विपक्ष द्वारा देश की छवि खराब

जानबूझकर विपक्ष खराब कर रहा देश की छवि

विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए आरोपों से भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित हो रही है। जीडीपी और विदेश नीति के मुद्दे पर विवाद.

By : नरेंद्र कुमार
जानबूझकर विपक्ष खराब कर रहा देश की छवि

पश्चिमी एशिया और रूस-यूक्रेन की लड़ाई के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं। ऐसे में जब यह आंकड़ा आए कि देश की जीडीपी की विकास दर 7.8 प्रतिशत रही है तो अव्वल तो खुशी का माहौल होना चाहिए था। लेकिन इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की बुनियाद बना है पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का दावा। उनका कहना है कि जीडीपी आधार को 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दिया है। इस लिहाज से यह दर शून्य से लेकर 2.6 प्रतिशत तक ही बैठती है। सरकार के आंकड़ों की कोई पूर्व रसूखदार अधिकारी खिल्ली उड़ाए और उसे विपक्ष न ले उड़ता तो हैरत ही होती। लेकिन ऐसा हो रहा है। इसकी वजह यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ी वैचारिक खाई निजी खुन्नस और दुश्मनी तक पहुंच गई है। इस वजह से दोनों ही पक्षों में एक-दूसरे को लेकर भरोसे का रिश्ता नहीं रह गया है। यही वजह है कि देश को जोड़ने और आगे बढ़ाने वाले जब भी कोई मुद्दा या आंकड़ा सामने आता है, विपक्ष उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगता है।

ऐसा नहीं कि अतीत में विपक्ष सरकार को नहीं घेरता रहा है। लेकिन तब भी यह ध्यान रखा जाता था कि राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर ऐसे कदम न उठाए जाएं या ऐसे बयान न दिए जाएं, जिससे देश की छवि पर आंच पहुंचे। अगर ऐसा नहीं होता तो मानवाधिकार के मामले पर नेता प्रतिपक्ष पाकिस्तान की मुखालफत करने के लिए जेनेवा जाने वाले सरकारी दल की अगुआई नहीं करता। पीवी नरसिंह राव की सरकार ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को न सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल दल का नेता बनाकर भेजा था, बल्कि पाकिस्तान के इरादे को नेस्तनाबूद करके लौटे प्रतिनिधिमंडल का प्रोटोकॉल तोड़कर दिल्ली के हवाई अड्डे पर स्वागत भी किया था।

भारत ने जब-जब परमाणु परीक्षण किया, तत्कालीन विपक्ष उसके साथ रहा। वाजपेयी के पोखरण परीक्षण के बाद तो अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे, लेकिन कांग्रेस ने तब भी वाजपेयी सरकार पर सवालिया निशान नहीं लगाए थे। लेकिन आज के दौर में अगर मोदी सरकार ऐसा कोई परीक्षण करती है तो उससे आज का विपक्ष सबूत मांगेगा। यह भी हो सकता है कि विदेशी धरती पर जाकर राहुल गांधी इसका प्रत्यक्ष सबूत और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांग दें।

ठीक इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को लेकर भी मोदी सरकार को झूठा ठहराने की कोशिश हो रही है। चीन गलवान कांड के दौरान भारतीय सीमावर्ती कमांड के चीफ रहे जनरल को बर्खास्त कर देता है, फिर भी राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष अब भी प्रचारित करने से परहेज नहीं कर रहा है कि गलवान घाटी में भारतीय सेना को चीन ने हराया और चीन भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसी बयानबाजी अगर एक-दो बार होती तो उसे अनदेखा भी किया जा सकता था। लेकिन विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी की ओर से बार-बार ऐसे बयान दिए जाते हैं, जिसका संकेत तो यही लगता है कि वे भारत की छवि को खराब कर रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीयता बनाम राजनीति की बहस के दायरे में लाकर राहुल गांधी पर सवालों की बौछार करती रहती है। यह बात और है कि ऐसे ही बयान देने या उनका समर्थन करने वाले अखिलेश यादव और चंद्रशेखर रावण जैसे नेताओं के बयानों को नोटिस तक नहीं लेती।वैसे विदेशों में भारतीय व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं। मसलन, राहुल गांधी ने बोस्टन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए थे। तब उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग 'कंप्रोमाइज्ड' है और इसके सिस्टम में 'बहुत गलत' है। आयोग ऐसे आरोपों का जवाब देता रहा, लेकिन विपक्ष की जुबान नहीं रुकी।

