अखंड भारत के सिंध प्रांत में पराधीनता की विकट-विषम परिस्थितियों में भी सनातन संस्कृति के अध्यात्म से सिंचित सिंधु लोक संगीत, साहित्य एवं भक्ति भाव की कला के सृजन, प्रसार तथा संरक्षण के लिए समर्पित हुतात्मा संत कंवरराम के बलिदानी व्यक्तित्व एवं आस्थामय कृतित्व का पुण्य स्मरण आज भी प्रासंगिक है।
“सिंध के तानसेन” के रूप में ज्ञात हुतात्मा संत कंवरराम का संपूर्ण जीवन संगीतमय सत्संग एवं कीर्तन की विधा के माध्यम से सामाजिक सद्भावना की स्थापना हेतु समर्पित रहा। वे संत शिरोमणि नामदेव, संत तुकाराम तथा संत सूरदास की भक्ति भावना के ध्वजवाहक के रूप में भी प्रतिष्ठित रहे। उनका जन्म अखंड भारत के सिंध प्रांत के सक्खर जिले के जरवार गाँव में संवत् 1942 के वैशाखी पर्व (23 अप्रैल 1885) के दिन पिता ताराचंद एवं माता तीरथ देवी के अत्यंत साधारण, श्रमसाधक एवं धर्मप्रेमी कृषक परिवार में हुआ।
बाल्यकाल से परिवार के पालन-पोषण में सहयोग करने वाले किशोर वय के कंवर को अध्यात्म से जुड़ने का सौभाग्य उस दिन प्राप्त हुआ, जब एक दिन उनके गाँव में सनातन धर्म के उपदेशक भगत सतराम दास की संगत सभा के स्थल के बाहर वे अपने कोकिल कंठ से सुमधुर स्वर में भजन गाते हुए उबले हुए चने बेच रहे थे। कंवर के भक्तिभावमय स्वर से प्रभावित होकर भगतजी ने किशोर कंवर को सभा में अपने पास बुलाया तथा उसके सभी चने प्रसाद हेतु खरीद लिए। परंतु संस्कारवान कंवर ने मूल्य के बदले भगतजी से अध्यात्म का आशीर्वाद माँगा। भगतजी ने उनके माता-पिता की अनुमति से कंवरराम को अपने आश्रम के साधक के रूप में स्वीकार कर उनके लिए भक्ति ज्ञान तथा संगीत साधना की व्यवस्था की।
शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनियों की विशेष दीक्षा युवा कंवर ने संत शादराम दरबार में सिंध के सूरदास स्वामी हासारामजी के शिष्य के रूप में प्राप्त की। वे राग सोरठ, सारंग, भैरवी तथा रामकली पर आधारित आलाप, भजन गायन तथा बाँसुरी वादन की दिव्य साधना में निरंतर लीन रहते थे। भक्ति संगीत की विभिन्न विधाओं में पारंगत होकर वे भगवान राम, भगवान कृष्ण, भक्त ध्रुव, भक्त प्रह्लाद, श्री गुरु नानक देव, राजा हरिश्चंद्र, साध्वी मीरा, संत सूरदास, संत कबीर आदि महापुरुषों के उपदेशों एवं गाथाओं के संदेशवाहक के नाम से प्रसिद्ध होने लगे।
“लोरी” उनके गायन की एक अतिरिक्त विशेषता थी। उनके द्वारा गाई जाने वाली “लोरी” में कृष्ण, मोहन, गोपाल, माता यशोदा जैसे सनातन शब्दों का समावेश कृष्ण भक्ति के प्रति उनकी अटूट आस्था को प्रकट करता था। उनकी गोद में शिशु को प्राप्त ममतामयी “लोरी” को दैवीय आशीर्वाद माना जाने लगा। देश-विदेश के सिंधी एवं पंजाबी समाज में शिशु जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में संत कंवर द्वारा सृजित इस कालजयी “लोरी” को श्रद्धापूर्ण उत्साह के साथ गाना शुभ माना जाता है।
