लखनऊ। उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव में गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के नतीजों ने सियासी दलों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। मतदाता भेल ही सीमित थे। लेकिन इस चुनाव से संदेश बड़ा है। भाजपा के लिए यह नतीजा खतरे की घंटी है, तो सपा का पीडीए समीकरण भी इस सीट पर काम नहीं कर पाया। विधानसभा चुनाव से पहले आए इस नतीजे को दोनों दलों के साथ शिक्षक संगठन भी गौर से देख रहे हैं।
भले इन सीटों पर वोट कम थे लेकिन उनके फैसले की गूंज दूर तक जाएगी। इस एमएलसी चुनाव में शिक्षकों ने पार्टी का झंडा देखकर नहीं, अपने मुद्दों और जाने-पहचाने चेहरे को परखकर वोट किया। इससे एक तरफ बीजेपी के लिए यह सावधान होने का इशारा है। वहीं, सपा का पीडीए गणित भी इस सीट पर काम नहीं आया। विधानसभा चुनाव सामने हैं। इसलिए दोनों दल इसे हल्के में नहीं ले सकते हैं।
राजीव यादव को क्यों मिला शिक्षकों का साथ
निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव ने बीजेपी प्रत्याशी को कड़ी टक्कर दी। वे ऑल टीचर्स एंड एप्लॉय वेलफेयर एसोसिएशन यानी अटेवा के जरिए शिक्षकों की मांगों को लेकर लगातार मैदान में डटे रहे। जब सपा का अपना कैडर वोट दूसरी तरफ खिसका तो उसका सीधा फायदा उन्हें मिला।
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के सहायक आचार्य अमित उपाध्याय की मानें तो वे इसे उम्मीदवार पर भरोसे का नतीजा मानते हैं। उनके अनुसार, शिक्षक किसी भी दल से जुड़े हों, वोट देते समय उन्होंने अपने सवालों को सबसे ऊपर रखा। अगर सरकार ने इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया तो उसे नुकसान उठाना पड़ेगा।
सपा ने बिगाड़ लिया अपना गणित
सपा की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ उम्मीदवार का बदलना रहा। कमलेश यादव को 8 महीनें पहले प्रत्याशी बनाया गया था। वे इतने समय गांव-गांव शिक्षकों के बीच सक्रिय थे। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने उन्हें बिठा दिया और भाजपा छोड़कर आए डॉ संजयन त्रिपाठी को टिकट थमा दिया।
एक्सपर्ट की मानें तो पार्टी को लगा था कि ब्राह्मण चेहरा उतारने से पीडीए वोट के साथ नए समर्थक भी जुड़ जाएंगे। लेकिन हकीकत में कुछ उल्टा ही हुआ। सपा का बड़ा तबका इस फैसले को पचा नहीं सका और निर्दलीय राजीव यादव के पाले में चला गया।
भाजपा के घर में ही उठे सवाल
बीजेपी की मुश्किलें बाहर से कम और भीतर से ज्यादा रहीं। पार्टी के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने चुनाव के बीच ही सरकार पर इशारों में सवाल उठा दिए। साथ ही शिक्षक मतदाताओं से वोट डालने की अपील करने लगे। नेतृत्व ने कोई कार्रवाई नहीं की न ही कोई जवाब दिया। शिक्षक संवाद सम्मेलन में गोरखपुर क्षेत्र के सांसद और विधायकों को न्योता गया था। हालांकि कई जिलों से लोग आए ही नहीं।
उम्मीदवार चयन ने भी माहौल बिगाड़ा। पिछली बार भाजपा ने शर्मा गुट के ध्रुव त्रिपाठी को समर्थन दिया था इस बार भी उन्हें सीधे अपना प्रत्याशी बना दिाय। राजनीतिक एक्सपर्ट की मानें तो शर्मा गुट की शिक्षकों में अच्छी पकड़ रही है और ध्रुव इसी के दम पर तीन बार जीते। उनके बीजेपी में जाने से शिक्षकों में सकारात्मक संदेश नहीं गया।
नाम जुड़वाने का भी पड़ा असर
जानकारी के अनुसार संजयन त्रिपाठी ने बीजेपी में रहते हुए शिक्षकों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाए थे। उनके सपा में जाने का असर इन वोटों पर भी पड़ा। उनकी नजर में शिक्षकों के मुद्दों पर कहीं न कहीं चूक हुई है। इसे अब सरकार को सुधारना होगा।
बड़े नामों की अपील नहीं आई काम
चार बार के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह और आवासीय विश्वविद्यालय महासंघ के अध्यक्ष चितरंजन मिश्र ने खुलकर सपा प्रत्याशी के लिए माहौल बनाने की कोशिश की। मगर इसका कोई ठोस असर नजर नहीं आया। शिक्षकों ने चुपचाप वही किया जो उन्हें ठीक लगा।