प्रकृति का आंचल ही जनजातियों का कर्म और अध्यात्म

शक्ति वंदन : पेशेवर कार्य के साथ जनजातीय संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन और प्रसार का अनूठा प्रयास

शक्तिसिंह परमार

By : स्वदेश डेस्क
शक्ति वंदन : पेशेवर कार्य के साथ जनजातीय संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन और प्रसार का अनूठा प्रयास

इंदौर: व्यक्ति अपनी आवश्यकता और उदर-पोषण के लिए नौकरी, व्यवसाय, कृषि, निर्माण व उत्पादन करता है, लेकिन जब संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन और प्रसार का ध्येय भी पेशेवर कार्य के साथ जुड़ जाता है तो यह उसके लिए कर्म और अध्यात्म भी बन जाता है। जनजातीय समुदाय पर्यावरण और प्रकृति के महत्व को भलीभांति समझता है। वे प्रकृति पूजक और संस्कृति-पर्यावरण संरक्षण के कर्तव्यरूपी अधिकार को कभी विस्मृत नहीं होने देते। इसके लिए वे भौतिक आकर्षण अथवा आर्थिक सामर्थ्य को भी नजरअंदाज करने से पीछे नहीं हटते। 

जनजातीय समुदाय से आने वाली दो ऐसी मातृशक्ति जिन्होंने झाबुआ-आलीराजपुर, धार-बड़वानी, खंडवा-खरगोन की जनजातीय संस्कृति को सहेजने, संवारने और उसको आधुनिक युग में युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अपने पेशेवर कार्य के साथ नया आयाम दिया है। वरिष्ठ अधिकारी डॉ. सीमा अलावा (इंदौर कमिश्नरेट मुख्यालय में अतिरिक्त डीसीपी) जनसामान्य की 'सुरक्षा को जहां राष्ट्रीय 'कर्तव्य मानती है, वहीं कला की सेवा को धर्म के रूप में आत्मसात कर चुकी है।

- पिथौरा कला को बनाया संस्कृति की सेवा, विश्व की सबसे बड़ी रामायण को रामरंग से कैनवास पर उतारा-कुशल कानून प्रवर्तन अधिकारी डॉ. सीमा अलावा ने पेशेवर दायित्व निर्वाह के साथ मप्र के वनवासी अंचल झाबुआ और आलीराजपुर में पदस्थापना के साथ विगत डेढ़ दशक की अवधि में पिथौरा शैली और गोंडी शैली की चित्रकला को जनजातीय संस्कृति, संस्कार और पर्यावरण के आलोक में नए तरीके व विचार के साथ प्रस्तुत करने का सार्थक व सफल प्रयास किया। यह कार्य उनके लिए आकर्षण नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति का स्वाभिमान है। अभी तो उन्होंने पिथौरा कला को संस्कृति की सेवा निरूपित किया है। 

- कथा को देते हैं दृश्य रूप- जनजातीय संस्कृति में पशुओं का आर्थिक महत्व ही नहीं है, बल्कि जीवन का अटूट हिस्सा है। घोड़े पिथौरा में विशेष महत्व रखते हैं, इस पर डॉ. सीमा कहती हैं कि- वे देवताओं, शक्ति या पूर्वजों के वाहक माने जाते हैं। पारंपरिक रंग प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते थे, जबकि आधुनिक दौर में कैनवास व एक्रेलिक रंगों का उपयोग होता है। चित्र बनाना सामूहिक, अनुष्ठान प्रक्रिया है, जो समुदाय की कथा को दृश्य रूप देती है।

- तीन दिवसीय प्रदर्शनी, आजीविका से जोड़े कला को- वर्ष 2023 में शक्ति पुरस्कार और वर्ष 2022 में जनगण श्याम पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सीमा कहती है कि- 'रामरंग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आगामी 30, 31 अक्टूबर और 1 नवंबर को अभय प्रशाल में तीन दिवसीय प्रदर्शनी 10 से शाम 7 बजे तक आयोजित की जा रही है, ताकि युवाओं को प्रेरित किया जा सके। पिथौरा कला को लेकर डॉ. सीमा का मानना है कि जब तक सरकार इसे आजीविका से नहीं जोड़ेगी तब तक कलाकार इस विरासत को बचाने को उत्सुक नजर नहीं आएंगे। 

अद्वितीय कलात्मक कृति 'रामरंग में 50 मीटर में 54 प्रमुख प्रसंग

डॉ. सीमा अलावा के प्रयास से लेबी 'रामरंग चित्रकला मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामायण पर आधारित एक अद्वितीय कलात्मक कृति है। इसमें वाल्मीकि रामायण की कथा को जनजातीय चित्रकला की पारंपरिक शैली, प्रतीकों और रंग-संयोजन के साथ प्रस्तुत किया गया है। एकल (सिंगल रोल) कैनवास पर निर्मित इस विशाल चित्रकला (50 मीटर लगभग 164 फीट) में भगवान श्रीराम के जीवन व आदर्शों को वाल्मीकि रामायण के 54 प्रमुख प्रसंगों के माध्यम से क्रमबद्ध रूप में चित्रित किया गया है। इसमें भारतीय महाकाव्य व जनजातीय सांस्कृतिक विरासत का अनूठा समन्वय दिखता है, यह कृति विश्व की सबसे बड़ी रामायण-आधारित सिंगल रोल कैनवास पेंटिंग के रूप में आईएफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है और वर्ल्ड रिकॉर्ड इंडिया में रुड्डह्म्द्दद्गह्यह्ल ॥ड्डठ्ठस्र-क्कड्डद्बठ्ठह्लद्गस्र ्रह्म्ह्ल2शह्म्द्म शठ्ठ ड्ड स्द्बठ्ठद्दद्यद्ग क्रशद्यद्य शद्घ ष्टड्डठ्ठ1ड्डह्य श्रेणी में स्थान प्राप्त कर चुकी है। यह उपलब्धि डॉ. सीमा के लिए व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि जनजातीय गोंड चित्रकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में नींव का पत्थर है।

जनजातीय जीवन समाहित

 पिथौरा जनजातीय जीवन का महत्वपूर्ण अंग किस तरह से है, इस पर डॉ. सीमा कहती हैं कि पिथौरा चित्रकला भील-राठवा समुदाय की पवित्र भीत (दीवार) चित्रकला परंपरा है। यह केवल सजावट नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, प्रकृति, आस्था और सामाजिक स्मृति की अभिव्यक्ति है। इसमें सूरज, चांद, घोड़े, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, खेती और गांव के जीवन से जुड़े दृश्य शामिल होते हैं।

 देवता-पूर्वजों का धन्यवाद

डॉ. सीमा कहती हैं कि पिथौरा पारंपरिक रूप से किसी घर की दीवार पर अनुष्ठान के साथ बनाया जाता है। शादी, संतान प्राप्ति, अच्छी फसल या बीमारी से मुक्ति जैसी मनोकामना पूरी होने पर यह चित्र बनाया जाता है। चित्र और अनुष्ठान मिलकर देवताओं व पूर्वजों के प्रति धन्यवाद और आह्वान व्यक्त करते हैं। यही नहीं, यह उन्हें अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोड़े भी रखता है।

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