हथकरघा: भारत की विरासती अर्थव्यवस्था

हथकरघा: विकसित भारत के भविष्य की बुनाई

हथकरघा उद्योग भारतीय विरासत के संरक्षण और नवाचार को जोड़ने का काम कर रहा है। इसमें सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की परंपरा को बढ़ावा देने के साथ सामाजिक-आर्थिक विकास भी शामिल है।

By : नरेंद्र कुमार
हथकरघा: विकसित भारत के भविष्य की बुनाई

किसी विकसित राष्ट्र का निर्माण सिर्फ तकनीक से ही निर्धारित नहीं होता। उसका खाका अपनी स्थायी खूबियों को भावी प्रगति के वाहक के रूप में बदल सकने की क्षमता से गढ़ा जाता है। अब जबकि हमारा देश 'विकसित भारत 2047' की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हम अत्याधुनिक तकनीकों में निवेश कर रहे हैं, मैन्युफैक्चरिंग को सुदृढ़ बना रहे हैं और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योग तैयार कर रहे हैं। फिर भी, हमारी हथकरघा परंपरा उन सबसे बड़ी खूबियों में से एक है, जो हमेशा हमारे साथ बनी रही है।

आगामी 7 अगस्त को जब भारत 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाएगा, तो यह हथकरघा को एक ऐसे रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखने का उपयुक्त अवसर होगा, जो टिकाऊपन, प्रामाणिकता और सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला को महत्व देने वाली दुनिया के लिए बेहद अहम है।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का 'विकसित भारत 2047' का सपना समृद्धि, आत्मनिर्भरता, समावेशिता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर आधारित है। हथकरघा, विरासत और नवाचार को एक साथ जोड़कर इस सपने को साकार करता है। साथ ही, यह महिलाओं के नेतृत्व में विकास, ग्रामीण उद्यमिता, आजीविका और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को भी बढ़ावा देता है।

रामचरितमानस में कहा गया है-

"सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य-शील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥"

'विजय रथ' के उपदेश में भगवान राम यह सिखाते हैं कि स्थायी जीत शक्ति पर नहीं, बल्कि मूल्यों पर आधारित होती है। इन्हीं मूल्यों ने सदियों से भारत की हथकरघा परंपरा को टिकाए रखा है। हाथ से बुना हुआ हर कपड़ा परंपरा को बनाए रखने के साहस, हर धागे को बेहतरीन बनाने के धैर्य, ईमानदार कारीगरी की निष्ठा और पीढ़ियों से चली आ रही समझदारी को दर्शाता है। यही कारण है कि हथकरघा महज एक शिल्प नहीं, बल्कि भारत की महानतम सभ्यतागत खूबियों में से एक है।

सबसे पहले कपास की खेती एवं बुनाई करने वाली सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर वैश्विक व्यापार में भारतीय वस्त्रों के दबदबे वाली अठारहवीं सदी तक, भारत ने वैश्विक स्तर पर वस्त्र निर्माण की उत्कृष्टता के सर्वोच्च मानक स्थापित किए। बंगाल के प्रसिद्ध मलमल के साथ-साथ बनारसी सिल्क, कांचीपुरम की बुनाई, पोचमपल्ली इकत और अनगिनत क्षेत्रीय परंपराओं ने भारत को दुनिया भर में पहचान और प्रशंसा दिलाई। बंगाल का मलमल इतना महीन होता था कि 25 मीटर लंबा कपड़ा भी एक अंगूठी से होकर गुजर जाए।आज, जब दुनिया प्रामाणिक, टिकाऊ और हाथ से बने उत्पादों की ओर मुड़ रही है, तो हमारे पास उस अग्रता को फिर से हासिल करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। हमारी अगली हथकरघा क्रांति के दौरान सिर्फ वस्त्र ही नहीं, बल्कि कारीगरी, विरासत, नवाचार और भरोसे का भी निर्यात होना चाहिए, ताकि हाथ से बुना हर उत्पाद 'ब्रांड इंडिया' की पहचान बन सके।

हथकरघा भारत का सबसे बड़ा कुटीर उद्योग है। यह 35 लाख से अधिक बुनकरों व उनसे जुड़े कामगारों की आजीविका का सहारा है। इन कामगारों में से लगभग 72 प्रतिशत महिलाएं हैं। पिछले दशक में सरकार ने 'कच्चा माल आपूर्ति योजना', 797 हथकरघा क्लस्टर, 1.24 लाख से अधिक उन्नत करघे, लगभग 97 हजार कारीगरों के कौशल विकास तथा उत्पादक कंपनियों, जीआई-टैग वाले उत्पादों, हैंडलूम मार्क, इंडिया हैंडमेड सर्टिफिकेशन, अर्बन हाट और डिजाइन रिसोर्स सेंटर जैसी पहलों के जरिए इस क्षेत्र को सुदृढ़ किया है।आज 29 'बुनकर सेवा केंद्र' प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन, डिजाइन विकास, कच्चे माल संबंधी सहायता और बाजार से जोड़ने जैसी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। वहीं, 11 इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हैंडलूम टेक्नोलॉजी को सुदृढ़ किया जा रहा है, ताकि उन्नत प्रशिक्षण का विस्तार हो सके और विशेष प्रकार के अधिक मूल्य वाले हथकरघा उत्पाद तैयार किए जा सकें।

