राजधानी के अकबर रोड पर नंबर 23 का बंगला ईंट-गारे का मकान नहीं है। ये भारतीय वायुसेना की जीवित स्मृति है। वायुसेना इसे एयर हाउस कहती है। यहीं से देश के आसमान की रखवाली होती है और यहीं वे जांबाज रहे हैं, जिनकी कहानियों से नई पीढ़ी के पायलट उड़ान भरना सीखते हैं। नई दिल्ली के 1931 में उद्घाटन के समय से यह बंगला वायुसेना के पास रहा। आजादी से पहले यहां रॉयल इंडियन एयर फोर्स के एयर वाइस मार्शल मेरिडिथ थॉमस रहा करते थे। उस दौर में इस ओहदे वाला अफसर ब्रिटेन की साउथ ईस्ट एशिया कमांड से जुड़ा होता था। 1945 में बल को 'रॉयल' की उपाधि मिली थी। 1950 में भारत के गणतंत्र बनते ही यह शब्द हटा और 23 अकबर रोड भारतीय वायुसेना प्रमुख का सरकारी बंगला बन गया। आज भी एयर चीफ मार्शल यहां सहयोगियों के साथ सरहद और आकाश की सुरक्षा पर बैठकें करते हैं।
हर साल 8 अक्टूबर को वायुसेना दिवस पर एयर हाउस में कार्यक्रम होता है, जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत शीर्ष नेतृत्व शामिल होता है। यह तारीख यूं पड़ी कि 8 अक्टूबर 1932 को इंडियन एयर फोर्स एक्ट के तहत बल की विधिवत स्थापना हुई थी। इस वक्त यहां वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह रहते हैं। वे 31 अक्टूबर 2026 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके बाद एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 29वें चीफ ऑफ एयर स्टाफ बनेंगे।
पहले भारतीय वायुसेना प्रमुख:23 अकबर रोड में रहने वाले पहले भारतीय एयर चीफ मार्शल सुब्रतो मुखर्जी थे। उन्हें फादर ऑफ द इंडियन एयर फोर्स कहा जाता है। पिता सतीश चंद्र मुखर्जी आईसीएस अधिकारी थे। सुब्रतो 1932 में बल में आए, शुरुआती भारतीय पायलटों में थे, दूसरे विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया और आजादी के बाद आधुनिकीकरण की धुरी बने। अप्रैल 1954 में वे पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने। 1955 में पद का नाम चीफ ऑफ एयर स्टाफ हुआ और वे चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष भी रहे। उनके कार्यकाल में वायुसेना जेट युग की ओर बढ़ी।
8 नवंबर 1960 को टोक्यो में एक रेस्तरां में भोजन का टुकड़ा श्वास नली में अटकने से उनका निधन हो गया। शव दिल्ली लाया गया। पालम से अर्थी एयर हाउस तक गई और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ। उनके नाम पर सुब्रतो पार्क बना, जहां स्कूल, दफ्तर और आवास हैं। फुटबॉल का सुब्रतो कप भी उन्हीं की स्मृति है। 1955 में राजधानी में एयर फोर्स स्कूल खुला। उद्घाटन खुद उन्होंने किया, ताकि वायुसेना परिवार के बच्चों को घर के पास अच्छी पढ़ाई मिले।
जिन योद्धाओं ने बंगले को बसाया:आजादी के बाद यहां सुब्रतो मुखर्जी, अर्जन सिंह, पी.सी. लाल, इदरीस हसन लतीफ और एन.ए.के. ब्राउन जैसे वायुसेनाध्यक्ष रहे। कई फाइटर पायलट थे और युद्ध देख चुके थे। मार्शल ऑफ द इंडियन एयर फोर्स अर्जन सिंह बताते थे कि वे एयर हाउस पहली बार जनवरी 1945 में गए। दूसरे विश्वयुद्ध के बर्मा अभियान से लौटे थे और मेरिडिथ थॉमस से मिलने आए थे। अर्जन सिंह 1964 से 1969 तक यहीं रहे। बाद में भारत सरकार ने उन्हें मार्शल ऑफ द इंडियन एयर फोर्स की अनूठी उपाधि दी। यह सम्मान आज तक किसी दूसरे वायुसेना अधिकारी को नहीं मिला।
