समर्थ मठ: आस्था और संस्कार का केंद्र

वंदे मातरम् से संस्कारों के बीजारोपण तक

समर्थ मठ ने भक्ति, अनुशासन, और राष्ट्रचेतना को जीवन मूल्यों के साथ जोड़कर सामाजिक समरसता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा दिया है।

By : नरेंद्र कुमार
वंदे मातरम् से संस्कारों के बीजारोपण तक

अनुराग तागड़े, इंदौर

समर्थ मठ बना आस्था, अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रचेतना का जीवंत केंद्र

भक्ति यदि केवल उपासना की परिधि में सीमित न रहकर जीवन-मूल्यों, राष्ट्रचेतना, सामाजिक समरसता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का माध्यम बन जाए, तो धार्मिक स्थल समाज की चेतना के केंद्र बन सकते हैं। पंत वैद्य कॉलोनी स्थित समर्थ मठ संस्थान की गतिविधियां इसी विचार को साकार करती दिखाई देती हैं। समर्थ रामदास की पारंपरिक उपासना पद्धति का अनुसरण करने वाले इस संस्थान में प्रातः काकड़ आरती से आरंभ होने वाली दिनचर्या रात्रि की शयन आरती तक चलती है। इसकी विशिष्टता यह है कि प्रत्येक आरती से पूर्व सामूहिक रूप से 'वंदे मातरम्' का गान किया जाता है।

जब अनेक कंठों से एक साथ वंदे मातरम् का स्वर गूंजता है, तो वह केवल गीत का सामूहिक उच्चारण नहीं रह जाता, बल्कि मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, अपनी मिट्टी से आत्मीयता और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध का भाव जागृत करता है। पूजा की लौ के साथ देशप्रेम की लौ भी मन में प्रज्वलित हो, इसी भावभूमि में समर्थ मठ की दिनचर्या आगे बढ़ती है। प्रतिदिन होने वाली आरती में पंत वैद्य कॉलोनी के साथ रामबाग कॉलोनी, नारायण बाग तथा आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालु भी सहभागी होते हैं। इस सहभागिता ने मठ को केवल धार्मिक स्थल न रखकर आत्मीय सामुदायिक केंद्र का स्वरूप दिया है। संस्थान से जुड़े श्री अशोक पाटणकर के अनुसार, यहां होने वाली गतिविधियों में क्षेत्र के नागरिक स्वेच्छा से सहभागी बनते हैं। प्रतिवर्ष बड़े स्तर पर भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसकी तैयारियों और व्यवस्थाओं में कार्यकर्ता आसपास की कॉलोनियों में संपर्क करते हैं तथा नागरिक अपनी इच्छानुसार सहयोग प्रदान करते हैं। विशेष बात यह है कि वहां केवल मराठीभाषी परिवार ही नहीं, अन्य भाषायी समुदायों के लोग भी आत्मीयता से जुड़े हैं।

योग से आरंभ, संस्कारों तक विस्तार

समर्थ मठ में स्वास्थ्य, अनुशासन और आत्मसंयम को भी विशेष महत्व दिया जाता है। प्रतिदिन प्रातः 6 से 7 बजे तथा सायंकाल 5.30 से 7 बजे तक योग सत्र आयोजित होते हैं। नियमित योग के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक एकाग्रता और अनुशासित जीवनशैली के लिए प्रेरित किया जाता है। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए धार्मिक गतिविधियों के साथ अनेक सांस्कृतिक उपक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं। बच्चों को नियमित नाट्य प्रशिक्षण दिया जाता है। सप्ताह में तीन दिन शास्त्रीय नृत्य की कक्षाएं होती हैं। इसके अतिरिक्त आनंदम बाल गोकुलम के नियमित वर्ग भी संचालित किए जाते हैं। इन उपक्रमों का उद्देश्य केवल कला-कौशल विकसित करना नहीं, बल्कि बच्चों को भारतीय संस्कृति, परंपरा और जीवन-मूल्यों से परिचित कराना है। बच्चे जब प्रार्थना के साथ वंदे मातरम् गाते हैं, भारतीय परंपराओं को समझते हैं, अपनी भाषा में नाटक प्रस्तुत करते हैं और सामूहिक आयोजनों में सहभागी होते हैं, तो उनके भीतर भारत से जुड़ाव और भारतीय होने का गौरव स्वाभाविक रूप से गहराता जाता है।