ये पहलें हथकरघा को सिर्फ एक कल्याणकारी गतिविधि के रूप में समर्थन देने से आगे बढ़ाकर, इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी एवं रचनात्मक उद्योग के रूप में विकसित करने की दिशा में हो रहे बदलाव को दर्शाती हैं। आगामी 'राष्ट्रीय हथकरघा और हस्तशिल्प कार्यक्रम' 500 जिलों में 1,800 क्लस्टरों को सुदृढ़ करेगा, 65 लाख बुनकरों व कारीगरों को लाभान्वित करेगा और 'हैंडमेड इन इंडिया' को एक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करेगा।नवाचार हमेशा से भारत की हथकरघा यात्रा का हिस्सा रहा है। महात्मा गांधी के अंबर चरखे ने सूत कातने के काम को आसान, तेज और अपेक्षाकृत अधिक कुशल बनाया। इससे आत्मनिर्भरता का विजन आगे बढ़ा। हाल ही में, असम के मैना करघे और शिवसागर में विकसित चित्तरंजन हथकरघे ने यह दर्शाया है कि करघे के बेहतर डिजाइन से बुनाई का काम कैसे आसान और अधिक उत्पादक हो सकता है।

इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के साथ मिलकर बनाया गया 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर हैंडलूम टेक्नोलॉजी' ऐसे करघे विकसित कर रहा है, जो हल्के, मजबूत और उपयोग में आसान हैं। ये करघे शारीरिक मेहनत को कम करते हैं और उत्पादकता बढ़ाते हैं। इनमें दिव्यांगजनों के लिए भी विशेष सुविधाएं शामिल हैं।इस सेंटर के तहत 'हैंडलूम 4.0' पहल उत्पादकता, गुणवत्ता और रखरखाव की निगरानी के लिए डिजिटल टूल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करती है। इस पहल को विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले 100 करघों पर प्रायोगिक परियोजना के रूप में आजमाया जा रहा है।

तकनीक को कारीगरों की जगह लेने के बजाय उनके सशक्तिकरण का माध्यम बनना चाहिए। 'विजन एक्सट' जैसे प्लेटफॉर्म मांग का अनुमान लगाने, डिजाइन के रुझानों की पहचान करने, हथकरघा के असली उत्पादों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने और बुनकरों को सीधे दुनिया के बाजारों से जोड़ने में मदद कर सकते हैं। साथ ही, प्रीमियम सिल्क, नेचुरल फाइबर, सस्टेनेबल फाइबर और इनोवेटिव ब्लेंड्स जैसे उत्पादों में विविधता लाकर अधिक मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं और नए बाजारों तक पहुंचाए जा सकते हैं।बेहतर ब्रांडिंग, मूल्यवर्धन (वैल्यू एडिशन) और बाजार तक सीधी पहुंच के जरिए ये नवाचार बुनकरों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं। हमारा विजन हर बुनकर को सम्मानजनक और बेहतर आय अर्जित करने में सक्षम बनाना है, ताकि आने वाले वर्षों में वे 50 हजार रुपये प्रतिमाह तक की कमाई कर सकें।

हथकरघा का भविष्य सिर्फ बाजार पर ही नहीं, बल्कि सोच पर भी निर्भर करता है। हमारे बुनकर केवल कामगार नहीं हैं, बल्कि वे उद्यमी, नवोन्मेषक और मूल्य-सृजक हैं। उन्हें ब्रांड बनाने, मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ने और दुनिया के बाजारों तक पहुंचने में मदद करके हम हथकरघा को भारत के सबसे गतिशील रचनात्मक उद्योगों में से एक बना सकते हैं।भारत के युवाओं से भी एक आह्वान है कि वे हथकरघा के अगले अध्याय को आकार देने के लिए विरासत और तकनीक, रचनात्मकता तथा उद्यमशीलता को एक साथ जोड़ें।इस राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आइए, हम अपने बुनकरों का सम्मान सिर्फ अपनी विरासत के संरक्षक के रूप में ही नहीं, बल्कि भारत की प्रगति के शिल्पकारों के रूप में भी करें। साथ ही, हम हथकरघा को अपने रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाएं। हमारे द्वारा खरीदा और पहना गया हथकरघा का हर उत्पाद एक बुनकर की आजीविका को मजबूत करता है, सदियों पुरानी परंपरा को संजोता है और भारत की कहानी को दुनिया तक पहुंचाता है।

हथकरघा को अपनाकर हम न सिर्फ अपनी विरासत को ओढ़ते हैं, बल्कि 'विकसित भारत' के भविष्य को बुनने में भी योगदान देते हैं।


गिरिराज सिंह
(लेखक भारत के केंद्रीय वस्त्र मंत्री हैं।)

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