1971 के नायक एयर चीफ मार्शल पी.सी. लाल को भी यह बंगला मिला। उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध से 1971 तक के युद्ध देखे। 1969 में प्रमुख बनने के बाद बल को आने वाले युद्ध के लिए तैयार करने पर जोर दिया। फल 1971 में दिखा, जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की वायुशक्ति को निर्णायक झटका दिया। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण मिला।
इदरीस हसन लतीफ भी यहां रहे। 1971 में वे एयर वाइस मार्शल थे और शिलांग से पूर्वी सेक्टर का संचालन देख रहे थे। उड़ानों, युद्ध की प्रगति और यूनिटों की जरूरत पर उनकी नजर थी। विजय पूरे नेतृत्व की थी, पर उनकी भूमिका इतिहास में दर्ज है। 1978 से 1981 तक वे प्रमुख रहे, भारतीय वायुसेना के पहले मुस्लिम चीफ। बंटवारे के वक्त पाकिस्तान जाने का दबाव रहा, पर उन्होंने भारत चुना। दिल्ली कैंट में उनके नाम पर सड़क है। सेवानिवृत्ति के बाद वे महाराष्ट्र के राज्यपाल और फ्रांस में भारत के राजदूत रहे।
पहले फ्लाईपास्ट के नायक:लतीफ का पहले गणतंत्र दिवस से अलग रिश्ता है। 26 जनवरी 1950 को नई दिल्ली पर हुए पहले फ्लाईपास्ट का नेतृत्व उन्होंने स्क्वाड्रन लीडर के रूप में किया। वे नंबर 4 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर थे और हॉकर टेम्पेस्ट उड़ा रहे थे। विमान अंबाला से उड़े। देश ने पहली बार लड़ाकू विमानों को राजपथ के ऊपर कलाबाजियां खाते देखा। उन्होंने 1948 और 1965 में भी सक्रिय भूमिका निभाई। प्रमुख रहते हुए आधुनिकीकरण तेज किया और जगुआर की खरीद के लिए सरकार को राजी किया। बाद के वर्षों में एयर हाउस के बाहर सुखोई और राफेल के मॉडल भी लगते रहे हैं। दूर से ही पता चल जाता है कि यह साधारण लुटियंस बंगला नहीं।
किताब और वायु भवन:2011 में 'एयर हाउस... डाउन द इयर्स' नाम की कॉफी-टेबल बुक छपी। तब के प्रमुख एयर चीफ मार्शल पी.वी. नाइक की पहल थी। 19 जुलाई 2011 को मार्शल अर्जन सिंह ने 23 अकबर रोड पर ही इसका विमोचन किया। किताब घर की ईंटों और यहां रहे परिवारों की यादों, दोनों को समेटती है। पुरानी तस्वीरें रक्षा मंत्रालय, वायु मुख्यालय और नेशनल आर्काइव्स से ली गईं। एयर फोर्स स्कूलों के छात्रों ने घर के चित्र भी बनाए।
एयर हाउस से कुछ दूर, रफी मार्ग पर, वायुसेना भवन है। यह भारतीय वायुसेना का मुख्यालय है और 1964 में बना। मुख्य द्वार पर लड़ाकू विमानों के मॉडल लगे हैं। वायु भवन, उद्योग भवन, कृषि भवन और रेल भवन 1965 तक तैयार हो गए थे। डिजाइन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के गणेश भीखाजी देवोलालिकर और हबीब रहमान ने मिलकर किए। रणनीति वायु भवन में अंतिम रूप पाती है। एयर हाउस वह जगह है, जहां यह नेतृत्व रहता है।
अकबर रोड लुटियंस दिल्ली का अहम इलाका है, हरियाली, सुरक्षा और इतिहास के लिए। एयर चीफ का बंगला टाइप-8 श्रेणी का है। विशाल लॉन, कर्मचारी क्वार्टर और कड़ी सुरक्षा इसकी पहचान हैं। यह निवास भी है और आधिकारिक बैठकों तथा स्वागत की जगह भी। चौबीसों घंटे सुरक्षा, बिजली-पानी की निरंतर आपूर्ति, रखरखाव कर्मी और बागवानी यहां की नियमित व्यवस्था है।
सड़क इंडिया गेट से शुरू होकर रेसकोर्स, आज के लोक कल्याण मार्ग, तक जाती है। करीब पौने तीन किलोमीटर लंबी इस पट्टी के दोनों ओर 26 सरकारी बंगले हैं, कुछ निजी भी। आजादी के बाद देश की सबसे प्रभावशाली हस्तियां यहीं रही हैं। सुबह-शाम छतों पर मोर मंडराते हैं। बीच में नंबर 23 चुपचाप खड़ा है। 1931 से यहां एयरमैन रहे हैं। ईंटों में वह इतिहास दबा है, जिसे वायुसेना अपनी विरासत मानती है।

विवेक शुक्ला
(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के पूर्व सलाहकार हैं।)