लोकतंत्र में सदन के अध्यक्ष की कुर्सी केवल एक पद नहीं, बल्कि सदन की गरिमा और उसके अधिकारों का प्रतीक होती है। करीब एक सदी पहले विठ्ठलभाई झवेरभाई पटेल ने ब्रिटिश शासन के दौर में इस सिद्धांत को मजबूती से स्थापित किया था। उन्होंने साबित किया कि अध्यक्ष किसी सरकार का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरे सदन का संरक्षक होता है। आज 22 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उन्हें याद करना भारतीय संसदीय परंपराओं की नींव को याद करना भी है।
संसद में लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में विठ्ठलभाई पटेल का एक चित्र लगा है। यह हर अध्यक्ष को उनके कर्तव्यों और इस पद की शानदार परंपराओं की याद दिलाता है। पटेल 22 अगस्त 1925 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के पहले भारतीय प्रेसिडेंट चुने गए थे। उस समय अध्यक्ष को प्रेसिडेंट कहा जाता था। उन्होंने 24 अगस्त को पद की शपथ ली। यह चुनाव उस इमारत में हुआ था, जो आज दिल्ली विधानसभा भवन है। इसका निर्माण गुर्जर समुदाय के चंद्रावल गाँव की जमीन पर हुआ था।
दो वोटों से बदला इतिहास
विठ्ठलभाई पटेल का चुनाव ब्रिटिश शासन के राजनीतिक ढाँचे के लिए बड़ी चुनौती था। 1925 तक असेंबली का अध्यक्ष या तो वायसराय होता था या उसका नामित व्यक्ति। 1919 के भारत सरकार अधिनियम के तहत निर्वाचित अध्यक्ष की व्यवस्था ने भारतीयों के लिए सीमित स्वशासन का रास्ता खोला था। उस समय असेंबली में 145 सदस्य थे। इनमें 104 निर्वाचित और 41 नामित सदस्य शामिल थे। अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला स्वराज पार्टी के नेता विठ्ठलभाई पटेल और वरिष्ठ सदस्य दीवान बहादुर टी. रंगाचारी के बीच हुआ। रंगाचारी को ब्रिटिश समर्थक माना जाता था।
पटेल के नाम का प्रस्ताव मोतीलाल नेहरू, खान बहादुर सरफराज हुसैन खान, टी.सी. गोस्वामी और डी. बेलवी सहित अन्य सदस्यों ने किया। दूसरी ओर, रंगाचारी के नाम का प्रस्ताव श्रीमती कामिनी कुमार चंद्रा, प्रिंस अकरम हुसैन बहादुर और खान बहादुर मोहम्मद इस्माइल ने रखा। मतदान में पटेल को 56 और रंगाचारी को 54 वोट मिले। महज दो वोटों से जीतकर पटेल पहले भारतीय अध्यक्ष बने। चुनाव के बाद उन्होंने स्वराज पार्टी से नाता तोड़ लिया। बधाई देने वालों से उन्होंने कहा, 'अब मेरा संबंध किसी पार्टी से नहीं है। अब मैं सब दलों के साथ हूँ।' उनका संदेश स्पष्ट था। अध्यक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी किसी एक दल के प्रति नहीं, बल्कि पूरे सदन के प्रति थी।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के अनुसार, 'विठ्ठलभाई पटेल का स्पीकर बनना राष्ट्रवादियों की बड़ी जीत थी। इससे साबित हुआ कि वे औपनिवेशिक संस्थानों में भी नेतृत्व संभाल सकते हैं।'
भगत सिंह के सामने पटेल
विठ्ठलभाई पटेल की अध्यक्षता में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली पहले उस भवन से चलती थी, जो आज दिल्ली विधानसभा है। 18 जनवरी 1927 को जब नई काउंसिल हाउस की इमारत में असेंबली का पहला सत्र हुआ, तब भी पटेल अध्यक्ष थे। यही इमारत आगे चलकर संसद भवन बनी। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंके। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों के खिलाफ विरोध दर्ज कराना था। यह कार्रवाई पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के विरोध में की गई थी। इन कानूनों को क्रांतिकारी गतिविधियों और मजदूर आंदोलनों पर अंकुश लगाने की कोशिश माना जा रहा था।