गणेशोत्सव में पीढ़ियों का संगम

समर्थ मठ में श्री गणेशोत्सव पूरे उत्साह, भव्यता और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। बुजुर्ग परंपराओं और धार्मिक विधियों का मार्गदर्शन करते हैं, युवा व्यवस्थाओं में दायित्व संभालते हैं और बच्चे सांस्कृतिक गतिविधियों तथा विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। एक ही परिसर में दादा-दादी का अनुभव, माता-पिता की सक्रियता और बच्चों का उत्साह भारतीय परिवार व्यवस्था की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है। मठ की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में महिलाओं की सहभागिता भी उल्लेखनीय है। महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विभिन्न दायित्व निभाती हैं।

मातृभाषा से संस्कृति का सेतु

समर्थ मठ की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष बच्चों को मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना भी है। बच्चों को रंगकर्म तथा मराठी नाटकों का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां तैयार होने वाले बाल नाट्य दल महाराष्ट्र में आयोजित मराठी नाट्य स्पर्धाओं में भी प्रस्तुतियां देने के लिए जाते हैं। रंगमंच बच्चों में संवाद कौशल, आत्मविश्वास, सामूहिकता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है। मातृभाषा से प्रेम और देश की विविध भाषाओं एवं संस्कृतियों के प्रति सम्मान, भारतीयता की उस व्यापक भावना का हिस्सा है, जिसमें विविधता के बीच सांस्कृतिक एकात्मता का अनुभव होता है।

पर्यावरण के प्रति सजगता

समर्थ मठ की गतिविधियों में सामाजिक सरोकारों के साथ पर्यावरण-जागरूकता को भी महत्व दिया जाता है। धार्मिक आयोजनों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने, क्षेत्र को स्वच्छ रखने तथा सार्वजनिक स्थलों की स्वच्छता के प्रति सजग रहने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है। मातृभूमि केवल मानचित्र पर अंकित सीमाओं का नाम नहीं है। जिस मिट्टी में हम रहते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं और जिस जल से जीवन चलता है, उसकी रक्षा करना भी राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का ही विस्तार है। बच्चों को भी पर्यावरण, स्वच्छता और सामुदायिक उत्तरदायित्व के प्रति संवेदनशील बनाने के प्रयास किए जाते हैं।

'राष्ट्र प्रथम' की भावना

संस्थान से जुड़े सुधीर वाडेकर के अनुसार, समर्थ मठ की कार्यपद्धति के केंद्र में 'राष्ट्र प्रथम' की भावना है। आरती से पहले होने वाला वंदे मातरम् का सामूहिक गान इसी विचार का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण है। उनके अनुसार, राष्ट्र के प्रति श्रद्धा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण, सामाजिक दायित्व और आने वाली पीढ़ी के संस्कारों में भी दिखाई देनी चाहिए। इसी व्यापक राष्ट्रभाव को समर्थ मठ अपनी दिनचर्या में पिरोने का प्रयास करता है।

प्रभु श्रीराम के मंदिर में प्रतिदिन नियमित पूजा-अर्चना होती है। सुबह से रात तक चलने वाली पारंपरिक उपासना के साथ योग, नाट्य, नृत्य, बाल संस्कार, मातृभाषा, पर्यावरण जागरूकता और सामाजिक सहभागिता जैसी गतिविधियों का समावेश इसकी कार्यदृष्टि को व्यापक बनाता है।

वास्तव में, समर्थ मठ की गतिविधियां इस विचार को सामने लाती हैं कि आस्था जब संस्कारों से जुड़ती है, संस्कार राष्ट्रचेतना का आधार बनते हैं और राष्ट्रचेतना सामाजिक उत्तरदायित्व में रूपांतरित होती है, तब धार्मिक संस्थाएं केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं रहतीं, बल्कि समाज की चेतना और नई पीढ़ी के चरित्र-निर्माण की पाठशाला बन जाती हैं।

आरती में वंदे मातरम् के सामूहिक स्वर से लेकर बच्चों के मन में संस्कारों के बीजारोपण तक, समर्थ मठ की गतिविधियों में राष्ट्रभाव को जीवन-पद्धति का हिस्सा बनाने का सतत प्रयास दिखाई देता है। जहां भक्ति में भारत के प्रति भाव जुड़ता है, संस्कारों में राष्ट्र का चिंतन उतरता है और नई पीढ़ी अपनी संस्कृति के साथ मातृभूमि पर गर्व करना सीखती है, यहीं राष्ट्रचेतना की वास्तविक नींव आकार लेती है।

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