा। यह विचारों की आवाजाही, भाषाओं के परस्पर संपर्क और ज्ञान के आदान-प्रदान का इतिहास है। नालंदा इसी व्यापक बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
नालंदा की विरासत को आधुनिक विश्वविद्यालय का सरल पूर्वरूप मानना पर्याप्त नहीं होगा। उसका महत्व इस बात में है कि वहाँ ज्ञान केवल सूचना नहीं था और शिक्षा केवल रोजगार की तैयारी नहीं थी। अध्ययन का संबंध तर्क, आत्मानुशासन, विमर्श और नए प्रश्नों से था। ज्ञान अर्जित करने का अर्थ ज्ञान पर प्रश्न करना भी था।'विश्वरंग' जैसे आयोजन इसीलिए नालंदा की ऐतिहासिक भूमि पर विशेष अर्थ रखते हैं। विश्वरंग की मूल अवधारणा विभिन्न भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं, संस्कृतियों और देशों के बीच संवाद स्थापित करने की है। जब यह आयोजन नालंदा में होता है, तो वह केवल किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का स्थान-परिवर्तन नहीं रह जाता। नालंदा की ऐतिहासिक स्मृति और विश्वरंग की समकालीन सांस्कृतिक दृष्टि एक-दूसरे से संवाद करने लगती हैं।
एक ओर वह भूमि है, जहाँ सदियों पहले दूर-दूर से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन और विमर्श के लिए आते थे; दूसरी ओर आज का विश्वरंग है, जो भारत के विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक क्षेत्रों से रचनाकारों, शिक्षाविदों और कलाकारों को एक मंच पर लाता है। इस अर्थ में नालंदा में विश्वरंग इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसकी समकालीन प्रतिध्वनि है।
नालंदा: स्मृति से अधिक एक विचार:नालंदा का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह अतीत का प्रसिद्ध शिक्षाकेंद्र था। उसका वास्तविक महत्व उसकी उस ज्ञान-दृष्टि में है, जिसमें शिक्षा तर्क, विमर्श और बहस से जुड़ी थी। यूनेस्को के अनुसार, नालंदा महाविहार का पुरातात्विक परिसर तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी तक के अवशेषों को समेटे हुए है और पाँचवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच यह एक महत्वपूर्ण मठीय एवं शैक्षिक संस्थान के रूप में विकसित हुआ। बौद्धिक प्रभाव भारत से बाहर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचा।आज जब शिक्षा के सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी परिवर्तन, रोजगार, कौशल, पर्यावरण और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियाँ हैं, तब नालंदा की स्मृति हमें यह पूछने का अवसर देती है कि हमारी वर्तमान ज्ञान-संस्थाएँ कितनी खुली, बहुविषयक और संवादशील हैं।
भारतीय भाषाएँ : विविधता से संवाद तक भारत की भाषाई विविधता केवल अलग-अलग समुदायों की पहचान नहीं है। प्रत्येक भाषा अपने भीतर किसी समाज की स्मृतियाँ, अनुभव, मिथक, लोकजीवन और संसार को देखने की विशिष्ट दृष्टि संजोए रहती है। इसलिए भारतीय भाषाओं का प्रश्न केवल संरक्षण का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध का प्रश्न भी है।
विश्वरंग में विभिन्न भारतीय भाषाओं के रचनाकारों को एक मंच पर लाने का उद्देश्य किसी एक भाषा को केंद्र बनाना नहीं, बल्कि भाषाओं के बीच बराबरी का संवाद स्थापित करना है। भारत की भाषाई एकता का अर्थ भाषाई समानता नहीं हो सकता। उसका अर्थ ऐसी बहुलता है, जिसमें अलग-अलग भाषाएँ अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए एक-दूसरे से संवाद कर सकें।
इस संवाद का प्रभावी माध्यम अनुवाद हो सकता है। अनुवाद केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में ले जाना नहीं, बल्कि एक समाज के अनुभवों और संवेदनाओं को दूसरे समाज तक पहुँचाना है। जब हिंदी का पाठक तमिल, बांग्ला, कोंकणी, पंजाबी, कश्मीरी, असमिया या मणिपुरी साहित्य से परिचित होता है, तब वह केवल साहित्य का विस्तार नहीं करता, बल्कि देश के दूसरे अनुभवों से भी जुड़ता है।
पूर्वोत्तर : भारत की सांस्कृतिक तस्वीर का विस्तार भारत की सांस्कृतिक कल्पना में पूर्वोत्तर को केवल भौगोलिक क्षेत्र के रूप में देखना उसके महत्व को सीमित करना है। यह अनेक भाषाओं, समुदायों, लोकपरंपराओं और साहित्यिक संस्कृतियों का विस्तृत संसार है। इसकी सांस्कृतिक स्मृतियों में दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ ऐतिहासिक संपर्कों के सूत्र भी दिखाई देते हैं।