उस समय पटेल सदन में मौजूद थे। धमाके के बाद भगत सिंह और दत्त ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ नारे लगाए और पर्चे फेंके। पटेल ने कार्यवाही स्थगित कर दी। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ओर ध्यान खींचा।
वायसराय के लिए मँगवानी पड़ी अलग कुर्सी
पुण्यतिथि पर विशेष
विठ्ठलभाई पटेल ने ब्रिटिश सत्ता के सामने अध्यक्ष पद की गरिमा बनाए रखने का साहस भी दिखाया। 29 अगस्त 1928 को वायसराय लॉर्ड इरविन असेंबली को संबोधित करने आए। उस समय परंपरा थी कि वायसराय के पहुँचने पर अध्यक्ष अपनी कुर्सी छोड़ देता था और वायसराय उस पर बैठता था। पटेल ने इस परंपरा को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि अध्यक्ष की कुर्सी सदन की गरिमा का प्रतीक है। आखिरकार, वायसराय के लिए अलग कुर्सी मँगवाई गई और उसे अध्यक्ष की कुर्सी के दाईं ओर रखा गया। लॉर्ड इरविन ने उसी पर बैठकर भाषण दिया, जबकि पटेल अपनी जगह पर बने रहे। यह घटना केवल कुर्सी का विवाद नहीं थी। इसने संदेश दिया कि भारतीय विधायी संस्था की गरिमा ब्रिटिश शासकों से कम नहीं है।
पटेल ने 1925 से 1930 तक अपने कार्यकाल में भारतीय नेताओं को ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने और स्वशासन की माँग उठाने का अवसर दिया। राजनीतिक कैदियों की रिहाई और दमनकारी कानूनों को खत्म करने जैसे मुद्दे भी सदन में उठे। साइमन कमीशन के विरोध में असेंबली की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थी। आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। भारतीय नेताओं ने इसे अपने प्रतिनिधित्व और स्वशासन की आकांक्षाओं की अनदेखी माना।
16 फरवरी 1928 को असेंबली में साइमन कमीशन की औपचारिक निंदा की गई। इस बहस को देखने के लिए दर्शक दीर्घा भरी हुई थी और 145 में से 134 सदस्य उपस्थित थे। देशभर में 'साइमन, गो बैक' के नारे गूँज रहे थे। पटेल की अध्यक्षता वाली असेंबली में मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और सर चिमनलाल सेतलवाड जैसे प्रमुख नेता मौजूद थे। बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.सी. छागला ने जी.एल. पटेल की पुस्तक Vitthalbhai Patel: Life and Times की प्रस्तावना में इस दौर के नेताओं और असेंबली के महत्त्व का उल्लेख किया है।
20 अकबर रोड की संसदीय विरासत
अध्यक्ष बनने के बाद विठ्ठलभाई पटेल को दिल्ली में 20 अकबर रोड स्थित सरकारी आवास मिला था। बाद में यह संसद के अध्यक्ष के आधिकारिक आवास के रूप में जाना गया। इस तरह यह पता भी भारत की संसदीय परंपरा से जुड़ गया। पटेल ने निष्पक्षता, साहस और राष्ट्रवादी भावना के साथ अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर रहकर भी सदन की स्वतंत्रता और भारतीय सदस्यों के अधिकारों की रक्षा की।
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जी.एस. ढिल्लन ने लिखा है, 'भारत में कोई भी स्पीकर विठ्ठलभाई पटेल के गहरे प्रभाव से बच नहीं सकता।' पटेल का 22 अक्टूबर 1933 को निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस विरासत को नमन करना है, जिसकी बुनियाद साहस, निष्पक्षता और सदन की गरिमा पर टिकी है। विठ्ठलभाई पटेल ने अपने आचरण से साबित किया कि अध्यक्ष की कुर्सी की असली ताकत सत्ता के सामने झुकने में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में है।

विवेक शुक्ला
(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पूर्व सलाहकार हैं।)