सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है, वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निरंतर और लगातार बना दिया है। एक मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए व्यक्ति अपनी बात हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है, वरन् एकांत को भी भर दिया है।
भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा, 'अरे भाई, क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं, तो यह सामाजिक मीडिया कैसे?' किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है। अब उससे आगे डीपफेक ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स की मदद से किसी भी व्यक्ति का फर्जी वीडियो या ऑडियो बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है। कुछ ही सेकंड के ऑडियो या वीडियो सैंपल से तैयार यह तकनीक आम आदमी से लेकर दिग्गजों तक की पहचान के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।
सृजनात्मकता का विस्फोट-पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। लोकतंत्र के पहरुओं और सरकारों को भी इसका अहसास हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि 'सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रिएटिविटी का पता ही नहीं चलता।'
सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है, वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निरंतर और लगातार बना दिया है। एक मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए व्यक्ति अपनी बात हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है, वरन् एकांत को भी भर दिया है।
निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही-सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। इस आभासी दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय' कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक यह माध्यम अपनी गंभीर मौजूदगी दर्ज करवा रहा है और सबको आवाज देने के संकल्प से लबरेज है।
यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी-यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। फिल्में आईं तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, न ही वे फिल्में देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बॉक्स कहा गया। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है और संवाद की गुंजाइश बना रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं।
इसके साथ हमें यह भी समझना होगा कि किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में डाल सकता है। यह समय इंफॉर्मेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिपोर्टर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए।
सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। चुनावों या संवेदनशील राजनीतिक मौकों पर राजनेताओं के फर्जी भाषणों या बयानों वाले डीपफेक वीडियो का प्रसार मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्षता और जनमत को गलत दिशा में मोड़ने वाला एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है।
ठग फेक आइडेंटिटी के जरिए बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। डीपफेक का इस्तेमाल महिलाओं और प्रसिद्ध हस्तियों की तस्वीरों या वीडियो के गलत इस्तेमाल, मानहानि और ऑनलाइन उत्पीड़न के लिए भी किया जा रहा है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है।
डीपफेक और भ्रामक कृत्रिम सामग्री पर लगाम कसने के लिए कानूनों और नियमन को सख्त किया जा रहा है। एआई-जनित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट डिजिटल स्टैम्प या लेबल जैसी व्यवस्थाएं उपयोगकर्ताओं को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि सामग्री वास्तविक है या कृत्रिम। समाज को भी डिजिटल साक्षरता और सूचना की जांच की आदत विकसित करनी होगी।
शक्ति का हो सार्थक इस्तेमाल-सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुई है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत का इस्तेमाल किया और उसे समझा है।
सकारात्मक सोच और सामाजिक सरोकारों से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, महिला सुरक्षा और सामाजिक सरोकारों के अनेक प्रश्नों पर सोशल मीडिया जनभागीदारी का बड़ा माध्यम बन सकता है। यदि इसका सावधान, सतर्क और समाज के लिए उपयोगी प्रयोग संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।
एंगेजमेंट की भूख से बढ़ता खतरा-सोशल मीडिया के एल्गोरिदम 'एंगेजमेंट' यानी व्यूज और लाइक्स के भूखे होते हैं। झूठी और सनसनीखेज खबरें सच की तुलना में तेजी से फैलती हैं, जिससे सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का कारोबार फल-फूल रहा है। यह केवल सरकारों या टेक कंपनियों की लड़ाई नहीं है। तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस का निर्माण करना होगा।
पारंपरिक कहावत 'आंखों देखी पर विश्वास करो' अब डिजिटल युग में दम तोड़ रही है। जब वीडियो और तस्वीरों पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो समाज में हर प्रामाणिक और सच्ची घटना पर भी शक का माहौल पैदा होने लगता है। यही इस पूरे संकट का सबसे गंभीर पक्ष है।सोशल मीडिया ने अपनी लोकप्रियता के साथ भरोसे का संकट भी खड़ा किया है, इसमें दो राय नहीं है। इसलिए आवश्यकता सोशल मीडिया को नकारने की नहीं, बल्कि उसे समझने और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने की है। सूचना की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब उसके साथ सत्य की जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। तकनीक हमें शक्तिशाली बना सकती है, लेकिन उस शक्ति को मानवीय और लोकतांत्रिक बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।

प्रो. संजय द्विवेदी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)