समकालीन भारतीय राजनीति में अनेक नेता अपने भाषणों और वक्तव्यों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन अमित शाह अपने नीतिगत निर्णयों, कार्यसंस्कृति, कठिन परिश्रम और लक्ष्यवेधी परिणामों से पहचाने जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन कौशल का ऐसा ढाँचा तैयार किया, जिसने पार्टी को देश के हर कोने में स्थापित किया। वहीं, गृह मंत्री और सहकारिता मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक जटिलताओं से निपटने की क्षमता दिखाई। 22 अक्टूबर को उनका जन्मदिवस भारतीय राजनीति और प्रशासन में उनके योगदान को रेखांकित करने का अवसर है।
अमित शाह के राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन में समस्याओं के स्थायी समाधान का स्पष्ट मॉडल दिखाई देता है। शून्य से शिखर तक की यात्रा में उन्होंने सिद्ध किया है कि रणनीतिक दृष्टि कठोर कार्यसाधना से मिल जाए, तो कठिन लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। वे विवादों को सतही तौर पर देखने के बजाय समस्या की जड़ों तक पहुँचते हैं और आँकड़ों तथा वास्तविक परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। बैठकों में स्पष्ट समयसीमा और परिणाम-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना, असंतोष को संवाद में तथा गतिरोध को समाधान में बदलना उनकी कार्यशैली की विशेषता है।पूर्वोत्तर भारत में शांति बहाली इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने के बाद अमित शाह ने संवाद और समझौतों के जरिए क्षेत्र में स्थिरता लाने पर जोर दिया। उनके कार्यकाल में बोडो शांति समझौता, ब्रू-रियांग पुनर्वास समझौता, कार्बी आंगलोंग समझौता, आदिवासी शांति समझौता, उल्फा समझौता और त्रिपुरा के उग्रवादी गुटों के साथ समझौते हुए। इन पहलों से अनेक लोगों के हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता खुला और शांति की संभावनाएँ मजबूत हुईं।
अंतरराज्यीय विवादों को सुलझाने में भी सहयोगात्मक संघवाद उनकी प्राथमिकताओं में रहा है। दशकों पुराने जल विवाद विकास और राज्यों के आपसी संबंधों के लिए चुनौती रहे हैं। बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बँटवारे का मुद्दा वर्ष 2000 में राज्य विभाजन के बाद से लंबित रहा। इसी तरह हरियाणा और राजस्थान के बीच यमुना जल तथा किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयासों को प्रशासनिक समन्वय के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे मामलों में राज्यों की जरूरतों, जल उपलब्धता और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग के बीच संतुलन जरूरी है। असम और मेघालय के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद तथा असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमांकन के प्रश्न पर भी बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की पहल हुई। मुख्यमंत्रियों को साझा मंच पर लाकर संवाद बढ़ाना इस दृष्टि का हिस्सा रहा है। निर्णय लेने की क्षमता और उन्हें जमीन पर उतारने का संकल्प अमित शाह की राजनीतिक पहचान के प्रमुख पक्ष हैं।
देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत करने के लिए उन्होंने वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध सुरक्षा कार्रवाई के साथ विकास पर भी जोर दिया। प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, बैंक, स्कूल और संचार सुविधाओं का विस्तार सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। इससे राज्य की संस्थाओं की पहुँच बढ़ाने और स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिली। सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलने का यह दृष्टिकोण उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालीन शांति के लिए महत्त्वपूर्ण है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय का गठन हुआ, तो अमित शाह को इसकी जिम्मेदारी मिली। उन्होंने ‘सहकार से समृद्धि’ के मंत्र के तहत सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने पर बल दिया। प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के कंप्यूटरीकरण और राष्ट्रीय सहकारिता नीति की दिशा में प्रयासों का उद्देश्य सहकारी क्षेत्र को अधिक पारदर्शी, सक्षम और उपयोगी बनाना है। सहकारिता को मजबूत करने से किसानों, ग्रामीण उद्यमियों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का निरसन और नए आपराधिक कानूनों के निर्माण की प्रक्रिया उनके राजनीतिक जीवन के बड़े फैसलों में गिनी जाती है। इन कदमों ने देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यापक बहस भी पैदा की। अमित शाह की कार्यशैली में निर्णायकता और दूरगामी बदलावों की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।अब नशामुक्त भारत का लक्ष्य भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। चिट्टा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी युवाओं तथा परिवारों के लिए गंभीर चुनौती है। पंजाब में प्रभावित परिवारों से संवाद और 31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त भारत का लक्ष्य इस अभियान की व्यापकता को रेखांकित करते हैं। इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई के साथ जागरूकता, उपचार और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना आवश्यक है, ताकि युवाओं का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।
बहरहाल, 22 अक्टूबर को अमित शाह का जन्मदिन केवल एक व्यक्ति का जन्मदिवस नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और रणनीतिक नेतृत्व पर विचार करने का अवसर है।

आदर्श तिवारी
(लेखक स्तंभकार हैं।)