इसी तरह बीते लोकसभा चुनाव के बाद अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में राहुल ने कहा था, 'भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा हुआ है, अब यह लड़ रहा है।' इसी तरह सितंबर 2023 में राहुल ने यूरोपीय यूनियन को संबोधित करते हुए ब्रसेल्स में कहा था कि भारत में भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। इस तरह के बयानों से राहुल जहां भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाते रहे हैं, वहीं इसके जरिए वे भारतीय संस्थाओं को खुद ही बदनाम करते हैं।इसी तरह मई 2022 में लंदन में 'आइडियाज फॉर इंडिया' सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि भारतीय संस्थाएं 'परजीवी' बन गई हैं। तब उन्होंने भारतीय संस्थाओं, मसलन सीबीआई और ईडी को 'डीप स्टेट' कह दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान से भी कर दी।

राहुल ने 2018 में सिंगापुर के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में कहा था कि भारत में 'डर और नफरत' का माहौल है और बहुलता की विचारधारा खतरे में है। इसी तरह जनवरी 2018 में बहरीन में प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि सरकार बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रही है, जिसका असर गुस्से और नफरत के रूप में दिख रहा है। इसी तरह 2017 में उन्होंने अमेरिका में कहा था कि भारत अब वह नहीं रहा, जहां हर कोई कुछ भी कह सकता है।ऐसे बयानों से अक्सर वे भारत को ही सवालों के घेरे में रखते हैं और इस तरह देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके ऐसे बयानों को बाद में समूचा विपक्ष भी ले उड़ता है और जगह-जगह भारतीय छवि को नुकसान पहुंचाता है। कुछ ऐसा ही इस बार जीडीपी को लेकर हो रहा है।

1991 के बाद का दौर इस वक्त याद आना लाजमी है। राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के बावजूद कांग्रेस को आम चुनाव में बहुमत नहीं मिला। तब नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस की अल्पमत की सरकार चलती रही। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 120 सीटें मिली थीं। इतनी ताकत के बावजूद बीजेपी ने आर्थिक सुधार के मोर्चे पर कांग्रेस की सरकार को बहुत सहयोग किया। सहयोग करने के लिए बीजेपी ने संसद की कार्यवाही से बहिर्गमन करने का रास्ता चुना था। मुद्दों पर वह सरकार को सदन में घेरती थी, लेकिन जब भी मतदान की नौबत आती, बीजेपी बाहर निकल जाती थी। इस तरह बीजेपी विरोध भी करती थी और सरकार का परोक्ष साथ भी देती थी।लेकिन आज की स्थिति देखिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में भरोसे का रिश्ता ही नहीं रहा। विपक्ष सिर्फ तीर साधे रहता है और उसकी अगुआई अक्सर राहुल गांधी करते हैं। बाकी विपक्ष उनके साथ कोरस गान में शामिल हो जाता है।

वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तब कांग्रेस ने भी कमोबेश साथ दिया था। जबकि आज की तुलना में अमेरिका ने भारत विरोध में कहीं ज्यादा कड़े कदम उठाए थे। कई तरह की आर्थिक पाबंदियां भी लगाई थीं। तब चाहती तो कांग्रेस वाजपेयी सरकार को रोज कठघरे में खड़ा करती। तब कह सकते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में ऐसे लोगों का वर्चस्व जरूर था, जो राष्ट्रीय हितों और तकाजों को समझते थे। सवाल यह है कि क्या ऐसी सोच आज की राजनीति विकसित नहीं कर सकती?विपक्ष को भूलना नहीं चाहिए कि ऐसे सवाल उठाकर वह भारतीय सरकार को नहीं, भारत की छवि को खराब कर रहा है। उसे देखना होगा कि भारत के आंकड़ों को विश्व बैंक ने भी मान्यता दे दी है। ऐसे में सवाल विपक्षी सोच पर भी उठता है। उसे भी सोचना होगा कि राष्ट्रीय विकास और हित में उसकी भी अपनी सकारात्मक भूमिका है और उसे निभाना होगा।

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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