इस सप्ताह यमन के ईरान-समर्थित हूती आंदोलन और सऊदी अरब के बीच बढ़ा टकराव पश्चिम एशिया के सबसे खतरनाक संघर्ष बिंदुओं में से एक बन गया है। रियाद के मुख्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, दक्षिणी सऊदी शहरों, तेल बुनियादी ढांचे और वाणिज्यिक जहाजरानी पर हमले करके हूतियों ने यमन के नागरिक संघर्ष को एक क्षेत्रीय सुरक्षा संकट में बदल दिया है। अमेरिका ने रियाद को खुफिया और योजना संबंधी सहायता प्रदान की है, लेकिन अब तक प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचा है। इससे एक ऐसा रणनीतिक शून्य पैदा हुआ है, जो आतंकवादी संगठनों को प्रोत्साहित करता है और अमेरिकी निवारक क्षमता की सीमाओं को उजागर करता है।
यमनी संघर्ष से क्षेत्रीय युद्ध तक
हूती, जिन्हें अंसार अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है, उत्तरी यमन के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और उन्होंने यमन के पश्चिमी लाल सागर तट पर अपना प्रभाव बढ़ाया है। यह भौगोलिक स्थिति उन्हें बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य पर बढ़त देती है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ने वाले दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारों में से एक है। इस तट पर उनकी हालिया प्रगति ने सऊदी तेल निर्यात, अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी और क्षेत्रीय व्यापार मार्गों को सीधे खतरे में डाल दिया है।
वर्तमान तनाव तब शुरू हुआ, जब बाब अल-मंदब के पास हूतियों को सामरिक बढ़त मिली और सऊदी अरब से संबद्ध जहाजरानी तथा ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले हुए। सऊदी अरब ने हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमलों के साथ जवाब दिया, जिनमें उत्तरी यमन में ईंधन वितरण सुविधाएं भी शामिल थीं।
इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी क्षेत्र पर मिसाइल और ड्रोन हमलों को तेज कर दिया, जिनमें रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बार-बार किए गए हमले भी शामिल हैं। यह पैटर्न पश्चिम एशियाई संघर्ष में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। एक अपेक्षाकृत स्थानीय सशस्त्र समूह अब अपने क्षेत्रीय आधार से बहुत दूर तक अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है। सस्ते ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और असममित समुद्री रणनीतियों ने हूतियों को सऊदी अरब जैसी प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति को चुनौती देने में सक्षम बनाया है, जबकि उनके पास उसके बराबर की पारंपरिक वायुसेना या नौसेना नहीं है।
सऊदी अरब की सुरक्षा दुविधा
सऊदी अरब एक कठिन रणनीतिक दुविधा का सामना कर रहा है। सैन्य रूप से उसके पास श्रेष्ठ हवाई शक्ति और उन्नत रक्षा प्रणालियां हैं, फिर भी हूतियों द्वारा ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल ने हवाई सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर किया है। रियाद के हवाई अड्डे पर हमलों और कुछ मिसाइलों तथा ड्रोन को रोकने में कथित विफलता ने सऊदी अरब के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और लचीलेपन को लेकर असहज सवाल खड़े किए हैं।
सऊदी अरब इस क्षेत्र का अग्रणी तेल उत्पादक है और ईस्ट-वेस्ट क्रूड पाइपलाइन, टैंकरों तथा लाल सागर में जहाजों पर हूती हमले राष्ट्रीय राजस्व और वैश्विक ऊर्जा बाजारों, दोनों के लिए खतरा हैं। बाब अल-मंदब के पास नौवहन में बाधा डालने की हूतियों की क्षमता एक और दबाव बिंदु जोड़ती है, खासकर ऐसे समय में, जब होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव पहले ही टैंकर यातायात को अस्थिर कर चुका है।
अमेरिका का सोचा-समझा हस्तक्षेप न करना
अमेरिका की स्थिति अस्पष्ट है। उसने खुफिया जानकारी साझा की है, लक्ष्यों की पहचान करने में सहायता की है और सऊदी अभियानों की योजना बनाने में सहयोग किया है, लेकिन उसने खुद हमले करने या रियाद द्वारा अनुरोधित कुछ प्रत्यक्ष सैन्य सहायता, जिसमें हवा में ईंधन भरने का समर्थन भी शामिल है, प्रदान करने से इनकार कर दिया है।यह संयम कई रणनीतिक गणनाओं को दर्शाता है। पहला, अमेरिका दशकों के महंगे सैन्य हस्तक्षेपों के बाद एक और अनिश्चितकालीन पश्चिम एशियाई युद्ध में शामिल होने से बचना चाहता है। दूसरा, सीधे अमेरिकी हमले पूरे क्षेत्र में अमेरिकी कर्मियों, जहाजों और हितों के खिलाफ हूतियों की जवाबी कार्रवाई को भड़का सकते हैं। हूती नेताओं ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका इस संघर्ष में शामिल होता है, तो वे 'तेज प्रतिक्रिया' देंगे।
तीसरा, अमेरिका को ईरान से जुड़े व्यापक रणनीतिक पहलुओं पर भी विचार करना है। हूतियों को व्यापक रूप से ईरान के सहयोगी बलों के क्षेत्रीय नेटवर्क का हिस्सा माना जाता है। उनके खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई तेहरान के साथ कूटनीति को जटिल बना सकती है या खाड़ी क्षेत्र में टकराव को तेज कर सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तेल टैंकरों पर ईरानी हमलों की खबरें पहले ही आ चुकी हैं। ऐसे में ट्रंप एक स्पष्ट रणनीतिक लाभ के बिना एक और मोर्चा खोलने से हिचकिचा रहे हैं।
अपनी भूमिका को खुफिया सहायता तक सीमित करके अमेरिका अल्पकाल में तनाव बढ़ने पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। लेकिन यह इस बात का संकेत भी देता है कि सऊदी सुरक्षा अब स्वचालित रूप से अमेरिकी लड़ाकू शक्ति पर निर्भर नहीं हो सकती। इससे क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं के विकास के पक्ष में तर्क मजबूत होते हैं।
क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक संरचनात्मक चुनौती
हूती चुनौती केवल सैन्य नहीं, बल्कि संरचनात्मक भी है। उन्होंने दिखाया है कि बाहरी संरक्षण प्राप्त करने वाला और असममित हथियारों से लैस एक गैर-राज्य अभिनेता प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक व्यापार मार्गों को जोखिम में डाल सकता है।खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा और समुद्री व्यापार पर निर्भर भारत तथा अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए इसके सीधे निहितार्थ हैं। लाल सागर या अरब प्रायद्वीप में व्यवधान से माल ढुलाई की लागत, बीमा प्रीमियम और तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे खाड़ी क्षेत्र में भारतीय जहाजरानी और प्रवासी समुदायों के लिए जोखिम भी बढ़ सकता है।
इस प्रकार, हूती-सऊदी टकराव समकालीन पश्चिम एशियाई सुरक्षा के केंद्रीय विरोधाभास को उजागर करता है: सैन्य श्रेष्ठता अब रणनीतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। जब तक कूटनीति, समुद्री सुरक्षा और यमन में एक विश्वसनीय राजनीतिक समझौते की दिशा में प्रयास एक साथ आगे नहीं बढ़ते, तब तक हूती पश्चिम एशिया के सबसे महत्वपूर्ण अनिश्चितता कारकों में से एक बने रह सकते हैं, जो एक राष्ट्रीय संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय संकट में बदलने में सक्षम हैं।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं।)