विश्वरंग में पूर्वोत्तर की भाषाओं और साहित्य को स्थान देना इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे भारत की सांस्कृतिक संरचना को उसके वास्तविक विस्तार में देखने का अवसर मिलता है। यह किसी क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने का एकतरफा प्रयास नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य की परिभाषा को अधिक व्यापक बनाने की प्रक्रिया है।
कला और संस्कृति : संवाद के सृजनात्मक माध्यम संस्कृति साहित्य में जितनी दिखाई देती है, उतनी ही संगीत, रंगमंच, चित्रकला, सिनेमा और नृत्य में भी। कला उन अनुभवों को अभिव्यक्त करती है, जिन्हें शब्द हमेशा पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते। विश्वरंग की प्रकृति ही ऐसी है कि साहित्य को कला से अलग करके नहीं देखा जा सकता।भारतीय कला-परंपराओं की बहुलता बताती है कि संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं है। वह लगातार बदलती रहती है। शास्त्रीय और लोक, परंपरा और आधुनिकता, क्षेत्रीय और वैश्विक—इनके बीच निरंतर संवाद चलता रहता है। नालंदा में सांस्कृतिक आयोजन इसी जीवंत परंपरा को वर्तमान से जोड़ने का अवसर देता है।
टैगोर से एशिया तक: नालंदा से पटना और वहाँ से रवीन्द्रनाथ टैगोर की ओर जाने वाली सांस्कृतिक यात्रा भी अर्थपूर्ण है। नालंदा जिस ऐतिहासिक सांस्कृतिक संवाद का प्रतीक है, टैगोर ने आधुनिक समय में उसे मानवीय और वैश्विक संदर्भ में देखने का प्रयास किया। अपनी संस्कृति में जड़ें रखते हुए दूसरी संस्कृतियों से संवाद करने की क्षमता उनकी दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष थी।इस अर्थ में टैगोर का विश्वबोध नालंदा की ऐतिहासिक स्मृति से एक वैचारिक सूत्र में जुड़ता दिखाई देता है अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए व्यापक संसार से संवाद। विश्वरंग इसी संवाद को समकालीन संदर्भ में आगे बढ़ाने का प्रयास है।
नालंदा की विरासत का महत्वपूर्ण पक्ष उसका एशियाई विस्तार भी है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के संबंधों में व्यापार, समुद्री यात्राएँ, धर्म, कला, स्थापत्य, भाषाएँ और विचार सभी की भूमिका रही है। आज इन संबंधों का महत्व शिक्षा, तकनीक, व्यापार, समुद्री संपर्क और सतत विकास तक विस्तृत हो चुका है। इसलिए नालंदा से दक्षिण-पूर्व एशिया तक की सांस्कृतिक यात्रा अतीत और वर्तमान के बीच एक स्वाभाविक कड़ी बन सकती है।
अतीत से भविष्य की ओर:नालंदा की ओर लौटने का अर्थ अतीत को हूबहू पुनर्जीवित करना नहीं है। इतिहास वर्तमान की समस्याओं के लिए तैयार उत्तरों की सूची नहीं देता, लेकिन यह समझने में मदद करता है कि समाजों ने पहले ज्ञान, संस्थाओं और सांस्कृतिक संवाद के कौन-कौन से रूप विकसित किए।
नालंदा हमें संस्थागत ज्ञान की शक्ति की याद दिलाता है। भारतीय भाषाएँ विविध अनुभवों की शक्ति का बोध कराती हैं। पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक तस्वीर को विस्तृत करता है। अनुवाद विविधताओं के बीच सेतु बनाता है। कला बताती है कि संस्कृति शब्दों से बाहर भी जीवित रहती है। टैगोर अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए विश्व से संवाद की संभावना दिखाते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संबंध बताते हैं कि सांस्कृतिक संपर्क अतीत की समाप्त प्रक्रिया नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का भी हिस्सा है।
इन सबको साथ रखकर एक व्यापक भारत-दृष्टि उभरती है ऐसी दृष्टि जो अपनी विरासत से परिचित है, लेकिन अतीत में बंद नहीं; जो विविधता को स्वीकार करती है, लेकिन संवाद की संभावनाओं को समाप्त नहीं करती; जो आधुनिकता को अपनाती है, लेकिन अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को बोझ नहीं समझती; और जो विश्व से संवाद करती है, तो आत्मविश्वास अपनी सांस्कृतिक जड़ों से प्राप्त करती है।
नालंदा की भूमि पर विश्वरंग का आयोजन इसी दृष्टि को व्यवहार में लाने का प्रयास है। अलग-अलग भाषाओं के रचनाकार, विश्वविद्यालयों के अध्यापक, विभिन्न कलाओं के प्रतिनिधि और भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से आए सांस्कृतिक कर्मी जब एक मंच पर बैठते हैं, तो वे केवल किसी विषय पर चर्चा नहीं कर रहे होते; वे भारतीय सांस्कृतिक विविधता को साझा संवाद में उपस्थित कर रहे होते हैं।

संतोष चौबे
(लेखक निदेशक, विश्वरंग एवं कुलाधिपति, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय हैं।)