अनुराग तागड़े
एक समय था, जब मनोरंजन परिवार के साथ बैठकर देखने का सामूहिक अनुभव हुआ करता था। आज स्मार्टफोन की एक छोटी-सी स्क्रीन पर संपूर्ण विश्व उपस्थित है। ओटीटी अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध दृश्य-मनोरंजन मंचों ने मनोरंजन की परिभाषा बदल दी है। ऐतिहासिक वृत्तचित्रों से लेकर अपराध-कथाओं, सामाजिक नाटकों और अंतरराष्ट्रीय फिल्मों तक सब कुछ कुछ क्षणों में उपलब्ध है। लेकिन इसी सहज उपलब्धता के साथ एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा हुआ है क्या मनोरंजन की असीमित स्वतंत्रता के बीच युवा मन के संरक्षण की पर्याप्त व्यवस्था है?ओटीटी का विरोध करना समाधान नहीं है। यह रचनात्मकता, रोजगार, भाषायी विविधता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। किंतु जब दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन जाए, तब सामग्री की गुणवत्ता, आयु-अनुकूलता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
युवा मन पर प्रभाव : सुविधा के साथ चुनौतियाँ
ओटीटी ने भारतीय युवाओं को विश्वस्तरीय सामग्री तक पहुँच प्रदान की है। छोटे नगरों के कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों के लिए नए अवसर खुले हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों को व्यापक दर्शक मिले हैं। विज्ञान, इतिहास, खेल और सामाजिक विषयों पर आधारित कार्यक्रमों ने ज्ञान तथा मनोरंजन के बीच नई संभावनाएँ उत्पन्न की हैं।लेकिन लगातार एपिसोड देखने की प्रवृत्ति, देर रात तक स्क्रीन पर बने रहना और पढ़ाई अथवा अन्य गतिविधियों के समय में कटौती चिंता के विषय हैं। कुछ अध्ययनों में अत्यधिक दृश्य-सामग्री के उपयोग और एकाग्रता, समय-प्रबंधन तथा नींद से जुड़ी समस्याओं के बीच संबंधों की ओर संकेत किया गया है। हालाँकि यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि ओटीटी देखने वाला प्रत्येक युवा मानसिक अथवा सामाजिक समस्याओं का सामना करेगा। प्रभाव सामग्री की प्रकृति, उपयोग की अवधि, पारिवारिक वातावरण और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है।चिंता का दूसरा पक्ष हिंसा, यौन सामग्री, नशीले पदार्थों और अपराध का चित्रण है। किसी कथा में अपराध दिखाना अनुचित नहीं; समस्या तब है, जब अपराध को प्रतिष्ठा, हिंसा को वीरता और महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार को सामान्य जीवनशैली के रूप में प्रस्तुत किया जाए। इसलिए सामग्री का मूल्यांकन केवल उसके विषय से नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति, संदर्भ और दर्शकों की आयु के आधार पर होना चाहिए।
भारतीय संस्कृति और वैश्विक प्रभाव
ओटीटी भारतीय युवाओं को विश्व की विविध संस्कृतियों से परिचित करा रहा है। यह अवसर भी है और चुनौती भी। भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसकी भाषाओं, पारिवारिक संबंधों, लोकपरंपराओं, आध्यात्मिक विमर्श और सामाजिक विविधता में निहित है। वैश्विक सामग्री से संवाद करते हुए इन मूल्यों को समझना और उनका पुनर्पाठ करना आवश्यक है।लेकिन सांस्कृतिक संरक्षण का अर्थ प्रत्येक विदेशी विचार का निषेध नहीं है। भारतीय परंपरा तर्क, संवाद और विविध दृष्टियों के सह-अस्तित्व से समृद्ध हुई है। वास्तविक आवश्यकता ऐसी सामग्री के निर्माण की है, जो आधुनिक युवाओं की जिज्ञासाओं का सम्मान करते हुए उन्हें भारतीय इतिहास, विज्ञान, लोककला, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ सके।अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर विश्व से संवाद करना ही आत्मविश्वासी आधुनिकता का वास्तविक स्वरूप है।
भारत में नियमन : कानून है, क्रियान्वयन महत्त्वपूर्ण है
भारत में ओटीटी मंच पूरी तरह नियमन से मुक्त नहीं हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का भाग तीन ऑनलाइन क्यूरेटेड सामग्री के प्रकाशकों के लिए आचार संहिता निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत सामग्री का पाँच आयु-वर्गों में वर्गीकरण किया जाता है—यू, यू/ए 7+, यू/ए 13+, यू/ए 16+ और ए अर्थात् केवल वयस्कों के लिए। नियमों में सामग्री के वर्गीकरण, अभिभावकीय नियंत्रण तथा शिकायत-निवारण की व्यवस्थाएँ भी सम्मिलित हैं।शिकायतों के निवारण के लिए तीन-स्तरीय व्यवस्था है, जिसमें मंच का अपना तंत्र, स्व-नियामक निकाय और निर्धारित परिस्थितियों में सरकारी स्तर की निगरानी सम्मिलित है। अगस्त 2026 में सरकार ने भी स्पष्ट किया कि सामग्री का वर्गीकरण हिंसा, नग्नता, यौन विषयों, भाषा, नशीले पदार्थों और भयावह दृश्यों जैसे कारकों के आधार पर किया जाना चाहिए।इससे स्पष्ट है कि चुनौती केवल नए कानून बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन, शिकायतों का समयबद्ध निपटारा और आयु-वर्गीकरण की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की भी है।
