वैश्विक कूटनीति, सामाजिक संबंधों और अंतरधार्मिक संवाद के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो पुरानी रूढ़ियों और स्थापित नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर भावी शताब्दियों के लिए एक नया इतिहास-चक्र रचते हैं। न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित होटल 'द पिएर' में 'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ रिलिजियस लीडर्स' द्वारा आयोजित 'वन वर्ल्ड: वन ह्यूमैनिटी' सम्मेलन ऐसा ही एक युगांतरकारी मोड़ सिद्ध हुआ है। विश्व के 14 प्रमुख धर्मों के 200 से अधिक शीर्ष आध्यात्मिक गुरुओं, विचारकों और नीति-निर्माताओं का एक मंच पर एकत्र होना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा मुख्य अतिथि के रूप में विश्व मानवता को संबोधित करना केवल एक वैश्विक घटनाक्रम मात्र नहीं है।
यह भारत के अनादि सांस्कृतिक चिंतन का वैश्विक क्षितिज पर एक ऐसा उद्घोष है, जिसने अंतरराष्ट्रीय वैचारिक विमर्श की दिशा बदल दी है। दशकों से पश्चिमी मीडिया, वामपंथी बौद्धिक वर्ग और औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित वैश्विक इकोसिस्टम ने संघ और हिंदू दर्शन को एक विशिष्ट संकीर्ण चौखटे में चित्रित करने का दुराग्रह किया है। परंतु न्यूयॉर्क की पावन वेदी से वर्ल्ड काउंसिल के महासचिव बावाजैन और डॉ. मोहन भागवत के बीच हुए सीधे, निर्भीक और पारदर्शी संवाद ने इस औपनिवेशिक नैरेटिव की धज्जियां उड़ा दीं। इसने स्पष्ट कर दिया कि जब भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक जड़ों की अमूल्य शक्ति के साथ विश्व मंच पर दंडायमान होता है, तो वह किसी रक्षात्मक मुद्रा, हीन ग्रंथि या प्रतिक्रिया में नहीं बोलता। वह 'वसुधैव कुटुंबकम्' के उस उदात्त ऋषियों के उद्घोष के साथ बात करता है, जो संपूर्ण चराचर जगत को एक अविभाज्य परिवार स्वीकार करता है।इस ऐतिहासिक वैश्विक मंथन का सबसे केंद्रीय, मौलिक और क्रांतिधर्मी वैचारिक बिंदु है 'सहिष्णुता' की औपनिवेशिक और संकुचित अवधारणा को खारिज कर 'परस्पर आदर' तथा 'पूर्ण स्वीकार्यता' के शाश्वत सिद्धांत को स्थापित करना।
'सहिष्णुता' मूलतः एक पश्चिमी और अब्राहमिक विचार-संरचना की देन है। इसका शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ है कि आप किसी दूसरे के अस्तित्व, उसके भिन्न विचारों या उसकी जीवनशैली को केवल इसलिए 'सहन' कर रहे हैं, क्योंकि आप उसे तुरंत समाप्त करने में असमर्थ हैं। इसमें एक प्रकार की विवशता, विभाजन, छद्म दया और अदृश्य वैचारिक श्रेष्ठता का अहं छिपा होता है। इसके विपरीत, भारतीय वाङ्मय और सनातन चेतना ने कभी सहिष्णुता को अंतिम लक्ष्य माना ही नहीं। भारत सहिष्णुता का नहीं, बल्कि आत्मीयता, विविधता के उत्सव और सर्वसमावेशी आदर का अनुरागी रहा है। ऋग्वेद का शाश्वत उद्घोष 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, मनीषी उसे भिन्न-भिन्न मार्गों से व्यक्त करते हैं) केवल कोई बौद्धिक श्लोक नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक शिराओं में दौड़ता हुआ सहस्राब्दियों का जीवंत इतिहास है।
जब संघ प्रमुख ने विश्वभर से पधारे धर्माचार्यों के समक्ष अत्यंत स्पष्ट और औपचारिकता से परे जाकर यह दोहराया कि 'यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में किसी मुस्लिम या अन्य पंथानुयायी के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू ही नहीं है,' तो यह किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में दिया गया रणनीतिक वक्तव्य नहीं था। यह सनातन हिंदू विचार के उसी मूल दर्शन का प्रामाणिक और गर्जनापूर्ण पुनर्पाठ था, जो विविधता में केवल सामंजस्य नहीं देखता, बल्कि विविधताओं के अस्तित्व को ही सत्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानता है। उन्होंने रेखांकित किया कि उपासना पद्धतियां और ऐतिहासिक स्मृतियां भिन्न हो सकती हैं, किंतु मानव मात्र की अंतर्निहित चेतना और उसकी गरिमा सर्वोपरि है।
