मैक्लुस्कीगंज की विरासत पर बड़ा खतरा? 20 एकड़ जमीन की बिक्री को लेकर उठे गंभीर सवाल, जांच की मांग तेज 

सादा पट्टों में अवैध तरीकों से की जा रही जमीनों की खरीद-बिक्री करने वाले भू-माफिया एवं संलिप्त लोगों की खैर नहीं: खलारी अंचलाधिकारी प्रणव कुमार अम्बष्ट 

By News11 Bharat
मैक्लुस्कीगंज की विरासत पर बड़ा खतरा? 20 एकड़ जमीन की बिक्री को लेकर उठे गंभीर सवाल, जांच की मांग तेज 

मुमताज अहमद/न्यूज़11 भारत
खलारी/डेस्क:
अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के लिए देशभर में प्रसिद्ध मैक्लुस्कीगंज एक बार फिर भूमि कारोबार को लेकर चर्चा के केंद्र में है. खलारी अंचल अंतर्गत लपरा मौजा में राणा कोटेज के समक्ष करीब 20 एकड़ भूमि की खरीद-बिक्री और बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग कि जा रही है. सूत्रों बताते हैं कि वर्षों से क्षेत्र में जमीनों का कारोबार लगातार बढ़ रहा है, जबकि कई भूमि खंडों की वास्तविक कानूनी स्थिति, स्वामित्व और हस्तांतरण की वैधता को लेकर अब भी स्पष्टता नहीं है. सूत्र बताते हैं कि कभी "मिनी लंदन" के नाम से विख्यात मैक्लुस्कीगंज अपनी अनूठी पहचान, विशाल बंगलों, प्राकृतिक सौंदर्य और एंग्लो-इंडियन संस्कृति के लिए जाना जाता था. लेकिन आज यह क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और जमीनों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है.

मैक्लुस्कीगंज के कुछ प्रबुद्ध जन  बताते हैं कि यह क्षेत्र कभी एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. यहां के विशाल बंगले, आम के बागान, शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता लोगों को आकर्षित करती थी. आज भी देश-विदेश से पर्यटक मैक्लुस्कीगंज की ऐतिहासिक पहचान और प्राकृतिक वातावरण का आनंद लेने पहुंचते हैं.

एंग्लो-इंडियन समुदाय के सपनों का शहर था मैक्लुस्कीगंज
मैक्लुस्कीगंज की स्थापना 16 मई 1933 को स्वर्गीय ई.टी. मैक्लुस्की द्वारा की गई थी. एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए एक स्थायी आवासीय क्षेत्र विकसित करने के उद्देश्य से सोसाइटी ने तत्कालीन रातू महाराजा से लगभग 10 हजार एकड़ भूमि पट्टे पर प्राप्त की थी. इसके बाद यहां योजनाबद्ध तरीके से बस्तियां बसाई गईं और सैकड़ों सुंदर बंगले बनाए गए.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थितियां बदलीं और बड़ी संख्या में एंग्लो-इंडियन परिवार ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों में बस गए. समय के साथ उनकी आबादी घटती चली गई और कई ऐतिहासिक बंगले वीरान हो गए. कुछ बंगलों को बाद में गेस्ट हाउस और पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित किया गया, लेकिन बड़ी संख्या में संपत्तियां उपेक्षित होती चली गईं.

जानकार बताते हैं एंग्लो-इंडियन परिवारों के पलायन और कई संपत्तियों के वर्षों तक खाली रहने का लाभ उठाकर कुछ लोगों ने जमीनों पर कब्जा जमाने और उनकी खरीद-बिक्री का सिलसिला शुरू कर दिया. स्थानीय लोगों का दावा है कि लपरा पंचायत क्षेत्र में करीब 20 एकड़ भूमि की प्लॉटिंग कर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बेचा जा रहा है. वहीं उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि इस कथित भूमि कारोबार में कोलकाता निवासी रामाकांत सिंह उर्फ आरके सिंह का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है. सूत्र बताते है कि प्रशासन को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिन जमीनों की बिक्री की जा रही है, उनका वास्तविक स्वामित्व किसके पास है और खरीद-बिक्री की प्रक्रिया किस कानूनी आधार पर की जा रही है.
 सादा पट्टा और दस्तावेजों पर उठ रहे सवाल