दुनिया से सीख : ब्रिटेन, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया
ब्रिटेन ने ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम, 2023 के माध्यम से बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए अधिक कठोर दायित्व निर्धारित किए हैं। लागू प्रावधानों के अंतर्गत संबंधित सेवाओं को बच्चों के लिए जोखिमों का आकलन करना तथा कुछ अत्यंत हानिकारक सामग्री तक उनकी पहुँच रोकने के लिए प्रभावी आयु-सत्यापन अथवा आयु-अनुमान की व्यवस्था अपनानी होती है।
यूरोपीय संघ के दृश्य-श्रव्य मीडिया सेवा निर्देश के अंतर्गत ऐसी सामग्री से नाबालिगों की सुरक्षा पर बल दिया गया है, जो उनके विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसमें आयु-अनुकूल पहुँच-नियंत्रण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन महत्त्वपूर्ण है।ऑस्ट्रेलिया ने भी ऑनलाइन सुरक्षा संहिताओं के माध्यम से बच्चों को अत्यधिक हिंसा, अश्लील सामग्री और आत्म-क्षति को प्रोत्साहित करने वाली सामग्री से बचाने के उपाय विकसित किए हैं। उसकी व्यवस्था में डिजिटल सेवाओं के विभिन्न प्रकारों के अनुसार अलग-अलग दायित्व निर्धारित किए गए हैं।इन देशों के अनुभव से भारत को सीखना चाहिए कि केवल आयु-सूचक चिह्न दिखा देना पर्याप्त नहीं है। जहाँ आवश्यक हो, वहाँ वास्तविक पहुँच-नियंत्रण, प्रभावी शिकायत-व्यवस्था और स्वतंत्र निगरानी भी होनी चाहिए।
भारत में क्या सुधार आवश्यक हैं?
पहला, वयस्कों के लिए निर्धारित सामग्री पर प्रभावी आयु-सत्यापन लागू किया जाए। यह व्यवस्था जोखिम के अनुरूप हो तथा दर्शकों की अनावश्यक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र न करे।
दूसरा, सभी मंचों पर आयु-वर्गीकरण और सामग्री-संबंधी चेतावनियाँ स्पष्ट हों। हिंसा, यौन सामग्री, नशीले पदार्थों और कठोर भाषा के बारे में दर्शकों को पहले से जानकारी मिले।
तीसरा, बच्चों की प्रोफाइल में आयु-अनुकूल सामग्री और अभिभावकीय नियंत्रण की सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हों। लगातार चलने वाले एपिसोड और अनियंत्रित अनुशंसाओं पर भी बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से विचार किया जाए।
चौथा, शिकायतों का समयबद्ध निपटारा हो और बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले मंचों के विरुद्ध कानून के अनुरूप अनुपातिक कार्रवाई की जाए।
पाँचवाँ, नियमन के नाम पर वैध कलात्मक अभिव्यक्ति, राजनीतिक आलोचना अथवा सामाजिक विमर्श को अनुचित रूप से प्रतिबंधित न किया जाए। सामग्री पर कार्रवाई स्पष्ट कानूनी आधार और वास्तविक जोखिम के अनुसार होनी चाहिए।
छठा, भारतीय भाषाओं, इतिहास, विज्ञान, खेल और लोकसंस्कृति पर आधारित गुणवत्तापूर्ण कार्यक्रमों के निर्माण को प्रोत्साहित किया जाए। प्रतिबंधों के साथ अच्छे विकल्प उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।
परिवार, शिक्षा और उत्तरदायित्व
केवल कानून से स्वस्थ डिजिटल संस्कृति का निर्माण नहीं हो सकता। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद करना चाहिए, विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता को प्रोत्साहित करना चाहिए और युवाओं को समय-प्रबंधन, निजता तथा सामग्री के आलोचनात्मक मूल्यांकन की शिक्षा देनी चाहिए।युवाओं को भी समझना होगा कि मनोरंजन जीवन का एक पक्ष है, संपूर्ण जीवन नहीं। पर्याप्त नींद, अध्ययन, खेल, प्रत्यक्ष सामाजिक संवाद और रचनात्मक गतिविधियाँ व्यक्तित्व के संतुलित विकास के लिए आवश्यक हैं।
स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व
ओटीटी पर आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें रचनात्मक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, बच्चों को आयु-अनुपयुक्त सामग्री से संरक्षण मिले और डिजिटल मंच अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करें।भारत की वास्तविक विजय केवल तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि ऐसी युवा पीढ़ी के निर्माण में है, जो आधुनिकता को अपनाए, अपनी सांस्कृतिक अस्मिता पर गर्व करे और प्रत्येक दृश्य, विचार तथा प्रवृत्ति का विवेकपूर्ण मूल्यांकन कर सके।क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि युवा क्या देखते हैं, बल्कि इससे भी कि वे देखकर क्या सीखते हैं, कैसा विचार करते हैं और अपने जीवन को किस दिशा में ले जाते हैं।