सम्मेलन का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण विचार-स्तंभ रहा 'जन्मभूमि' और 'कर्मभूमि' के प्रति नैतिक कर्तव्यबोध का सिद्धांत। न्यूयॉर्क में प्रवासी भारतीय समुदाय और वैश्विक नेतृत्व को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट आह्वान किया गया कि आप विश्व के किसी भी कोने में रहें, जहां की माटी का अन्न और जल आप ग्रहण करते हैं, जहां आप अपनी आजीविका अर्जित करते हैं और नागरिक अधिकार प्राप्त करते हैं—वह आपकी 'कर्मभूमि' है। उस राष्ट्र के विधान, समाज, शांति और प्रगति के प्रति शत-प्रतिशत निष्ठा और नागरिक दायित्व का निर्वहन ही धर्म का सच्चा व्यावहारिक आचरण है। अपनी सांस्कृतिक जड़ों और 'जन्मभूमि' का गौरव हृदय में संजोए रखते हुए अपनी कर्मभूमि के प्रति पूर्णतया समर्पित रहना ही भारतीय प्रवासियों की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए। यह विचार आज के उस वैश्विक दौर में एक अचूक औषधि है, जहां राष्ट्रीय पहचान और धार्मिक कट्टरता के नाम पर कई देशों में आंतरिक विखंडन पैदा करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
यह सर्वविदित है कि न्यूयॉर्क के इस ऐतिहासिक महासंगम को निष्फल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रकार के प्रायोजित भ्रम, राजनीतिक पूर्वाग्रह और विरोध-प्रदर्शन खड़े किए गए थे। कुछ अंतरराष्ट्रीय लॉबियों ने भारी संशय पैदा करने का प्रयास किया और सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले विभिन्न मतावलंबियों को अपनी-अपनी कट्टरपंथी संस्थाओं के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा। परंतु आयोजकों और संघ प्रमुख का दृष्टिकोण इस विषय पर अत्यंत अडिग था। सच्चा और परिणामकारी संवाद वही होता है, जो असहज स्थानों पर हो, जहां गंभीर मतभेद, ऐतिहासिक शिकायतें और अविश्वास की गहरी खाइयां हों। जहां सब लोग पहले से ही एक-दूसरे के विचारों से सहमत हों, वहां संवाद का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। पूर्वाग्रहों की बर्फ पिघलाने का एक ही मार्ग है आमने-सामने बैठकर निष्पक्ष और कठोर सत्य का सामना करना।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब अपने शताब्दी वर्ष (100वें वर्ष) में प्रवेश कर रहा है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर 'वन वर्ल्ड: वन ह्यूमैनिटी' सम्मेलन के माध्यम से जो 'कॉल टू एक्शन' (कार्रवाई का संकल्प) जारी हुआ है, वह संघ के आगामी 100 वर्षों की वैश्विक और सामाजिक कार्यदिशा का एक वृहद रोडमैप प्रस्तुत करता है। यह दिशा केवल भारत की सीमाओं के भीतर सामाजिक समरसता लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वभर के अरबों धर्मावलंबियों के बीच संवाद, विश्वास, सद्भाव और साझा मानवीय मूल्यों का एक अभेद्य सेतु निर्मित करने का दूरदर्शी संकल्प है। संघ के लाखों स्वयंसेवक, जो प्रतिदिन देश-विदेश में निःस्वार्थ भाव से समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान में लगे हैं, उनके लिए यह संवाद एक नया वैश्विक महासंकल्प बन गया है।
आज जब संपूर्ण विश्व केवल प्रादेशिक युद्धों और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता से ही नहीं, बल्कि परमाणु हथियारों से भी अधिक घातक 'मानवता के क्षरण' और 'संवादहीनता के भयानक अविश्वास' से जूझ रहा है, तब भारत का यह सांस्कृतिक मॉडल ही विश्व शांति की एकमात्र व्यावहारिक आशा है। अब केवल कागजी प्रस्तावों, अंतरराष्ट्रीय मंचों के औपचारिक सम्मेलनों और खोखले भाषणों का समय बीत चुका है। समय की पुकार है कि न्यूयॉर्क से प्रस्फुटित इस विचार-पुंज को जमीनी धरातल पर स्थानीय स्तर पर 'संवाद की मेज' सजाकर धरातलीय परिवर्तन में बदला जाए। संघ प्रमुख का यह संदेश और भारत का यह नया वैश्विक प्राकट्य किसी पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व को एक अविभाज्य परिवार के रूप में पिरोने का वह महान अनुष्ठान है, जिसकी प्रतीक्षा संपूर्ण मानवता शताब्दियों से कर रही थी।

देविका दत्ता
(लेखिका मंगलदोई, असम की स्तंभकार हैं।)