नागपुर की एक शाखा... मैदान में स्वयंसेवकों की पक्तियां सधी हुई हैं। कुछ युवा दूर खड़े मुस्करा रहे हैं, शाखा का उपहास कर रहे हैं। उन्हीं के बीच एक शांत, सहज और विनम्र युवक सबको आत्मीयता से जोड़ रहा है। कोई दंभनहीं, कोई उपदेश नहीं। वही युवक आगे चलकर हिंदुत्व की विराट योजनाओं का शिल्पकार बना मोरोपंत पिंगले। ऐसा व्यक्तित्व, जिसने इतिहास रचा, पर स्वयं कभी इतिहास के मंच पर खड़ा होने की आकांक्षा नहीं की।
साधारण जीवन से असाधारण यात्राः 10 अक्टूबर 1916 को मध्यप्रदेश के जबलपुर में जन्मे मोरोपंत पिंगले का बाल्यकाल नागपुर में बीता। परिवार का वातावरण संस्कारवान था और डॉ. हेडगेवार से निकट परिचय ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य से जोड़ दिया। सन् 1930 में वे धंतोली शाखा के स्वयंसेवक बने और 1941 में प्रचारक जीवन का व्रत धारण कर लिया। खंडवा से प्रारंभ हुआ उनका संगठन-जीवन शीघ्र ही मध्यभारत और महाराष्ट्र के व्यापक दायित्वों तक पहुंचा।
कार्य के प्रति अद्भुत निष्ठाः मोरोपंत जी की सबसे बड़ी विशेषता थी काम के प्रति पूर्ण समर्पण। वे किसी भी दायित्व को केवल निभाते नहीं थे, उसमें प्राण फूंक देते थे। आपातकाल के कठिन दिनों में उन्होंने भूमिगत रहकर संगठन की व्यवस्था संभाली। कहा जाता है कि उस कालखंड में उनके द्वारा किए गए अनेक कार्य इतिहास के पन्नों में आज भी पूरी तरह दर्ज नहीं हो सके हैं। पहले प्रतिबंध के समय महाराष्ट्र से 11 हजार स्वयंसेवकों का सत्याग्रह में उतरना उनकी संगठन क्षमता का उदाहरण था। संघ के शारीरिक शिक्षण के पाठ्यक्रम तैयार करने से लेकर 'गुरुजी समग्र दर्शन' के प्रकाशन तक, अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के पीछे उनकी सूक्ष्म दृष्टि और अथक श्रम था।
एकात्मता यात्रा का विराट स्वप्नः मोरोपंत पिंगले केवल संगठनकर्ता नहीं, विलक्षण कल्पनाशील योजनाकार भी थे। एकात्मता यात्रा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। देश के तीन दिशाओं से निकलने वाली यात्राएं, उनसे जुड़ती उपयात्राएँ और गाँव-गाँव तक पहुँचता जनसंपर्क, यह केवल आयोजन नहीं, सांस्कृतिक चेतना का महासंगम था। बाद में रामजन्मभूमि आंदोलन, शिलापूजन और कारसेवा जैसे अभियानों की रणनीति में भी उनकी निर्णायक भूमिका रही। आश्चर्य यह कि इतने विराट कार्यों के बावजूद उन्होंने कभी श्रेय लेने का प्रयास नहीं किया। वे परदे के पीछे रहकर कार्य करने वाले तपस्वी थे।
विरोधियों को भी आत्मीय बना लेने की कलाः मोरोपंत जी का व्यक्तित्व केवल कर्मठता तक सीमित नहीं था। उनमें अद्भुत आत्मीयता थी। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने एक प्रसंग में लिखा कि कॉलेज के दिनों में वे और उनके मित्र शाखा का उपहास करते थे। शाखा जाते स्वयंसेवकों को 'पुरातन' समझते थे। लेकिन मोरोपंत जी उन युवाओं से अलगाव नहीं रखते थे। वे उन्हीं के बीच बैठते, हँसी-मजाक करते, मित्र की तरह व्यवहार करते। यही सहजता धीरे-धीरे लोगों के मन बदलती गई। ठेंगड़ी जी ने लिखा कि मोरोपंत जी के इसी व्यवहार ने उन्हें शाखा की ओर आकर्षित किया। यह प्रसंग बताता है कि व्यक्ति को जीतने के लिए उपदेश नहीं, आत्मीयता चाहिए।
हास्य और विनम्रता से भरा व्यक्तित्वः गंभीर चिंतक होने के साथ-साथ मोरोपंत जी अत्यंत विनोदी भी थे। गंभीर बैठकों में भी वे सहज हास्य से वातावरण हल्का कर देते थे। उनकी हाजिरजवाबी प्रसिद्ध थी। बड़े से बड़ा स्वयंसेवक भी उनके पास संकोच नहीं, अपनापन अनुभव करता था। उनकी यह विशेषता उन्हें केवल नेता नहीं, परिवार का मुखिया बना देती थी। हजारों कार्यकर्ताओं के जीवन में वे मार्गदर्शक, मित्र और प्रेरणा-स्रोत बने रहे।
आज भी प्रेरणा देता है उनका जीवन
आज जब सार्वजनिक जीवन में प्रसिद्धि और श्रेय की होड़ दिखाई देती है, तब मोरोपंत पिंगले का जीवन एक दीपस्तंभ की तरह सामने आता है। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्रनिर्माण का सबसे बड़ा आधार निस्वार्थ कर्म है। जो व्यक्ति स्वयं को मिटाकर समाज के लिए जीता है, वही इतिहास में अमर होता है। मोरोपंत पिंगले वास्तव में ऐसे तपस्वी थे, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि महानता का सबसे ऊँचा शिखर वही है, जहाँ व्यक्ति स्वयं अदृश्य रहकर भी युग को दिशा देता है।
आत्मविलोपी वृत्ति का जीवंत उदाहरण
मोरोपंत पिंगले का पूरा जीवन' आत्मविलोपी वृत्ति' का उदाहरण था। वे मानते थे कि संगठन का कार्य व्यक्तियों को जोड़ने का है, तोड़ने का नहीं। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति को उसके गुण-दोषों सहित स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि कौन व्यक्ति कब काम आ जाए, यह कोई नहीं जानता। उन्होंने कभी अपना गुट नहीं बनाया, न प्रचार की इच्छा रखी। विश्व हिंदू परिषद जैसे बड़े कार्यों को खड़ा करने के बाद भी वे सहज भाव से अगले दायित्व में लग जाते थे। प्रसिद्धि से दूर रहकर राष्ट्रकार्य में डूबे रहना ही उनका स्वभाव था।