सूत्रों का कहना है कि मैक्लुस्कीगंज क्षेत्र में सोसाइटी की भूमि, पुराने एंग्लो-इंडियन बंगलों की परिसंपत्तियां, गैरमजरुआ भूमि तथा वन भूमि की स्थिति को लेकर व्यापक जांच की आवश्यकता है. सूत्रों का दावा है कि मैक्लुस्कीगंज क्षेत्र में कुछ जमीनों की खरीद-बिक्री कथित रूप से सादा पट्टों के आधार पर की जा रही है. बताया जा रहा है कि मैक्लुस्कीगंज की पर्यटन संभावनाओं, ऐतिहासिक पहचान, शैक्षणिक संस्थानों और भविष्य में विकास की संभावनाओं को देखते हुए बड़ी संख्या में बाहरी लोग यहां जमीन खरीद रहे हैं. कई खरीदार इसे सुरक्षित निवेश मानकर अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी लगा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि अधिकांश खरीदार यह मानकर जमीन खरीद रहे हैं कि सभी दस्तावेज पूरी तरह वैध हैं. कई स्थानों पर मकानों का निर्माण हो चुका है, जबकि अनेक क्षेत्रों में निर्माण कार्य तेजी से जारी है. ग्रामीणों को आशंका है कि यदि भविष्य में भूमि स्वामित्व, पट्टा, रैयती अधिकार या अन्य दस्तावेजों को लेकर कोई कानूनी विवाद उत्पन्न होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उन परिवारों को उठाना पड़ सकता है जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लगाकर यहां जमीन खरीदी है.

कुछ लोगों द्वारा वर्षों से जारी है भूमि और विरासत बचाने का संघर्ष
ग्रामीणों का दावा है कि मैक्लुस्कीगंज की ऐतिहासिक पहचान, एंग्लो-इंडियन विरासत और बहुमूल्य जमीनों को बचाने के लिए कई सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और जागरूक नागरिक वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं. उनका आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता, प्रभावशाली लोगों के दबाव और समय पर ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण कथित अवैध भूमि कारोबार पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते मामले की जांच नहीं हुई तो मैक्लुस्कीगंज की ऐतिहासिक पहचान, पुराने बंगले, सांस्कृतिक विरासत और बहुमूल्य जमीनें धीरे-धीरे समाप्त हो सकती हैं. उनका मानना है कि यह केवल जमीन की खरीद-बिक्री का मामला नहीं, बल्कि मैक्लुस्कीगंज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा गंभीर विषय है.

स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और राज्य सरकार से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है. ग्रामीण चाहते हैं कि लपरा पंचायत सहित पूरे मैक्लुस्कीगंज क्षेत्र में हुई भूमि खरीद-बिक्री, प्लॉटिंग, रजिस्ट्री और स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की गहन जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए. साथ ही सोसाइटी की भूमि, गैर मजरुआ भूमि, वन भूमि और ऐतिहासिक परिसंपत्तियों का सर्वेक्षण कर उनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए.

ग्रामीणों का कहना है कि निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जिन जमीनों की खरीद-बिक्री हो रही है, वे पूरी तरह वैध हैं या नहीं. यदि कहीं अनियमितता या अवैध हस्तांतरण पाया जाता है तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए. इस संबंध में खलारी अंचलाधिकारी प्रणव कुमार अंबष्ट सह प्रखंड विकास पदाधिकारी ने कहा कि यदि जांच में यह पाया जाता है कि  जमीनों की खरीद-बिक्री सादा पट्टों अथवा अन्य अवैध तरीकों से की जा रही है, तो इसमें संलिप्त लोगों के विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा कि भूमि संबंधी मामलों में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

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