संत कंवरराम गृहस्थ संत थे। वे अपने परिवार का जीवन निर्वाह बेर, खजूर एवं फल बेचकर करते थे, परंतु सत्संग-कीर्तन में भेंट स्वरूप प्राप्त धनराशि को अपंग, दृष्टिहीन, कुष्ठ पीड़ित रोगियों के उपचार तथा नारी कल्याण एवं अछूतोद्धार हेतु समर्पित करते थे। चूँकि हिंदी, सिंधी, पंजाबी तथा जनजातीय लोकभाषा सरायकी में रचित अपने सनातनी भजनों के साथ-साथ वे सचल, सामी, शाह लतीफ, बुल्ले शाह, शेख फरीद जैसे सूफी फकीरों के पैगाम भी अपने अनोखे आलाप के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने लगे, इसलिए उनकी प्रभात फेरियों में हिंदू, पंजाबी तथा सिख, पारसी समाज के अतिरिक्त मुस्लिम समाज के लोग भी सम्मिलित होने लगे।
मानवीय संवेदनाओं से भरी उनकी समाज सेवा तथा उनके भक्तिभाव की निष्ठा के कारण वे सभी संप्रदायों, समुदायों एवं धर्मों के सर्वहारा वर्ग में विशेष रूप से लोकप्रिय हो गए। इस कारण एक धार्मिक विशेष संप्रदाय के कुछ कट्टरपंथी उनके घोर विरोधी हो गए। उनका नाम बदनाम कर अपमानित करने के लिए एक विशेष संप्रदाय के ईर्ष्याग्रस्त विघटनकारी समूह ने उनके “बाल गोपाल” की लोरी गायन के समय उनकी गोद में एक मरणासन्न शिशु को रख दिया। परंतु इस षड्यंत्रकारी प्रयास में उनके शत्रु सफल नहीं हो सके, क्योंकि संयोग से “लोरी” समाप्त होते ही शिशु के क्रंदन की आवाज सुनाई दी और संत कंवरराम के जयकारे गूँज उठे।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से उन्हें अपने जीवन के भविष्य में होने वाली अनहोनी का आभास हो गया। कुछ ही दिनों बाद एक सत्संग सभा में उनके द्वारा राग मारू में गाया गया एक करुणामय वियोगी भजन उनके जीवन का अंतिम स्वर हो गया।
1 नवम्बर 1939 को एक सायंकालीन सत्संग सभा के समापन के पश्चात् लाड़काणा जिले के दादू नगर के “रूक” नामक रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन के साधारण कोच में वे प्रभु ध्यान में लीन होकर शांतचित्त बैठे हुए थे। तभी दो आतंकियों ने बंदूक की गोलियों से उन्हें आहत कर दिया। “हरे राम” के अंतिम उद्गार के साथ त्याग और तपस्या की ज्वलंत मूर्ति संत कंवरराम का दिव्य जीवन संवत् 1996 की कार्तिक कृष्ण पंचमी की पुण्य रात्रि (6 नवम्बर) में सनातन समरसता की बलिवेदी पर बलिदान हो गया।
उनके दुःखद देहांत पर सिंध तथा समीपवर्ती प्रांतों के सर्वसमाज में शोक एवं आक्रोश का वातावरण छा गया। एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने श्रद्धांजलि के साथ प्रश्नवाचक आक्रोश व्यक्त किया कि “लोक गायक, संत हृदय तथा सूफी आस्था में समर्पण के साथ ‘डिवाइन मिशन’ पर अग्रसर एक साधारण मानव की हत्या क्यों की गई?”
हुतात्मा संत कंवरराम का तपस्वी जीवन संदेश देता है कि संगीत, भक्ति और सेवा सामाजिक समरसता के सशक्त माध्यम हैं। उनका बलिदान आज भी मानवीय एकात्मता, धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक चेतना के लिए प्रेरणास्रोत है।

संकलन एवं प्रस्तुति- डॉ. सुखदेव माखीजा, स्वतंत्र लेखक, समीक्षक है एवं सभासद, मध्य भारतीय हिंदी साहित्य सभा